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मंगलवार, 4 नवंबर 2008

राष्ट्रीय महानगर का सांध्य संस्करण नए जोश के साथ पुनः शुरू

कोलकाता. तेजतर्रार युवा पत्रकार प्रकश चंडालिया के संपादन में निकलने वाले हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय महानगर का प्रकाशन नए जोश और तल्ख़ तेवरों के साथ फ़िर शुरू हो गया है. महानगर का प्रकाशन पिछले मई महीने में स्थगित कर दिया गया था. कम्पनी की योजना आक्रामक तेवरों वाले टैब्लोइड साप्ताहिक एवं सामाजिक पत्रिका प्रकाशित करने की थी. लेकिन इस दौरान महानगर के सांध्य संस्करण के हजारों पाठकों ने प्रबंधन पर दबाव बनाये रखा और नतीजा यह हुआ कि राष्ट्रीय महानगर का सांध्य संस्करण ४ नवम्बर से फ़िर स्टैंड पर आ गया. जनसत्ता, संडे मेल जैसे अख़बारों में वर्षों तक खोजी पत्रकारिता कर चुके प्रकाश चंडालिया ने कोलकाता में सांध्य पत्रकारिता को नया आयाम दिया है. कई समाचारपत्रों में वे नियमित कालम लिखते रहे हैं. उनकी बेबाक लेखनी और आक्रामक तेवरों से राजनैतिक पार्टियों के नेता और बयान-बहादुर कर्मी बौखलाए रहते हैं. १९९९ में एक राष्ट्रीय पार्टी के गुंडों ने सांध्य अख़बार के दफ्तर में जबरदस्त तोड़फोड़ तक कर डाली थी. गैर हिन्दी भाषी प्रदेश में बगैर किसी औद्योगिक घराने और सरकारी विज्ञापनों के समर्थन के अखबार चलाना और बाकायदा १० वर्षों से पाठकों में लोकप्रिय बनाये रखना, कलम की धार का परिचय देता है. प्रकाश ने बताया कि पाठकों के दबाव के कारण फिलहाल साप्ताहिक संस्करण कि योजना स्थगित कर दी गई है, लेकिन सामाजिक विषयों पर आधारिक पत्रिका का प्रकाशन शीघ्र शुरू किया जाएगा.

रविवार, 2 नवंबर 2008

जय छ्ठ मंईया की।



पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, कले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ (बिहार में इसे खज़ूर भी कहते हैं) नारीयल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर 12 दीपक लगे हो, गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख दिया जाता है, यहीं से छठ पूजा का व्रत शुरू हो जाता है। 'देवकरी' स्थान पर काफी सावधानी रखी जाती है। इसे छठ मंईया का पूजा स्थल भी कहा जा सकता है।


जय छ्ठ मंईया की। इस त्यौहार की शुरूवात नहाय-खाय, और खरना से शुरू होती है। आईये सबसे पहले यह जाने की नहाय-खाय और खरना क्या होता है।


नहाय-खाय: इस पर्व के पहले दिन नहाय-खाय के दौरान व्रतियों द्वारा स्नान कर कद्दू की सब्जी व अरवा चावल का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इस अवसर पर व्रती 24 घंटे निर्जला उपवास रखेते हैं। तत्पश्चात संध्या अस्ताचलगामी सूर्य को अ‌र्घ्य देंगे। चार दिवसीय इस महापर्व के दूसरे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आस-पास के नदी, तालाब या सरोवरों में स्नान कर खीर-पूड़ी का प्रसाद भगवान सूर्य को अर्पण करतें हैं। सूर्यास्त के पूर्व व्रतियों ने भगवान सूर्य को नमन करते हुए मनोवांछित फल की कामना की जाती है। नवनिर्मित चूल्हे पर आम की लकड़ी के द्वारा प्रसाद बनाए जाते हैं। इसके साथ ही प्रारंभ हो जाता है व्रतियों के घर 'खरना का प्रसाद' प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं के आने-जाने का सिलसिला। देर रात तक श्रद्धालु व्रतियों के घर आते-जाते हैं।


खरना: खरना के अवसर पर दूध और गुड़ से बने खीर प्रसाद (तस्मई) का काफी महत्व होता है व्रती इसे ही ग्रहण करतें हैं, इसके साथ ही शुरू हो जाता है 36 घंटे का निराहार व्रत इस महाव्रत की बहुत बड़ी मान्यता होती है, इस व्रत को करने वाले महिला, पुरुष, बच्चे को समाज में काफी मान और श्रद्धा से देखा जाता है।


इस महापर्व के तीसरे दिन व्रतधरी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी या तलाब में खड़ा होकर प्रथम अर्घ्य अर्पित करते हैं। छठ पर्व के चौथे और अन्तिम दिन पुनः अदयीमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य देने के साथ ही यह पर्व समाप्त हो जाता है। इस पर्व में 'ठेकुआ' (आटा+चीनी या गुड़ से तला हुआ), ईख, मुली, केला, सूप, दौरा, दीप, कलश, पंखा, झाड़ू का विशेष महत्व होता है। छठ पुजा के अवसर पर लोग श्रद्धा से प्रसाद भिक्षा के रूप में मांग कर ग्रहण करते हैं। छठ पर्व के त्यौहार में भिक्षा मांगने का प्रचलन भी है। इस पर्व के अवसर पर यदि कोई आपके सामने भिक्षा मांगने आ जाये तो आपकी मनोकामनाएं भी भिक्षा ग्रहण व्रती के साथ स्वतः जुट जाती है। आपको कभी ऐसा अवसर मिल जाये कि जब कोई छठव्रती आपसे भिक्षा मांगने आ जाये तो अपनी मनौती के साथ उसके सूप पर भिक्षा दे देना चाहिए। आपकी मनोकामना ठीक उसी क्रम में पूरी हो जाती है जिस क्रम में आपने भिक्षा दिया है। ठीक इसी प्रकार कभी छठ मंईया का प्रसाद मिले तो इसे श्रद्धा से ग्रहण करने से कहते हैं कि "छठ मंईया प्रसन्न होकर आपकी सभी मनोकामनाओं को पूरी कर देती है।"


यह बात सही है कि इस पर्व का महत्व बिहार, यु.पी के लोगों में ही अधिक देखा जाता है। बिहार,U.P. में रहने वाले बंगाली, मारवाड़ी, और गुजराती बड़ी संख्या में इस त्यौहार में शामिल ही नहीं होते कई परिवार तो यह पर्व मनाने भी लगे हैं। इस पर्व में लोकगीतों का काफी महत्व आज भी देखा जाता है। इस त्यौहार के लोकगीतों को ध्यान से सुना जाये तो मानो समस्त प्राणियों की मंगलकामना गीत हैं ये लोकगीत। इस पर्व में कई जगह गाय(cow) से भी व्रत कराया जाता है। इस पर्व की इतनी बड़ी मान्यता है कि कई विद्वान, साहित्यकार, इस पर्व के डाले(दौरी बांस की बनी टोकरी) को (जिसमें प्रसाद, सूप, अर्घ्य देने का समान रखा जाता है) को अपने सर पे रख कर घाट तक ले जाते हैं। कई व्रतधारी तो पूर्ण रुप से दण्डवत प्रणाम करते हुए घाट तक जाते हैं। कहतें हैं कि भारत विचित्रता का देश है, यहाँ की संस्कृति विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न प्रकार से बदल जाती है, जिस तरह यहाँ की बोलियों में कई तरह की मिठास देखने को मिलती है। बनारस की बोली हो या लखनवी अंदाज, भौजपुरी हो या मैथिली। सभी एक से बढ़कर एक हैं। इस चार दिन के त्यौहार में नदी के किनारे मेला भी लगाया जाता है, कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। हाँ ! इस अवसर को कुछ राजनीति करने वाले दल अपने लाभ के लिये भुनाने का प्रयास भी करते पायें जाते है। जिसके चलते अन्य प्रान्तों में इस त्यौहार को राजनैतिक रंग दिया जाने लगा है।


केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मंडाराय
जे खबरी जनइबो आदित से सुगा देले जुठियाए
जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरछाय,
जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ न सहाय।


जिस लोकगीतों मे एक 'सुगनी' के दर्द को इतनी मार्मिक्ता से दर्शाया गया है, उस बिहारी समाज को कभी बंगाल, महाराष्ट्र तो कभी दिल्ली में प्रताड़ना छेलना पड़ता है। शायद इस समाज को देखने का नज़रिया हम अभी तक नहीं बदल पाये हैं। हम भले ही अपने आपको सभ्य समाज का अंग समझते हों पर हम से कहीं ज्यादा यह समाज मुझे सभ्य दिखाई देता है। हमारी भाषा में तो केवल विष ही विष झलकता है। वह राज ठाकरे हो या शीला दीक्षित चाहे वह लालू यादव हो या नितिश कुमार, सब के सब इस समाज के दर्द को आज तक समझने का कभी भी प्रयास नहीं किया, आखिर क्या कारण है जो समाज संस्कृति रूप से हम से भी कहीं ज्यादा शिक्षित है, वह आज हम सबके दया का पात्र बना हुआ है।
जय छ्ठ मंईया की।


- शम्भु चौधरी
http://ehindisahitya.blogspot.com/

शनिवार, 1 नवंबर 2008

भारतीय संस्कृति का प्रतीक पर्व छठ


लेखक : बसंत लाल 'चमन' और महेश कुमार वर्मा, पटना, बिहार से

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Email: gulbdan@gmail.com
Web Site: http://popularindia.blogspot.com
Email: vermamahesh7@gmail.com


हमारा देश भारत विविध संस्कृतियों का अनुपम राष्ट्र है। किसी भी देश की संस्कृति का उदय अकस्मात नहीं होता है अपितु परम्परागत मान्यताओं, आस्थाओं और जीवन-मूल्यों के आधार पर होता है। धर्म संस्कृति का आवश्यक अंग होने के कारण अनेक पवित्र कर्मों को उत्पन्न करता है। पर्व-त्यौहार संस्कृति के जिवंत प्रमाण है।

कोई त्यौहार पुरे देश में हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है तो कोई केवल सिमित स्थान में ही जनप्रिय होता है। जैसे - होली, दशहरा, दिवाली जहाँ व्यापक रूप से पुरे देश में मनाया जाता है तो वहीँ तमिलनाडू के पोंगल, पंजाब का बैशाखी, बिहार का छठ पर्व अपने-अपने क्षेत्र में लोकप्रिय है।


बिहार का छठ पर्व अपने-आप में एक अनूठा पर्व है। यह विशेषकर हिन्दुओं का पर्व है। इस पर्व में बच्चे-बुढे, महिला-पुरूष सबों का सामंजस्यपूर्ण बर्ताव सामाजिक एकता की कड़ी को नई जीवन देती है। महीनों पहले से ही ईसकी तैयारी शुरू हो जाती है।


छठ पर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से होता है। चतुर्थी के दिन व्रती (महिला - पुरूष) पवित्रता पूर्वक स्नान करके कद्दू-भात का भोजन करते हैं। तत्पश्चात छठी मैया के व्रत का सिलसिला शुरू होता है। पंचमी के रोज 'खरना' की पूजा होती है जिसमें गुड़-खीर का भोग लगाया जाता है और अड़ोस-पड़ोस सबों को प्रसाद बाँटा जाता है। षष्ठी के रोज व्रती नदी किनारे डाला सजा के फल-फूल-नैवेद्य वगैरह के साथ संध्या काल में डूबते हुए भगवान भास्कर को अर्ध्य समर्पित करते हैं। पुनः सप्तमी के रोज उगते हुए भगवान् सूर्य को नदी किनारे अर्ध्य देते है। इस प्रकार छठ पर्व का कार्यक्रम सम्पन्न होता है।


त्यौहार देशव्यापी हो या क्षेत्रीय हो, ये हमारी जीवनचर्या को किन्हीं न किन्हीं रूपों में प्रभावित करती है। हमारी संस्कृति के आधारभूत तत्त्व धार्मिक सिद्धांत, सामाजिक परम्पराएं और जीवन-दृष्टिकोण की नींव पर खड़ी है। इस नींव को इस आधार को सतत सुदृढ़ता प्रदान कराए रहने में छठ पर्व का अतुलनीय योगदान सदा से रहा है। अपनों के बीच सबसे बड़ी चीज जो हमें छठ पर्व देती है वह है - परस्पर मेल-मिलाप की भावना का। सभी एक-दुसरे के कामों में हाथ बंटाने को तत्पर दीखते हैं। कहीं भी किसी से भी छोटी से छोटी भी गलती न हो जाए इसका बड़ा ख्याल रखते है। हमेशा एक-दुसरे को प्रोत्साहित करने को आतुर रहते हैं।


इतने सारे सदगुणों-सद्व्यव्हारों-सदाचरणोँ जैसी भावनाओं का विकास ख़ुद-ब-ख़ुद छठ पर्व के शुभागमन से हो जाता है। कहाँ तक कहें, छठ पर्व हमें परस्पर एकता, एकरसता, एकरूपता और एकात्मकता का पाठ पढाते हैं। और यही हमारी संस्कृति की आधारशिला है।
संक्षेपतः छठ पर्व जहाँ एक ओर भारतीय संस्कृति की कड़ी को मजबूती प्रदान करती है वहीँ दूसरी ओर सौहार्द्रता, सहिष्णुता, एक-सूत्रता और राष्ट्रीयता के साथ मानवता का सुखद संदेश देते हुए हमें और अधिक सभ्य और संस्कृतिवान बनाने के लिए सन्मार्ग भी दिखाती है। अतः आएं इस वर्ष के छठ पर्व को भी हम भारतीय संस्कृति के प्रतीक-पर्व के रूप में हर्षोल्लास पूर्वक मनाएँ।

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008

छट पूजा / छठ पूजा


दोस्तो, कुछ बातें छट पूजा के समानों की यह मुझे लाना है सो हो सकता है छट करने वालो की मै कुछ मदद कर दूं इसलिए यह लिस्ट यहां दे रहा हूँ।
गेहूं , महीन अरवाचावल, मोटा अरवाचावल, चीनी, कुसिया मटर, देशी घी, सौंप, बदामगुल्ली, मखाना, किसमीस, छुहारा, गरीगोला, रिफाइन / डाल़डा या शुद्ध घी, मैदा, सक्कर, सिंदूर, इलायची, अरता, बद्दी, सुपारी , टोकरी, गमछा, चादर, ढकनी, सूप, सेब, केला, केतारी, संतोला, नारियल, पान, पानी फल, आदी, हल्दी गाछ, मूली, बरबट्टी, अलवा, सुथनी, नेंबू, टाभनेंबू, अगरबत्ती, दीपक, हल्दीगुंडी, यह तो शुरुवात है, धीरे-धीरे यह लिस्ट लंबी होती जाती है।

- कन्हैया रस्तोगी
छट पूजा के ऊपर आपने कुछ भी लिखा हो तो हमें भेजने की कृपा करें।

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008

हिन्दी का कोई साफ्टवेयर खरीदने की ज़रूरत नहीं


पिछले माह महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी ने सर्वभाषा सम्मेलन आयोजित किया था। उसमें एक सत्र इंटरनेट और हिन्दी पर भी था। वहाँ यह बात सामने आई कि अभी लोगों को यह पता नहीं है कि कंप्यूटर में हिन्दी इनबिल्ट है। यानी अब आपको अलग से हिन्दी का कोई साफ्टवेयर खरीदने की ज़रूरत नहीं है। पता नहीं कंप्यूटर कंपनियों की यह अज्ञानता है या बदमाशी कि वे इसके बारे में लोगों को बताते नहीं। (यह बात इसलिए भी प्रचारित नहीं की जाती है कि कहीं हिन्दी वाले लोग कंप्यूटर का प्रयोग करने में अंग्रेजी वालों को पीछे न छोड़ दें ।) आम आदमी को कौन कहे सरकारी कार्यालयों में अभी भी आकृति, एपीएस, और अक्षर नवीन जैसे साफ्टवेयर खरीदने में पैसा बर्बाद किया जा रहा है जब कि इनका उपयोग आप ईमेल भेजने में नहीं कर सकते।


इस संबंध में श्री रंजीत इस्सर, सचिव, भारत सरकार (राजभाषा ) द्वारा 14 सितम्बर को सरकारी विभागों के लिए एक दिशा निर्देश जारी किया किया है। इसमें बताया गया है कि विंडो 2000 , XP और उसके बाद के सभी कम्प्यूटर्स में हिन्दी का यूनिकोड फोण्ट 'मंगल' इनबिल्ट है। इसलिए अब अलग से हिन्दी का कोई साफ़्ट्वेयर या प्रोग्राम खरीदने की ज़रूरत नही हैं। मंगल फोण्ट को कंट्रोल पैनेल में जाकर ऐक्टिवेट किया जा सकता है। ऐक्टीवेट होने के बाद आसानी से इसमें ऐंग्लो रोमन तरीके से ऑफिस वर्ड में हिन्दी में टाइप किया जा सकता है तथा उसे ईमेल भी किया जा सकता है।किसी दूसरे फाण्ट में टाइप मैटर कॊ भारत सरकार द्वारा नेट पर उपलब्ध कराए गए निःशुल्क साफ़्टवेयर 'परिवर्तन' के ज़रिए मंगल में कन्वर्ट भी किया जा सकता है। मंगल फोण्ट में टाइप कोई भी फाइल किसी भी XP कम्प्यूटर में आसानी से खुल जाएगी। इस फोण्ट के ज़रिए कोई भी फाइल ईमेल के साथ अटैच की जा सकती है।


बाज़ार में सीडेक कं. की 'सुविधा' नामक सीडी उपलब्ध है। इसे लोड करते ही आपको टाइपराइटर का कीबोर्ड मिल जाएगा। अगर आपका कम्प्यूटर XP नहीं है,यानी विंडो 98 वगैरा है तो उसमें यूनिकोड मंगल डालने के लिए भारत सरकार ने 'हिन्दी साफ़्ट्वेयर' नाम की एक सीडी निकाली है जिस पर सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह की तस्वीर है। इसे डाउनलोड किया जा सकता है या राजभाषा विभाग से मुफ्त में प्राप्त किया जा सकता है । आपका ब्राउज़र इस छवि के प्रदर्शन का समर्थन नहीं भी कर सकता।


बाक़ी जानकारी यहाँ से लीजिए- rajbhasha.gov.in, डाउनलोड के लिए इसे देखें-http://ildc.gov.in/hindi/downloadhindi.htm, यहाँ 'परिवर्तन' साफ़्ट्वेयर के साथ ही इंस्क्रिप्ट, रैमिंगटन और फोनेटिक कीबोर्ड भी लोड कर सकते हैं। आवश्यकतनुसार राजभाषा विभाग (तकनीकी कक्ष) दिल्ली से फोन 011-2461 9860 से संपर्क कर जानकारी हासिल की जा सकती है । ईमेल techcell-ol@nic.in This e-mail address is being protected from spam bots, you need JavaScript enabled to view it से नि:शुल्क साफ़्ट्वेयर प्राप्त करने संबंधी जानकारी ली जा सकती है।


तो अब देर किस बात की, अब हम सभी को यूनिकोड समर्थित सुविधा का प्रयोग शुरू कर देना चाहिए ताकि पूरी दुनिया के हिन्दी कामकाज में एकरूपता लाई जा सके।


14 सितम्बर को हिन्दी मीडिया.इन पर मेरा लेख प्रकाशित हुआ था-'' कंप्यूटर पर हिन्दी और हिन्दी में ईमेल। '' पहले ही दिन इसे पढ़ने वालों की संख्या 32759 थी। अब आप समझ सकते हैं कि कंप्यूटर पर हिन्दी प्रेमियों की संख्या कितनी तेज़ी से बढ़ रही है । उपरोक्त लेख में मैंने आपको इंटरनेट द्वारा कंप्यूटर पर हिन्दी लिखने और उसे ईमेल email के तीन तरीके बताए थे -


http://kaulonline.com/uninagari/
http://www.google.com/transliterate/indic/ और Baraha.com ।


इसमें Baraha.com को सबसे ज़्यादा पसंद किया गया क्योंकि इसके ज़रिए आप सीधे कम्पोज़ मेल में टाईप कर सकते हैं, कॉपी-पेस्ट नहीं करना पड़ता । दूसरे इसमें संयुक्त अक्षरों को लिखना बहुत आसान है । अगर आपको बारहा डॉट काम लोड करने में या हिन्दी लिखने में कोई असुविधा है तो आप tarakash.com के संजय बेंगाणी या hindyugm.com के शैलेश भारतवासी से संपर्क कर सकते हैं । इस मामले में यह दोनों प्रवीण होने के साथ साथ बहुत सहयोगी हैं और हिन्दी प्रेमियों को हर तरह से मदद करने को तत्पर रहते हैं।


कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखना आसान है
अगर आपको ऑफ लाइन काम करना पसंद है तो geocities.com/hanu_man_jiलोड कर लें |बहुत अच्छी साइट है | इसे कम्पोज़ मेल में कॉपी-पेस्ट करके ईमेल भी कर सकते हैं |


(1)www.geocities.com/hanu_man_ji को sarch करें तो Jai Hanuman पेज खुलेगा ।
Chalo ab kaam ki baat टाइटल मे Win9x(Win95,Win98,WinME) and for NT4,Win2000,WinXP दिखेगा | अगर आपका कंप्यूटर XP है तो WinXP पर क्लिक करें और इस तख्ती को डाउनलोड करे ।
(2) फ़िर डेस्कटाप पर सेव करें ।
(3) डेस्कटोप के आइकॉन को डबल क्लिक करें फिर उसे agree करें ।
(4) फिर wizard पर क्लिक करें ( wizard आपको ऊपर दिखेगा)
(5) फिर उसे agree करे ।
(6) फिर डेस्कटाप पर तख्ती का icon (हरे रंग का त ) दिखेगा |
(7) इसे डबल क्लिक करें तो अपने आप word pad खुलेगा |
(8) इसमे कोई भी मैटर टाईप करके फाइल मे जाकर सेव करें |
(9) word pad में किसी भी मैटर को टाईप करके compose mail मे pest करके Email कर सकते हैं या फाइल अटैच करके भेज सकते हैं |


देवमणि पाण्डेय, मुम्बई


Devmani Pandey (Poet)
A-2, Hyderabad Estate
Nepean Sea Road, Malabar Hill
Mumbai - 400 036
M : 98210-82126 / R : 022 - 2363-2727
E-mail:devmanipandey@gmail.com

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008

मैं कौन सा दीप जलाऊं?


-पवन निशांत-




मैं कौन सा दीप जलाऊ? अब से ठीक घंटे बाद दीपावली के दीप घर-घर, गली-चौराहे जलने शुरू होंगे, मगर मैं दुविधा में हूं कि मैं कौन सा दीप जलाऊं? जलते हुए दीप अपने हिस्से का अंधियारा दूर करेंगे, पर क्या मेरे जलाए दीप मेरे हिस्से का अंधियारा दूर कर सकेंगे। मैं कौन सा दीप जलाऊं?-उस नौजवान की आत्मा की शांति के लिए कोई दीप जलाऊं, जिसके कोमल मन में राजनीति के अंधियारे ने ऐसा हिस्टारिया दिया कि वह अपना आपा खो बैठा और उस आदमी से बात करने के लिए बेकाबू हो गया, जो उसके लिए जिम्मेदार था। जो दो दिन पहले ही मुंबई पहुंचा था अपना कैरियर बनाने। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ उसके साथ कि मुंबई की चकाचौंध में वह अपने अस्तित्व को बिसरा चुका हो और बार-बार वही सवाल उसके दिमाग में कौंधने लगा हो, जो वहां से पिटकर लौटे दूसरे भाइयों के मन में कौंध रहा है।

क्या मैं उस आदमी के नाम पर भी दीप जला सकता हूं, जो वास्तव में अपने अस्तित्व और अपने भविष्य के अंधियारे को दूर करने के लिए मराठियों के बहाने पूरे देश में अंधियारा पैदा करना चाहता है। लोहे को लोहे से काटने की कहावत पर चलकर जो अंधियारे से अंधियारे को हराना चाहता है। या में बाजार के उस महानायक के नाम का दीप जलाऊं, जो गंगा-जमुनी भावनाओं के उद्वेग पर सवार होकर महानायक बना और हिंदी बोलने की शर्म में हिंदी की छाती पर खड़ी होकर माफी मांग गया। महानायक भी मुंबई में अपने अस्तित्व पर संकट देख रहा है, तो मैं उसके अस्तित्व की अक्षुण्ता की कामना में एक और दीप जलाऊं?

मुंबई शहर पर एक परिवार के दो महत्वाकांक्षी लोगों में से किसी एक की हुकूमत कायम रहने की जद्दोजहद से बुझ रहे दीपों में से मैं किसका दीप जलाऊं? या बेबड़ा मारकर सो गए उन लोगों के लिए दीप जलाऊं, जो अपने महानायक की तलाश में उनके झंडे के साथ अपने अस्तित्व के भ्रम को पाले हुए हैं और अभी भी सो रहे हैं। जो सो रहे हैं और सोते-सोते भयभीत हैं कि उनकी जमीन पर यूपी-बिहार के भइये क्यों इतने जाग्रत रहते हैं।
उस महानायक के नाम का दीप जलाऊं, जो गंगा-जमुनी भावनाओं के उद्वेग पर सवार होकर महानायक बना और हिंदी बोलने की शर्म में हिंदी की छाती पर खड़ी होकर माफी मांग गया। महानायक भी मुंबई में अपने अस्तित्व पर संकट देख रहा है, तो मैं उसके अस्तित्व की अक्षुण्ता की कामना में एक और दीप जलाऊं?

मैं बाटला हाउस की अतृप्त आत्माओं की शांति को एक दीप अवश्य जलाता, मगर अब मैं एक साध्वी के बहाने उस राजनीति का अंधियारा दूर करने के लिए कोई दीप क्यों न जलाऊं, जो मात्र अपने ओजस्वी भाषण की वजह से आज की राजनीति का साफ्ट टारगेट बन गयी, जिसके बहाने से मुस्लिम आतंकवाद बनाम हिंदू आतंकवाद की नई थ्यौरी गढ़ने की प्यास जाने कब से विकल कर रही थी।
आय के मामले में मंदी और व्यय के मामले में मंहगाई वाले इन दिनों में आखिर कोई कितने दीप जला सकता है और सावन हरे न भादों सूखे वाले मंहगे साक्षी भाव में मैं आखिर कितने दीप जला पाऊंगा। घी-तेल या मोम, चीनी, मिट्टी या चांदी के दीपों में से कौन सा दीपक पटना से लेकर मुंबई और बाटला से लेकर नंदीग्राम तक के अंधेरे को दूर कर सकेगा, कोई पहचान कर बता दे,मैं वही दीप जला लूंगा।


पवन निशांत का परिचय
जन्म-11 अगस्त 1968, रिपोर्टर दैनिक जागरण, रुचि-कविता, व्यंग्य, ज्योतिष और पत्रकारिता
पता: 69-38, महिला बाजार,
सुभाष नगर, मथुरा, (उ.प्र.) पिन-281001
E-mail: pawannishant@yahoo.com

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे?

उजड़ि गेल घर बाढ़ में
डूबि गेल पूँजी व्यापार में
ना बा कहूँ रहे के ठिकाना
ना बा कुछु खाय के ठिकाना
दिया से अपन घर के सजाएब कैसे
जुआड़ी सैंया के हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
ना बा घर ना बा दुआर
ओ भगवान तोहार मूर्ति हम बिठाएब कैसे
तोहार आरती हम उतारब कैसे
हो अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे


रचयिता - महेश कुमार वर्मा

रविवार, 26 अक्टूबर 2008

दीपान्विता -रामनिरंजन गोयनका

हे दीपान्विता
कर दो तुम गहन अमावस्या का तिमिर विच्छिन्न
कर दो हमारा अन्तर्मन आलोकित
हे दीपमालिके
तुम हो राष्ट्रमाता की दिव्य आरती
हमारी सभ्यता संस्कृति की निर्मल धारा
कामाख्या भुवनेश्वरी नारायणी पार्वती
दुर्गा काली लक्ष्मी सरस्वती विश्वभारती
तुम केवल दीपोत्सव नहीं
तुम हो एक मानसिक स्थिति
एक दिशा और अनुभूति की चमक
समर्पण का भाव और जीवन की परिभाषा
कोटि कोटि भारतवासियों के प्राणों की अभिलाषा
दीवार और द्वारों पर सज्जित दीपमाला
हमारे अन्तःकरण में प्रज्जवलित
ज्ञानदीप की एक विस्तारित श्रृंखला हो
दीपावली है वस्तुतः हमारे भावना दीप की
सत्य शाश्वत आन्तरिक अभिव्यक्ति
जो हमारी चक्षुसीमा के पार तक को
आलोकित और प्रकाशित करती है
और हमें सुपथ की ओर प्रेरित करती है।
दीपावली पर हम करते हैं
परंपरागत कागज और कलम की पूजा
किन्तु संपदा की स्याही और श्रम की कलम से
साधना की माटी पर हस्ताक्षर करना ही होगा
व्यश्टि से ऊपर उठकर समष्टि के लिये पूजा
दीपावली की ज्ञान ज्योति
मानव जीवन का श्रेष्ठतम पक्ष मुखरित करे।


क्या आप भी अपनी कविता दीपावली पर पोस्ट करना चाहते हैं? हाँ! तो देर किस बात की अभी तुरन्त हमें मेल कर दें।
हमारा मेल पता:

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

सुशील प्रकरण : वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन


Written by B4M Reporter
Friday, 24 October 2008 01:30



एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।

इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।

दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।


बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।
प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा।


भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।

विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''

लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।

बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।


- साभार-भड़ास

क्या लाये पापा इस बार

दीवाली तो आ गई पापा, क्या लाये इस बार

बच्चा बोला देखकर, सुबह सुबह अखबार

सुबह सुबह अखबार, कि पापा कपड़े नए दिला दो

मम्मी को एक साड़ी औ बहना को शूट सिला दो

और अपने लिए तो पापा, जो जी में आए लेना

पर घर का कोना कोना, रोशन दीपो से करना

पापा ने सुन बात , कहा बेटे , क्या बतलाएं

डूब गई पूंजी शेयर में, कैसे दीप जलाएं

बेटा बोला, बुरा न मानो, तो एक बात बताएं

पैसे के लालच में पड़कर, क्यूँ पीछे पछ्ताएं

दादाजी भी तो कहते थे लालच बुरी बला है

शेयर नहीं सगा किसी का, इसने तुम्हे छला है

कोई बात नही पापाजी, यह लो शीतल पेय

बीती ताहि बिसरी देय, आगे कि सुधि लेय

चिराग-चमन चंडालिया

रविवार, 19 अक्टूबर 2008

असम: हिंदी पर बंदिश लगाने वाले आज सीख रहे हैं हिंदी

गुवाहाटी से विनोद रिंगानिया




राजनीतिक नारेबाजी को छोड़ दें तो व्यावहारिक धरातल पर भारतीय उपमहादेश में हिंदी का उपयोगिता से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। वे चरमपंथी अलगाववादी भी नहीं जो हिंदी विरोध को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा मानते हैं। असम के अलगाववादी संगठन उल्फा के बारे में भी यह बात सच है।
प्रबाल नेओग उल्फा के वरिष्ठ नेताओं में से हैं। 17 सालों तक चरमपंथियों की एक पूरी बटालियन के संचालन का भार इन पर हुआ करता था। पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द बने अपने मुख्य सेनाध्यक्ष परेश बरुवा के निर्देश पर प्रबाल नेओग ने असम में कई हिंदीभाषियों के सामूहिक कत्लेआम को संचालित किया था। लेकिन वही नेओग आज इस बात को स्वीकार करने से नहीं हिचकते कि वे जल्दी से जल्दी अच्छी हिंदी सीख लेना चाहते हैं।

प्रबाल के हिंदी प्रेम के पीछे है हिंदी का उपयोगिता। उनका कहना है कि भारत सरकार के अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व के साथ हिंदी के बिना बातचीत की आप कल्पना ही नहीं कर सकते।
पुलिस के हत्थे चढ़ चुके प्रबाल को हाल ही में कारावास से रिहा किया गया था। वे उल्फा के उस गुट का नेतृत्व कर रहे हैं जो अब भारत सरकार के साथ बातचीत के द्वारा समस्या को हल कर लेने का हिमायती है। ये लोग चाहते हैं कि उनका शीर्ष नेतृत्व सरकार के साथ बातचीत के लिए बैठे। हालांकि अब तक परेश बरुवा तथा उल्फा के अध्यक्ष अरविंद राजखोवा की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
प्रबाल नेओग उल्फा के वरिष्ठ नेताओं में से हैं। 17 सालों तक चरमपंथियों की एक पूरी बटालियन के संचालन का भार इन पर हुआ करता था। पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द बने अपने मुख्य सेनाध्यक्ष परेश बरुवा के निर्देश पर प्रबाल नेओग ने असम में कई हिंदीभाषियों के सामूहिक कत्लेआम को संचालित किया था।

प्रबाल का कहना है कि वे हिंदी अच्छी तरह समझ लेते हैं लेकिन बोल पाने में थोड़ी दिक्कत होती है।
हिंदीभाषियों के कत्लेआम के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सभी मुझ पर उंगली उठाते हैं लेकिन जो भी किया गया वह हाईकमान के निर्देश पर ही किया गया था। उनका कहना है कि वे कभी भी प्रत्यक्ष रूप से किसी भी हत्याकांड से नहीं जुड़े रहे।
चरमपंथी नेओग स्वीकार करते हैं कि हत्या उल्फा की गोली से हो या सेना की गोली से, लेकिन जान किसी निर्दोष की ही जाती है।
बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के क्रम में प्रबाल तथा उसके साथियों का सेना तथा सुरक्षा बलों के अधिकारियों से साबका पड़ा। अमूमन राज्य के बाहर से आने वाले इन अधिकारियों के साथ विचार-विनिमय के लिए दो ही विकल्प हैं। हिंदी या अंग्रेजी। इसीलिए प्रबाल नेओग ने अपने साथियों को यह हिदायत दी है कि अभ्यास के लिए रोजाना आपस में हिंदी में बातचीत की जाए। भाषा सीखने का आखिर यह अनुभवसिद्ध तरीका तो है ही।
प्रबाल का कहना है कि राष्ट्रीय मीडिया वाले अपनी सारी बातें हिंदी या अंग्रेजी में ही पूछते हैं।
ऐसे में यदि उनके सवालों का जवाब असमिया में दिया जाए तो राज्य के बाहर वाले उसका मतलब नहीं समझ पाएंगे। इन्हीं कारणों से 'हमारे लिए धाराप्रवाह हिंदी और अंग्रेजी बोल पाना जरूरी हो गया है'।
प्रबाल का कहना है कि वे हिंदी अच्छी तरह समझ लेते हैं लेकिन बोल पाने में थोड़ी दिक्कत होती है।
हिंदीभाषियों के कत्लेआम के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सभी मुझ पर उंगली उठाते हैं लेकिन जो भी किया गया वह हाईकमान के निर्देश पर ही किया गया था। उनका कहना है कि वे कभी भी प्रत्यक्ष रूप से किसी भी हत्याकांड से नहीं जुड़े रहे।
चरमपंथी नेओग स्वीकार करते हैं कि हत्या उल्फा की गोली से हो या सेना की गोली से, लेकिन जान किसी निर्दोष की ही जाती है।


उल्फा के असमिया मुखपत्र स्वाधीनता तथा अंग्रेजी मुखपत्र फ्रीडम में अक्सर 'हिंदी विस्तारवाद' शब्दों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इन दो शब्दों के इस्तेमाल के द्वारा उल्फा असम में हिंदी की बढ़ती उपयोगिता का विरोध करता रहा है। किसी समय उल्फा ने असम में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर भी बंदिश लगाई थी। उन दिनों सिनेमाघर मालिकों को हिंदी फिल्में दिखाने के लिए पुलिस सुरक्षा पर निर्भर रहना पड़ता था।
उल्फा के अलावा असम के पड़ोसी मणिपुर राज्य के चरमपंथी भी हिंदी का प्रबल विरोध करते रहे हैं। असम में चरमपंथियों के हिंदी विरोधी फतवे नाकामयाब हो गए, लेकिन मणिपुर की राजधानी इंफाल में आपको किसी भी सिनेमाघर में हिंदी फिल्में आज भी देखने को नहीं मिलेगी। यही नहीं केबल आपरेटर भी चरमपंथियों के डर से हिंदी चैनलों से परहेज करते हैं।
नगालैंड के अलगाववादी संगठनों द्वारा हिंदी का विरोध किए जाने की बात सामने नहीं आई। एनएससीएन (आईएम गुट) के चरमपंथी सरकार के साथ बातचीत के दौरान इस बात की दुहाई भी दे चुके हैं कि उन्होंने कभी भी भारत की राष्ट्रभाषा का विरोध नहीं किया।
पूवोत्तर के नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम में संपर्क भाषा के रूप में हालांकि अंग्रेजी का अच्छा-खासा इस्तेमाल होता है। लेकिन अरुणाचल प्रदेश में हिंदी को ही संपर्क भाषा का स्थान प्राप्त है। इसी तरह मेघालय में भी भले ही पढ़े-लिखे लोग संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हों लेकिन औपचारिक शिक्षा से वंचित आम लोगों के लिए अपने कबीले से बाहर के लोगों से बातचीत करने का एकमात्र साधन हिंदी ही है।
पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी प्रदेशों में बोलचाल की हिंदी का अपना ही अलग रूप है जो कई बार मनमोहक छवियां पेश करता है। जैसे, बस यात्रा करते समय अचानक आपके कानों में ये शब्द पड़ सकते हैं - 'गाड़ी रोको हम यहां गिरेगा'।

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

राजनाथ ने कहा कि -


राजनाथ ने कहा कि - ' आतंकवाद से लड़ने के लिये राष्ट्रीय सहमति की जरूरत"
अरे भाई! राजनाथजी जब राष्ट्रीय सहमति से ही आंतकवाद पनप रहा हो तो भला सोच कर बोला करें" आपके गुरू आज-कल आंतकवाद पर चुप है, आप हैं कि बोले ही जा रहे हैं, जरा चुप भी रहा करें। देख नहीं रहे हर तरफ देश में किस तरह धर्मनिपेक्षता के वफ़ादार फल-फूल रहें हैं। मानवाधिकार तक इस मामले में सजग है। आप अनावश्यक बोले ही जा रहें । वैसे ही आपकी ज़बान लड़खड़ाती है। आपकी पार्टी में सभी चाहते हैं कि आप कम से कम बोलें। मेरी सलाह मानें आप अगले चुनाव तक विदेश घुमने चलें जायें।


जगो-जगो देश की जनता
भरो हुंकार देश की जनता,
करो बगावत देश की जनता
उठो-उठो देश की जनता।
जहाँ मांगने आते वोट
मारो इनके सर पर डण्डा,
खुद को चुनो,
खुद को भेजो,
निर्धन-निर्जन किसान को भेजो
महिलाओं या नव-जवान को भेजो,
करो बगावत देश की जनता
उठो-उठो देश की जनता।
      - शम्भु चौधरी


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Fd-453/2, Salt Lake City,
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शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2008

नई रचनाओं का स्वागत

प्रिय दोस्तों,
कवि मंच पर आपकी नई रचनाओं का स्वागत है।
http://kavimanch.blogspot.com/
ई-हिन्दी साहित्य सभा

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2008

कथा-व्यथा: अक्टूबर 2008 का अंक प्रकाशित

प्रिय दोस्तों,
कथा-व्यथा: अक्टूबर 2008 माह का अंक प्रकाशित कर दिया गया है।
नीचे दिये गये लिंक पर देखें।
कथा-व्यथा: अक्टूबर 2008
संपादक
katya-vyatha

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

कवि मंच का श्रीगणेश


प्रिय दोस्तों !
कथा-व्यथा का अगला अंक जल्द ही हम आपको भेजने वाले हैं, कुछ पाठकों का सुझाव था कि कथा-व्यथा के साथ 'कवि मंच' भी चलाया जाय। हमने आप सबकी सलाह को ध्यान में रखते हुए कवि मंच का श्रीगणेश कर दिया है। इसमें आप अपनी कविता सीधे ही पोस्ट कर सकते हैं या हमें मेल द्वारा भी भेज सकतें हैं। जिनको यूनिकोड टंकन नहीं आता हो, वे अपनी कविता हमें डाक द्वारा भी भेज सकते हैं। कवि मंच में अपनी कविता भेजने के लिये कोई शर्त नहीं है। अपनी कविता सीधे पोस्ट करने के लिये हमसे संपर्क करें।
kathavyatha@gmail.com


आपका ही
शम्भु चौधरी
http://kavimanch.blogspot.com/
संचालक

हमारा डाक पता:
शम्भु चौधरी
कथा-व्यथा / कवि मंच
एफ.डी. - 453/2 ,साल्ट लेक सिटी,
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0-9831082737

समीक्षाः ‘‘अभिव्यक्तियों के बहाने‘‘


‘‘अभिव्यक्तियों के बहाने‘‘ कृष्ण कुमार यादव का प्रथम निबंध संग्रह है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी रूप में पदस्थ श्री यादव अपनी व्यस्तताओं के बीच भी सामाजिक-साहित्यिक सरोकारों से कटे नहीं हैं बल्कि उन्हें आत्मसात् करते हुए पन्नों पर उभारने में भी माहिर हैं। सुकरात ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा था कि-‘‘सर्वगुणसम्पन्न और सच्चे अर्थों में शिक्षित वही लोग माने जायेंगे जो सफलता मिलने पर बिगड़ते नहीं, जो अपनी असलियत से मुँह नहीं मोड़ते; साथ ही बुद्धिमान और धीर-गम्भीर व्यक्ति की तरह दृढ़ता से जमीन पर पैर जमाये रखते हैं।‘‘ साहित्य में उसी दृष्टि को संपन्न माना जाता है, जो अपने समय की सभी प्रवृत्तियों को अपने साहित्य में स्थान दे और उनके साथ समुचित न्याय करे। कृष्ण कुमार चूँकि अभी युवा हैं, अतः उनकी सोच में नवीनता एवं ताजगी है।

समालोच्य निबंध संग्रह में कुल 10 लेख/निबंध प्रस्तुत किये गये हैं। भारतीय जीवन, समाज, साहित्य और राजनीति के अंतर्सूयों से आबद्ध इन लेखों में तेजी से बदलते समय और समाज की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। संग्रह का प्रथम लेख ‘‘बदलते दौर में साहित्य की भूमिका‘‘ समकालीन परिवेश में साहित्य और इसमें आए बदलाव को बखूबी रेखांकित करता है। नारी-विमर्श, दलित-विमर्श, बाल-विमर्श जैसे तमाम तत्वों को सहेजते इस लेख की पंक्तियाँ गौरतलब हैं- ‘‘रचनाकार को संवेदना के उच्च स्तर को जीवंत रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप से जोड़कर देखना चाहिए एवं अपने सत्य व समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये।’’ इसी प्रकार ‘‘बाल-साहित्य: दशा और दिशा‘‘ में लेखक ने बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं और उनकी मनोभावनाओं को भी बाल साहित्य में उभारने पर जोर दिया है।

आज लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं वरन् वैचारिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है। कृष्ण कुमार यादव की नजर इस पर भी गई है। ‘‘लोकतंत्र के आयाम‘‘ लेख में भारतीय लोकतंत्र के गतिशील यथार्थ की सच्ची तस्वीर देखी जा सकती है। किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हुए बिना भारतीय समाज के पूरे ताने-बाने को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि इस लेख को महत्वपूर्ण बना देती है। सत्य-असत्य, सभ्यता के आरम्भ से ही धर्म एवं दर्शन के केद्र-बिंदु बने हुये हैं। महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है ने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। भारत सरकार के राजकीय चिन्ह अशोक-चक्र के नीचे लिखा ‘सत्यमेव जयते’ शासन एवं प्रशासन की शुचिता का प्रतीक है। यह हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। इस भावना को सहेजता लेख ‘‘सत्यमेव जयते‘‘ बड़ा प्रभावी लेख है। एक अन्य लेख में लेखक ने प्रयाग के महात्मय का वर्णन करते हुए इलाहाबाद के राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया है। इसमें इतिहास और स्मृति एक दूसरे के साथ-साथ चलते हुए नजर आते हैं।

सृष्टि का चक्र चलाने वाली, एक उन्नत समाज बनाने वाली, शक्ति, ममता, साहस, शौर्य, ज्ञान, दया का पुंज है नारी। एक तरफ वह यशोदा है, तो दूसरी तरफ चण्डी भी। आज महिलायें समुद्र की गहराई और आसमान की ऊँचाई नाप रही हैं। ‘‘रूढ़ियों की जकड़बन्द तोड़ती नारियाँ‘‘ ऐसी नारियों का जिक्र करती है जो फेमिनिस्ट के रूप में किन्हीं नारी आन्दोलनों से नहीं जुड़ी हैं। कर्मकाण्डों में पुरूषों को पीछे छोड़कर पुरोहिती करने वाली, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने वाले ऐसे तमाम कार्य जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है, आज महिलायें खुद कर रही हैं। आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठाई थी पर अब महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं। इसी क्रम में ‘‘लिंग समता: एक विश्लेषण‘‘ नामक लेख पुरूष व महिलाओं के बीच जैविक विभेद को स्वीकार करते हुए सामंजस्य स्थापित करने और तद्नुसार सभ्यता के विकास हेतु कार्य करने की बात करता है।

कोई भी लेखक या साहित्यकार अपने समय की घटनाओं और उथल-पुथल के माहौल से प्रेरित होकर साहित्य की रचना करता है। कृष्ण कुमार भारतीय संस्कृति, उसके जीवन मूल्यों और माटी की गंध को रोम-रोम में महसूस करते हैं। आज हमारी लोक-संस्कृति व विरासत पर चैतरफा दबाव है और बाजारवाद के कारण वह संकट में है। ऐसे में लेखक भारतीय संस्कृति और उसकी विरासत का पहरूआ बनकर सामने आता है। अपने लेख ‘‘शाश्वत है भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत‘‘ में कृष्ण कुमार जब लिखते हैं- ‘‘वस्तुतः हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं‘‘, तो उनसे असहमति जताना बड़ा कठिन हो जाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम‘ का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की हिमायती रही हैं। आज जातिवाद, सम्प्रदायवाद की आड़ में जब इस पर हमले हो रहे हैं तो युवा लेखक की लेखनी इससे अछूती नहीं रहती। बचपन से ही एक दूसरे के धर्मग्रंथों और धर्मस्थानों के प्रति आदर का भाव पैदा करके अगली पीढ़ियों को इस विसंगति से दूर रखने की सलाह देने वाले लेख ‘‘साम्प्रदायिकता बनाम सामाजिक सद्भाव‘‘ में समाहित उदाहरण इसे समसामयिक बनाते हैं।

आज की नई पीढ़ी महात्मा गाँधी को एक सन्त के रूप में नहीं बल्कि व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। महात्मा गाँधी पर प्रस्तुत लेख ‘‘समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी‘‘ उनके जीवन-प्रसंगों पर रोचक रूप में प्रकाश डालते हुए समकालीन परिवेश में उनके विचारों की प्रासंगिकता को पुनः सिद्ध करता है। वस्तुतः गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हैं।

साहित्य रचना केवल एक कला ही नहीं है बल्कि उसके सामाजिक दायित्व का दायरा भी काफी बड़ा होता है। यही कारण है कि साहित्य हमारे जाने-पहचाने संसार के समानांतर एक दूसरे संसार की रचना करता है और हमारे समय में हस्तक्षेप भी करता है। ऐसे में व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बधों की संश्लिष्टता को पहचान कर उसे मौजूदा दौर के परिपे्रक्ष्य में जाँचना-परखना कोई मामूली चुनौती नहीं। कृष्ण कुमार यादव मूकदृष्टा बनकर चीजों को देखने की बजाय भाषा की स्वाभाविक सहजता के साथ इन चुनौतियों का सामना करते हैं, जिसका प्रतिरूप उनका यह प्रथम निबंध-संग्रह है। कृष्ण कुमार यादव की यह पुस्तक पढ़कर जीवंतता एवं ताजगी का अहसास होता है।



पुस्तक: अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह)/ लेखकः कृष्ण कुमार यादव/ मूल्य: 150/- प्रकाशक: शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर
समीक्षक: गोवर्धन यादव, 103. कावेरी नगर, छिंदवाड़ा (म0प्र0)-480001

सोमवार, 6 अक्टूबर 2008

समीक्षा: ज्योति प्रभा - शम्भु चौधरी


ज्योतिप्रसाद अगरवाला का जन्म 17 जून सन् 1903 को डिब्रूगढ़ अंचल के तामुलबारी चाय बगीचे (असम) में हुआ। उन्होंने हाईस्कूल की शिक्षा डिब्रूगढ़ तथा तेजपुर में प्राप्त की। सन् 1921 में वे तेजपुर सरकारी उच्च विद्यालय से 'प्रवेशिका निर्वाचन' परीक्षा में उत्तीर्ण होकर कलकत्ता में चित्तरंजन दास द्वारा स्थापित राष्ट्रीय विद्यापीठ से द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। वह समय था महात्मा गांधी द्वारा संचालित असहयोग का। ज्योतिप्रसाद ने उच्च शिक्षा से मुँह मोड़कर असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। आन्दोलन धीमा होने पर कलकत्ता के नेशनल कॉलेज में अध्ययन कर कुछ दिन अपने ताऊ चन्द्रकुमार अगरवाला द्वारा स्थापित 'न्यू प्रेस' के संचालन में सहयोग दिया। सन् 1926 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये वे इंग्लैण्ड चले गये। वहाँ एडिनबरा विश्वविद्यालय में कुछ दिनों तक अध्ययन करने के बाद जर्मनी में सात माह तक चलचित्र तकनीक संबंधी प्रशिक्षण लिया। 1930 में स्वदेश वापसी के पश्चात आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भागीदारी । 1932 में 15 महीनों का सश्रम कारावास और 500 रुपये का जुर्माने की सजा। 14 वर्ष की आयु में 'शोणित कुँवरी नाटक' की रचना। अन्तिम समय तक नाटक, कविता, जीवनी, शिशु-काव्य और साहित्य की अन्य विधाओं में कार्य। रचना एवं स्वर संयोजन में अभिनवता से भरे असंख्य गीतों के माध्यम से असमीया संगीत को नवरूप प्रदान । 1934 में भोलागुरि चाय बगीचे में अस्थायी 'चित्रवन स्टूडियो' स्थापित कर, सर्वप्रथम असमीया चलचित्र 'जयमती' का निर्माण। 1935 में जयमती का प्रदर्शन। 1936-37 में विष्णुप्रसाद राभा के साथ नाटक जयमती और शोणित कुँवरी के ग्रामोफोन रेकॉर्ड निर्माण। 1937 में तेजपुर में 'जोनाकी' चलचित्र-गृह का निर्माण। 1939 में द्वितीय असमीया चलचित्र 'इन्द्रमालती का निर्माण। 1940 में तेजपुर में संगीत विद्यालय की स्थापना। असम में एक दिन की सरकारी छुट्टी इनके जन्म दिन पर मनायी जाती है। अनके करीब 367 गीत (सभी मूल असमीया भाषा में) प्रकाश में आये। उन्होंने कुछेक गीतों के लिए स्वयं स्वरलिपि तैयार की थी। जसकी अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। इसी कारण असम के संगीत प्रेमियों ने इस संगीत को 'ज्योति संगीत' की संज्ञा दी। जिस प्रकार ' रवीन्द्र संगीत' में भाव, भाषा, स्वर और कल्पना का समन्वय हुआ है उसी प्रकार ज्योतिप्रसाद के गीतों में भी समन्वय के दर्शन होते हैं। ज्योतिप्रसाद ने असमीया संगीत के मूल रूप को अक्षुण्ण रखते हुए, पाश्चात्य संगीत का समावेश कर, एक पथ-प्रदर्शक के रूप में असमीया साहित्य को स्मृद्ध तो किया ही असमीया समाज में नई चेतना का संचार भी किया।


आप प्रकृतितः कवि थे। उनके गद्य में भी उनके कवित्व की सुषमा और सौरभ व्याप्त है। संख्या की दृष्टि से उनकी कविताएँ कम हैं - उनकी 50 सम्पूर्ण कविताएँ एवं 12 शिशु-कविताएँ प्रकाशित ( सभी असमीया भाषा में) हुई हैं। किन्तु काव्य, भाव एवं शिल्प की दृष्टि से वे अनुपम हैं। इसी कारण असमीया काव्य साहित्य में उन्हें शीर्ष स्थान प्राप्त है। कवि के रूप में ज्योतिप्रसाद में कुछ विशेष गुण हैं। उनकी कविता में असमीया जातीयता के भाव की प्रधानता होने पर भी भारतीय तथा विश्वजनीन भाव के साथ कहीं विरोध नहीं झलकता। जातीयता के प्रति निष्ठा रकह्ते हुए, उससे दृढ़तापूर्वक जुड़े रहते हुए भी वे संकीर्ण जातीयता से ऊपर अठने में सक्षम हैं।
ज्योतिप्रसाद को असम में लोग 'रूपकुँवर' के नाम से जानते -पहचानते हैं। यह शब्द उनके नाम का एक अभिन्न अंग बन गया है। ज्योतिप्रसाद को 'रूपकुँवर' की उपाधि किस प्रकार मिली, इस विषय में कई विचार और भ्रान्तियाँ हैं। इस सम्बन्ध में असम के सुप्रसिद्ध कवि आनन्दचन्द्र बरुवा ने कहा है, " अखबार में काम करते समय ज्योतिप्रसाद के 'चित्रवन' में दो दिन रहकर आया और 'रूपकुँवर ज्योतिप्रसाद' नाम से एक लेख प्रकाशित करवाया । मेरे द्वारा कल्पित यह उपाधी लोकप्रिय होकर अजर-अमर हो गयी, इसका मुझे संतोष है। आपके द्वारा रचित कुछ रचनाओं का हिन्दी अनुवाद असम के देवीप्रसाद बागड़ोदिया जी ने की है। इनखी एक पुस्तक 'ज्योति प्रभा' का प्रथम संस्करण जनवरी 1995 एवं दूसरा संस्करण 2003 में प्रकाशित हुआ है। 650 पृष्ठ की यह पुस्तक का मूल्य 250/- + डाकखर्च अतिरिक्त रखा गया है।
पुस्तक प्राप्ति स्थान:
ई- हिन्दी साहिय सभा या आप सीधे श्री देवी प्रसाद बागड़ोदिया, बागड़ोदिया निवास, ज्योतिनगर, डिब्रूगढ़ - 786005, फोन नम्बर: 09435032796 से भी प्राप्त कर सकतें हैं।
Mail To E-Hindi Sahitya Shaba

ज्योतिप्रसाद की कुछ रचनाएँ नीचे दे रहे हैं।
सभी गीत असमीया मूल से हिन्दी में अनुवाद श्री देवी प्रसाद बागड़ोदिया के द्वारा :-



1. रुपहले पानी में सोने की नाव


रूपहले पानी में सोने की नाव
खोल दे रे
खोल दे, खोल दे, खोल दे रे।
तितली के पंखों से उड़ते हैं पाल
फूल के पत्तों की छाजन
वह नील आकाश की किस सीमा में
बाजे असीम की बंसी
वहाँ निद्रा तिमिर भेदकर
जागे अरूण की हँसी
उसी ओर, उसी ओर
खोल दे, खोल दे, खोल दे रे।
जीवन तट का हरियाला खेत
खिले फूल की ज्योति अपार
मरणाकुल फेनिल उफान
पीछे छोड़ जाये
विहर की वेदना में आनन्द झलके
मिलन में विहर का लेख
जीवन मरण जीत चमके
प्रणय का ध्रुवतारा
चमक कर बुलाये रे
प्रकाश की ओर, प्रकाश की ओर
ज्योति के देश की ओर।


2. लुइत* तट का अग्निसुर


लुइत तट का अग्निसुर
तुम्हें लिख दिया अपने रक्त से
लुइत तट का अग्निसुर।
तुम्हें रच दिया
 व्यथा वेदना से
  कर दिया तुम्हें
   अपने हृ्दय की
    अग्निशिखा से
लुइत तट का अग्निसुर।
    छा जाओगे तुम
     लुइत के दोनों पार
चमकना तुम सागर के उस पार
भारत के घर-घर में
परिचय बनाना भावी पृथ्वी में
     नये प्राण में
     नये गान में
विकरित कर
ज्योति स्फुलिंग
जाना दूर अति दूर
लुइत तट का अग्निसुर।
* लुइत : (लोहित) ब्रह्मपुत्र नदी का लोक-प्रचलित नाम।


3. स्वाधीनता के लिये तड़पते प्राण


स्वाधिनता के लिये तड़पते प्राण
    देश का दुःख देख कलपे हिया
भिक्षा की झोली ले निकला है
    विमुख न करना हमें माँ।
त्याग दी हमने विषय वासना
अग्नि लुइत में प्राणों का कर संधान
गृहस्थ घर की लक्ष्मी बहू
    अन्न की मुट्ठी करो दान।
देश का दुःख देख लुइत सिसक रही
    रोक न पाये कोई अश्रुजल
अहिंसा युद्ध में रण की रणभेरी
  बजे बार बार
   जाये तत्काल
    विमुख न करना हमें माँ।



4. कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश


कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश
माँ असमी को पहनाना चाहता
प्रकाशित सुन्दर वेश
कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश
मेरे इस देश के खेतों में सोना
अपने आप उपजे
स्वर्न प्रभात की सुनहरी हँसी
मेरे आँगन में खेले
संध्या लुइत का वक्ष चमका
स्वर्णिम रंग भरे
सुनहले मूँगो के पट से
युवती सुन्दर सजे
रुपहली रेत पर स्वर्णिम धूल
झलमल रूप धरे
स्वर्ण केतकी की, स्वर्ण रेणु झरे
शिल्पी दल का स्वर्णिम स्वप्न
 हरित वन विचरे।
  स्वर्णिम देश की
महापुरुष की
शंकर माधव* की
 स्वर्ण मूल्या संस्कृति
  देती प्रकाश
   इस पृथ्वी को
    स्वर्णिम जीवन की
महा मनीषा
महा प्रतिभा जन जीवन की
स्वर्णीम सपनों की
इसी देश में स्वर्णिम भविष्य की
  स्वर्ण ज्योति जले
इसी देश में शिल्पी मन के
  महा स्वप्न की
इस पृथ्वी के स्वर्ण यथार्थ की, स्वर्णिम पहचान
  स्वर्ण चित्र में ढले।
बोधन कर विश्व शिल्पी मन
इसी देश में जनजीवन में
स्वर्णिम मन की स्वर्णिम पंखुड़ी
  स्वर्ण हँसी सी खिले।

* शंकर माधव: महापुरुष शंकरदेव


5. मनुष्य जन्म लेकर कौन


मनुष्य जीवन लेकर कौन
पशु का खेल खेलो?
देव किरीट पहन भाल पर
राक्षस रूप धरो
आसुरी नृत्य करो
स्वर्ग की छवि पृथ्वी पर चाहकर
नर्क की ओर डग भरो
अपनी आँख आप फोड़कर
गहरे गर्त गिरो।
ज्ञानी को तू मूर्ख बताये
हँसे आप ही आप ही रोये
खुद को मार रहा खुद ही
गली गली घूमो पगलाये।

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2008

नहीं चाहिए दागी नेता, मुन्नाभाई लाओ





नेताजी ने खद्दर पहना, और लगा ली टोपी
भाषण देने बुला रहा था, उनका चमचा गोपी
उनका चमचा गोपी, कि हाथ में लाठी भी इक ले ली
कमर में बांधी गोलघड़ी, औ साथ चली एक चेली
भाषण खूब जमा नेता का, बोले बापू का है देश
सबक सिखा देंगे हम सबको, दे दो थोड़ी कैश
दे दो थोड़ी कैश कि नगद बिन काम न होगा
मर्डर, डकैती केस में हमने जेल में काफी भोगा
अब हम वचन दे रहे साधो, बापू के रस्ते जाएंगेे
नहीं करेंगे हिंसा, अब सच्चा पथ अपनाएंगे
तभी भीड़ से उठकर आगे, आया एक भोला बच्चा
बोला तुम तो दो नंबरी हो, देश खा गए कच्चा
नहीं भरोसा तुम पर हमको, तुम नहीं गांधी वादी
भीतर से हो बुलेट प्रूफ और ऊपर पहने खादी
तुम जैसे कमबख्तों से ही हो रहा देश नीलाम
जाओ जेल में पीसो चक्की, तुम हो नमक हराम
किया भरोसा तुम जैसों पे, जनता भोली भाली
कैसे सुखे सुखे थे कल, आज चेहरे पे लाली
नारायण इन गद्दारों से अब तो हमें बचाओ
नहीं चाहिए दागी नेता, मुन्नाभाई लाओ
नहीं चाहिए दागी नेता, मुन्नाभाई लाओ

Written & sent by
Sonu-Monu Dugar (18 years)
Bhubaneshwar
Selected by
Chirag-Chaman Chandalia
Kolkata

शनिवार, 27 सितंबर 2008

किस्मत की बलिहारी भइया

कुंवर प्रीतम

किस्मत की बलिहारी भइया, किस्मत की बलिहारी भइया
मेहनतकश को भूख नसीब पर, खाए जुआरी माल-मलइया
टाटा बिरला सेज बनावैं, हाथ बटावे कॉमरेड भइया
मार भगावें गरीब मजूर को, जमीन तुम्हारी काहे की भइया
भागो-भागो दूर गरीबो, देस तुम्हारा नहीं रहा अब
इंडिया शाइनिंग, इंडिया शाइनिंग, देत सुनात दिन-रात है भइया

गान्हीजी के देस में हमरी, हुई हाल ई काहे भइया
पूछा इकदिन माट साब से, बोले उड़ गई तोरी चिरइया
अब जे इस देस में रहबै, जै हिन्द बोली बन्द करो
भारतवर्ष का वासी हौ तो, अंखियां अपनी बन्द करौ
नाम रटो इटली मइया के, सोनिया देवी कहात हैं भइया
काका कहिन हार के हमसै, ले चल जीवत मशान रे भइया
हम न जीइब अब ई कलियुग में, देस हमार ना रहा ई भइया

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

हिन्दी पत्रकारिता के एक पराक्रमी युग का अवसान


प्रकाश चण्डालिया
संपादक 'राष्ट्रीय महानगर' (हिन्दी साप्ताहिक)


हिन्दी दैनिक सन्मार्ग के संचालक-संपादक श्री राम अवतार गुप्ता का मंगलवार 23 सितंबर को स्वर्गवास हो गया। वे 83 वर्ष के थे। अदम्य साहस और प्रबल इच्छाशक्ति के प्रतीक गुप्ताजी ने सन्मार्ग को निर्विवाद रूप से पूर्वी भारत का सर्वाधिक प्रसारित हिन्दी दैनिक बनाया। किसी जमाने में वे इस समाचार पत्र के प्रबन्धक हुआ करते थे। तत्कालीन संचालकों ने जब अखबार को बन्द करने का निर्णय किया तो श्री गुप्ता को यह फैसला रास न आया और उन्होंने मालिकों से सन्मार्ग खरीदने की इच्छा प्रकट की। अत्यन्त संघर्ष के बाद उन्होंने सन्मार्ग खरीदा, इसे बखूबी पटरी पर लाए और जीवन की अंतित सांस तक इसकी विकास यात्रा के सारथि बने रहे। उनके इकलौते पुत्र का वर्षों पहले असामयिक निधन हुआ था। इस कारण इस समाचार पत्र को उन्हें स्वयं के पराक्रम से ही संचालित करना पड़ा। बल्कि यूं भी कहा जा सकता है कि कालान्तर में सन्मार्ग परिवार के सभी सदस्य इनके पुत्र सरीखे हो गए। गुप्ताजी अंतिम समय तक अखबार में निरंतर निखार लाने में लगे रहे। न्यूजप्रिंट की कीमतों का हिंसाब तो कोई गुप्ताजी से सीखे। विज्ञापन के क्षेत्र में भी वे एक-एक सेंटीमीटर का मोल समझा करते थे। हिन्दी समाचार पत्र संचालकों में उनका नाम देश भर में आदर के साथ लिया जाता रहा है। वे समाचारपत्र संचालकों की अखिल भारतीय संस्था आईएनएस के पदों पर भी रहे। प्रतिष्ठित मातुश्री पुरस्कार से भी उन्हें नवाजा गया था। श्री राम अवतार गुप्ता अन्य सम्पादकों के मुकाबले आत्मप्रचार से सर्वदा दूर रहे। ऐसा भी नहीं था कि शोहरत ने उन्हें दंभी या आत्ममुग्ध बना दिया था। हिन्दी पत्रकारिता के विकास के लिए उनकी प्रेरणा से अ.भा.हिन्दी पत्रकारिता विकास परिषद की स्थापना की गयी।
गुप्ताजी पर रामजी की कृपा अवश्य थी। सन्मार्ग की यात्रा रामनवमी से शुरू हुयी, उनका नाम राम अवतार था और उनका निधन मंगलवार को हुआ। यह महज संयोग हो सकता है, पर आस्था रखने वाले के साथ प्रभु कहीं न कहीं लीलाएं करते ही रहते हैं। गुप्ताजी के कक्ष में रामदरबार का चित्र सहज ही किसी की भी श्रद्धा का केंद्र बन जाता था।
देश के किसी कोने में भी यदि राष्ट्रीय स्तर का कोई समाचारपत्र प्रकाशन यात्रा शुरु करता है तो स्थानीय स्तर पर अपेक्षाकृत कम संसाधनों पर चलने वाले अखबारों पर प्रतिकूल असर तो पड़ता ही है। पर सन्मार्ग इस मामले में अपवाद माना जा सकता है। नवभारत टाइम्स भी यहां से निकला पर सन्मार्ग को टक्कर नहीं दे पाया। 1991 में इण्डियन एक्सप्रेस के हिन्दी दैनिक जनसत्ता का प्रकाशन शुरू होने पर गुप्ताजी को विचलित होते अवश्य देखा गया था, पर उन्होंने अपनी दूरदर्शिता के साथ सन्मार्ग में कई आमूलचूल परिवर्तन करते हुए पेज बढ़ाए, नतीजतन जनसत्ता की भारी भरकम सम्पादकीय फौज और तेवरों से लोहा लेने में वे कभी पीछे नहीं रहे। जनसत्ता के बाद शहर में और कई बड़े घरानों के अखबारों ने अपनी प्रकाशन यात्रा शुरु अवश्य की, पर सन्मार्ग के करीब आजतक कोई नहीं है। सन्मार्ग का कोलकाता संस्करण देश के इस भूभाग के हजारों हिन्दी पाठकों का पहला प्यार है। हजारों लोगों की नींद सन्मार्ग देखकर खुलती है।
हालांकि यह भी सत्य है कि गुप्ताजी ने जब पेज तीन (अब 4 पर) पर छपास रोगियों की फोटुओं को विज्ञापन का दर्जा देकर प्रकाशित करना शुरु किया तो सुधी पाठक इसे पचा नहीं पाए। आज भी इसे पत्रकारिता के मानदण्ड के खिलाफ माना जाता है। पर इस सम्बन्ध में गुप्ताजी से पूछा जाता तो वे कभी मुंह नहीं छुपाते थे। साफ कहते-यार, यहां हर किसी को अपनी फोटू छपाने का रोग है, किसकी छापें, किसको इनकार करें। छपास रोगियों को आज विज्ञापन की दर से सन्मार्ग में अपनी तस्वीर छपानी पड़ती है। हालांकि यह सिलसिला और अखबारों में भी है, लेकिन सन्मार्ग के अपने तेवर हैं। यही कारण है कि लोग सन्मार्ग में हजारों रुपए देकर फोटुएं छपाते हैं। सन्मार्ग में फोटू छपाने के लिए कुछ का सालाना बजट तो लाखों का है। इसमें भी दो राय नहीं कि ऐसा अधिकतर मारवाड़ी समाज के कुछ मध्यमवर्गीय लोग ही अपनी भड़ास निकालने के लिए करते हैं। कभी कभी तो छपास रोगियों की फोटुएं हास्यास्पद बन जाती हैं। इन सब स्थिति को भांपते हुए लगता है, गुप्ताजी ने सही कदम उठाया था।
गुप्ताजी अन्यान्य सम्पादकों की तरह सामाजिक संस्थाओं में अधिक फेरी नहीं लगाते थे। जब उनकी ऐसा करने की उम्र थी, उनका अपना दौर था, तब भी नहीं। उन्हें इतवारी समारोहों में मंचों पर ज्यादा नहीं देखा जाता था। यही नहीं, सन्मार्ग कार्यालय के समीप ही विशुद्धानन्द सरस्वती विद्यालय में मारवाड़ी समाज का पारम्परिक होली व दीपावली का सम्मेलन हुआ करता है। मारवाड़ी समाज का प्रतिनिधि प्रीति सम्मेलन होने का दावा किया जाता है, पर गुप्ताजी शायद ही ऐसे आयोजनों में शरीक हुए। मेल-मिलाप की रस्म अदायगी के लिए वे कार्यक्रम की समाप्ति पर सभा स्थल पर अवश्य जाते और लोगों से दुआ-सलाम कर वापस अपने कक्ष में लौट जाया करते। सम्मेलन की सभा में मैंने हाल के वर्षों में उन्हें कभी नहीं देखा। इसके पीछे कारण कुछ भी रहा हो, पर मुझे गुप्ता जी के इस कदम पर स्वाभिमानी सम्पादक की भूमिका नकार आती है। वैसे भी जिस प्रतिनिधि प्रीति सम्मेलन में समाज की नेतागिररि करने वाले बमुश्किल 100-150 लोग उपस्थित होते हों, वहां गुप्ताजी जैसे वरिष्ठ पत्रकार की उपस्थिति उनकी कमजोरी पर मुहर ही तो लगाती।
इन पंक्तियों के लेखक को गुप्ताजी का स्नेह एवं आशीर्वाद सदैव प्राप्त हुआ। सन 1999 में मेरे संपादन में निकलने वाले महानगर गार्जियन पर हमला होने पर गुप्ताजी को सूचित किया तो न सिर्फ उन्होंने तत्कालीन विधायक स्व. सत्यनारायण बजाज की तरह हर संभव सहयोग का आश्वासन देकर मनोबल बढ़ाया बल्कि सन्मार्ग में इस घटना को प्रमुखता से प्रकाशित भी किया था। यहां अग्रज पत्रकार की भूमिका साफ नकार आती है।
राष्ट्रीय महानगर को भी श्री राम अवतार गुप्ता ने सदैव अपने स्नेह से नवाजा। सांध्य दैनिक से साप्ताहिक संस्करण में तब्दील किए जाने के उपरान्त नए तेवर में आए राष्ट्रीय महानगर की पेज सज्जा और सामग्री के चयन पर उन्होंने अत्यन्त हर्ष व्यक्त किया था और अपना भरपूर आशीर्वाद दिया था। सन्मार्ग के प्रधान संवाददाता सुरेंद्र सिंह ने बताया कि गुप्ताजी ने किस प्रकार सन्मार्ग के सम्पादकीय विभाग के सहयोगियों के समक्ष राष्ट्रीय महानगर को सराहा था। (यह अलग बात है कि जब श्री सुरेंद्र सिंह ने मुझे फोन पर यह जानकारी दी थी, मैं शहर के ही एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार के साथ अहमदाबाद से उदयपुर की यात्रा पर था और वे महाशय राष्ट्रीय महानगर के नए तेवर पर अपनी ईर्ष्यात्मक प्रतिक्रिया दे रहे थे)।
वरेण्य श्री राम अवतार गुप्ता के निधन पर ई-हिन्दी साहित्य सभा परिवार की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। गुप्ताजी का नहीं रहना सन्मार्ग के लिए तो दु:खद है ही, पत्रकारिता से जुड़े हर शख्स के लिए यह निजी क्षति जैसी घटना है।
दु:ख की इस घड़ी में उनके उत्तराधिकारी पौत्र विवेक गुप्ता तथा समस्त परिजनों, सन्मार्ग परिवार के समस्त साथियों को परमपिता संबल प्रदान करें, यही कामना है।

रविवार, 21 सितंबर 2008

श्रद्धांजलि : डॉ.प्रभा खेतान को




प्रसिद्ध कथाकार डॉ. प्रभा खेतान नहीं रहीं। 66 वर्षीय प्रभा खेतान ने कल देर रात कोलकाता में अंतिम सांस ली। दो दिन पहले ही उन्हें सांस में तकलीफ की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को उनकी बाईपास सर्जरी की गई थी, जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई थी।


कवयित्री, उपन्यासकार और नारीवादी-अस्तित्ववादी चिन्तक डॉ. प्रभा खेतान का 19 सितम्बर 2008 को कोलकाता में निधन हो गया। दिनांक 21.09.2008 को इनके पार्थिव शरीर को पंचतत्त्व में विलिन कर दिया गया । गत सप्ताह ही उनसे मेरी मुलाकात हुई थी। आप चाहती थी कि इनके समस्त साहित्य यूनिकोड में परिवर्तित कर इन्टरनेट के पाठकों को उपलब्ध करा दिया जाय। इस क्रम में उनसे दो-तीन बार फोन पर बात भी हुई। अन्तीम बार जब वे हॉस्पीटल में थी तब आप से बात हूई थी। आज जब समाचारपत्र देखा तो, हम सभी दंग रह गये। इनके जीवन जीने का ढंग एक दम से निराला था। संपन्न परिवार में जन्म लेने के बाद भी आपने अपने आस पास कभी संपन्नता को प्रदर्शित नहीं होने दिया। आपका जन्म 1 नवंबर 1942 को हुआ। आपकी प्ररंभिक शिक्षा व उच्च शिक्षा कोलकाता में हुई। दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने "ज्याँ पॉल सार्त्र के अस्तित्त्ववाद" पर पीएचडी की। आपने 12 वर्ष की उम्र से ही अपनी साहित्य यात्रा का शुरुआत कर दिया था। उनकी पहली रचना (कविता) सुप्रभात में छपी थी, तब वे सातवीं कक्षा की छात्रा थी। 1980-81 से आप पूर्ण कालीन साहित्यिक सेवा में लग गई। आपकी छः कविता संग्रह 'अपरिचित उजले' (1981), 'सीढ़ियां चढ़ती हुँ मैं' 91982), 'एक और आकाश की खोज में' (1985), 'कृष्णधर्मा मैं' (1986), 'हुस्नोबानो और अन्य कविताएं' (1987), और 'अहिल्या ' (1988),। आपकी कई गद्य- उपन्यास 'आओ पेपे घर चले ' काफी चर्चित उपन्यास रहा। बाद की औपन्यासिक कृतियां 'तालाबंदी' (1991), ' अग्निसंभवा ' (1992) , 'एड्स ' ,' छिन्नमस्ता ' (1993), ' अपने -अपने चहरे ' (1994), ' पीली आंधी ' (1996), स्त्री पक्ष (1999) सभी उपन्यास साहित्यिक क्षेत्र में प्रशंसित रही। डॉ. प्रभा खेतान के साहित्य में स्त्री यंत्रणा को आसानी से देखा जा सकता है। बंगाली स्त्रियों के बहाने इन्होंने स्त्री जीवन में काफी बारीकी से झांकने का बखूबी प्रयास किया। आपने कई निबन्ध भी लिखे। सिमोन द बोउवा की पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ के अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ ने उन्हें स्त्री विमर्श की पैरोकार के तौर पर पहचान दी। आपकी आत्मकथा 'अन्या से अनन्या ' की तो पूरे हिन्दी जगत में धूम रही । डॉ. प्रभा खेतान को स्त्रीवादी चिन्तक होने का गौरव जहाँ प्राप्त हुआ वहीं स्त्री चेतना के कार्यों में सक्रिय रूप से भी आप हिस्सा लेती रहीं। आप 'कोलकत्ता चेम्बर आफ कामर्स ' की पहली महिला अध्यक्षा भी रहीं। उन्हें ' 'प्रतिभाशाली महिला पुरस्कार ' और टॉप पर्सनैलिटी अवार्ड ' मिला। साहित्य में उल्लेखनीय अवदान के लिये केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का 'महापंडित राहुल सांकृत्यायन ' पुरस्कार राष्ट्रपति के हाथों मिला। अब तक आपकी 6 कविता संग्रह, 7 उपन्यास, 2 उपन्यासिका, 6 चिन्तन, 1 आत्मकथा, 2 अनुवाद प्रकाशित व कई साहित्य संपादन का कार्य। धर्मयुग, हँस, जनसत्ता, कथा देश, सहारा समय, आऊटलुक पत्रिका, तद्भव, दैनिक जागरण में आपके कई लेख प्रकाशित। प्रभा खेतान फाउन्डेशन की संस्थापक अध्यक्षा, नारी विषयक कार्यों में सक्रिय रूप से भागीदारी रही, फिगरेट नामक महिला स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना, 1966 ई. में, 1976 से चमड़े तथा सिले-सिलाए वस्त्रों का निर्यात, अपनी कंपनी 'न्यू होराईजन लिमिटेड' की प्रबंध निदेशिका, हिन्दी भाषा की लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवियित्री तथा नारीवादी चिंतक का इस तरह चले जाने से हिन्दी साहित्य जगत को काफ़ी क्षत्ति हुई है। ई-हिन्दी साहित्य सभा की तरफ से आपको अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि - शम्भु चौधरी

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

आजतक द्वारा किये जा रहे पाँच दिन प्यापी बहस में हिस्सा लें:


दिल्ली में सीरियल धमाके और बंगलौर - अहमदाबाद के पहले ही सूचनातंत्र को मेल भेजकर इंडियन मुजाहिद्दीन नामक धर्मनिरपेक्ष संस्था ने यह बता दिया था कि भारत की सुरक्षा में लगे ये खुफियातंत्र कितने सतर्क हैं । हम जिस वोट के लिए व्याकुल दिखते हैं, धीरे-धीरे वे तत्त्व ही हमारी धर्मनिरपेक्षता को लील रहे हैं । राजस्थान के बाद ठीक तीन माह के भीतर ही इन तत्त्वों ने एक के बाद एक शहर को निशाने पर ले लिया और हमारी एजेंसियां देखती रह गई । शायद इनको इस बात का खतरा था कि कहिं इनके किसी भी हरकतों से देश की धर्मनिरपेक्षता को खतरा न हो जाय, नहीं तो ऐसी क्या बात थी कि राजस्थान, बंगलौर - अहमदाबाद में हुए धमाके के बाद देश की राजधानी में पुनः बड़ा धमाका हो गया और हम देखते रह गये । श्रृंखलाबद्ध इन धमाकों ने यह बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी कि इन तत्त्वों की ताकत हमारी राजनीतिज्ञों के धर्मनिरपेक्ष चहेरे को कितना काला कर रही है, अभी हाल ही में इनकी नंगी प्रस्तुतीकरण हमें संसद के भीतर देखने को मिली थी। ईमेल संदेश इस बात का भी संकेत देते हैं कि इन तत्त्वों के पीछे किसी आतंकवादी संगठन का हाथ न होकर धार्मिक कट्टरवादीता है । निश्श्चित रूप से यह देश के राजनेताओं के ढ़ोंगी धर्मनिरपेक्षता का ही परिणाम माना जायेगा । ऐसा प्रतीत होता है कि इनको देश से कोई हमदर्दी नहीं कोई वोट के, तो कोई नोट के लिये संसद में जाता है । हर मानसिकता में धर्मनिरपेक्षता को बचाने की ताकत काम कर रही है । ऐसी धर्मनिरपेक्षता जो इनके वोट बेंक को बरकरार रख पाये । मानो वोट के लिए देश को भी बेच देंगे ये धर्मनिपेक्षता के पहरेदार ।
इस धर्मनिरपेक्षता ने देश को अंधकार में धकेल दिया है । कोई भी सरकार कुछ करने से घबराने लगी, सुरक्षा एजेंसियां कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर पाती, कानून को पंगू बना दिया गया है, लोग मारे जा रहे हैं और यह सब हम देखकर भी लाचार हो चुके हैं । शायद हमारी नियती को घुन लग गया है जो धीरे-धीरे हमारी धर्मनिरपेक्ष पहचान को भीतर ही भीतर चाटता जा रहा है। किसी अजगर की तरह निगल जाये इससे पहले हमें इसके परिणाम को खुली आंखों से देखना होगा न कि वोट की आंखों से । यह मामला धारा 370 का नहीं, देश की एकता और अखंडता से ताल्लुक रखता है। जिस तरह सांप्रदायिकाता से हमें खतरा है ठीक इससे कई गुणा हमें धर्मनिपेक्षता से होने लगा है, हमें किसी तीसरे मार्ग को तलाशना होगा जहाँ ये दोनों सर को कुचले जा सकें । आपकी राय भी हमें लिख भेजे। - शम्भु चौधरी

Email: Ehindi Sahitya shabha

सोमवार, 15 सितंबर 2008

कथा-व्यथा का सितम्बर माह का अंक

मित्रों,
कथा-व्यथा का सितम्बर माह का अंक प्रकाशित कर दिया गया है।

इस अंक में देखें:


संपादकीय
पत्र-पत्रिका प्राप्ती
सूचना: कथा महोत्सव-2008
पाब्लो नेरुदा
राजनैतिक बनाम सामाजिक लोकतंत्र
समीक्षा काव्य संग्रह-‘‘अभिलाषा’’
श्रद्धांजलि: कवि वेणुगोपाल को

कविताएं:


दिल का जख्म - महेश कुमार वर्मा, पटना
इन्दिरा चौधरी की दो कविता
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध" की दो कविता
हर राह में सफलता है -सुनील कुमार सोनु
मैं बारूद में हूँ -पवन निशान्त
कुन्डलिया: यही है भैया सावन -देवेन्द्र कुमार मिश्रा
दीप्ति गुप्ता की मौत पर लिखी कविताएं
श्रीमती श्रद्धा जैन की तीन कविताएं
श्रीमती कुसुम सिन्हा की तीन कविताएं
नीचे दिये गये लिंक पर देखें।
http://kathavyatha.blogspot.com
katya-vyatha september-08

शनिवार, 13 सितंबर 2008

हिन्दी दिवस विशेष: विदेशों में हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ

-सुभाष निगम-


हिन्दी पत्रकारिता का विदेशों में उन्नयन यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि जिस प्रकार से भारत में हिन्दी-पत्रकारिता विभिन्न चरणों में विकसित हुई है, ठीक उसी प्रकार से विदेशों में भी प्रवासी भारतियों के द्वारा उसके विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। विश्व के ऐसे अनेक देश हैं जहाँ शताब्दियों पूर्व भारतीय जाकर बस गये थे और उनके वंशज आज भी वहाँ निवास करते हैं, यद्यपि पीढ़ियों से रहते हुए उन्होंने न केवल वहाँ की वेशभूषा, रीति-रिवाज और आचार-विचार के साथ ही बोल-चाल की भाषा को भी अपना लिया है, परन्तु उनमें बहुत से ऐसे भी है जो अपने धर्म, संस्कार और भाषा से भावात्मक रूप में जुड़े हुए हैं। उन्हीं के द्वारा समय-समय पर हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आरम्भ किया गया था, जो अनेक रूपों में आज भी हो रहा है।
इनके मूल में हिन्दी पत्रकारिता के प्रति निष्ठा की भावना ही है। हालांकि व्यावहारिक रूप से लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से उसमें हिन्दी के साथ ही स्थानीय भाषाओं का अंश भी प्रकाशित किया जाता है और वे द्विभाषी अथवा त्रिभाषी आदि रूपों में प्रकाशित हो रहे हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता का जन्म सन् 1883 में हुआ था। इसी वर्ष लंदन से ‘हिन्दोस्थान’ नामक त्रैमासिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ था। किसी भी विदेश से प्रकाशित होनेवाले सर्वप्रथम हिन्दी पत्र के रूप में इसकी मान्यता है। इसके संस्थापक राजा रामपाल सिंह थे। यह त्रिभाषी रूप में प्रकाशित होता था और इसमें हिन्दी के साथ ही उर्दू तथा अंग्रेजी के अंश भी रहते थे। दो वर्ष तक वहाँ से प्रकाशित होते रहने के पश्चात् सन् 1885 में यह राजा रामपाल सिंह द्वारा ही कालाकांकर (अवध) से प्रकाशित होना प्रारम्भ हुआ। पंडित मदन मोहन मालवीय इसके प्रधान सम्पादक थे। यहाँ से यह साप्ताहिक रूप में प्रकाशित होता था। सन् 1887 में यह दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। अमृतलाल चक्रवर्ती, शशि भूषण चटर्जी, प्रताप नारायण मिश्र, बाल मुकुन्द गुप्त, गोपाल राम गहमरी, लाल बहादुर, गुलाबचन्द चैबे, शीतल प्रसाद उपाध्याय, राम प्रसाद सिंह तथा शिवनारायण सिंह इसके सम्पादक रहे थे। हिन्दी पत्रकारिता के विकास में इसका ऐतिहासिक महत्व है।

कालांतर में इंगलैण्ड की राजधानी लंदन से ही कतिपय अन्य हिन्दी पत्र भी प्रकाशित हुए। इसमें शांता सोनी द्वारा सम्पादित ‘नवीन’ शीर्षक पत्र भी उल्लेखित किया जा सकता है। यह साप्ताहिक रूप में प्रकाशित होता था। इसी प्रकार एस.एन. गौरीसरिया के सम्पादकत्व में ‘सन्मार्ग’ शीर्षक से भी एक पत्र लंदन से प्रकाशित हुआ था। पी.जे. पेंडर्स ने भी एक पत्र यहीं से प्रकाशित किया था, इसका शीर्षक ‘केसरी’ था। इसी प्रकार सुकुमार मजूमदार के सम्पादकत्व में ‘प्रवासी’ शीर्षक से प्रकाशित एक पत्र भी उल्लेखनीय है।
लंदन से जो पत्र-पत्रिकाएं हिन्दी में प्रकाशित हुई, उनमें जगदीश कौशल द्वारा सम्पादित ‘अमरदीप’ का नाम भी उल्लेखनीय है। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसी प्रकार लंदन में भारत से प्रकाशित ‘आज’ के प्रतिनिधि धर्मेन्द्र गौतम ने भी ‘प्रवासिनी’ शीर्षक से एक पत्र का सम्पादन आरम्भ किया था जो त्रैमासिक प्रकाशित होता था।

‘सोवियत संघ’ शीर्षक से एक पत्र मास्को से प्रकाशित होता है। इसके प्रधान सम्पादक निकोलोई गिबाचोव तथा चित्रकार अलेक्सांद्र जितो मिस्कीं हैं। इसका प्रकाशन सन् 1972 में आरम्भ हुआ था।

जापान से प्रकाशित हिन्दी पत्रों में ‘सर्वोदय’ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसका सम्पादन त्रोश्यो तनाका द्वारा किया जाता है। जापान से ही एक अन्य हिन्दी पत्रिका ‘ज्वालामुखी’ शीर्षक से भी प्रकाशित होती है। इसकी विशेषता यह है कि यह जापानी नागरिकों द्वारा ही संपादित की जाती है और इसमें उन्हीं के द्वारा हिन्दी में लिखे लेख प्रकाशित होते हैं।
फ्रांस से भी हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में कतिपय उल्लेखनीय प्रयत्न परिलक्षित होते हैं। फ्रांस की राजधानी पेरिस से ‘यूनेस्को कूरियर’ नामक पत्र का प्रकाशन उल्लेखनीय है।

मारीशस से भी हिन्दी में अनेक पत्र-पत्रिकाएं समय-समय पर प्रकाशित हुई। इसमें ‘हिन्दुस्तानी’, ‘जनता’, ‘आर्योदय’, ‘कांग्रेस’, ‘हिन्दू धर्म’, ‘दर्पण’, ‘इण्डियन टाइम्स’, ‘अनुराग’, ‘महाशिवरात्रि’ एवं ‘आभा’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मारीशस से प्रकाशित होने वाला हिन्दी का सर्वप्रथम पत्र ‘हिन्दुस्तानी’ थां इसका प्रकाशन सन् 1909 है। इसके प्रथम सम्पादक मणिलाल थे।

मारिशस से प्रकाशित अन्य हिन्दी पत्रिकाओं में आत्माराम विश्वनाथ द्वारा संपादित ‘जागृति’ भी उल्लेखनीय है। काशीराम किष्टो ने भी मारीशस से प्रकाशित एक हिन्दी पत्र ‘आर्यवीर’ का सम्पादन किया था। इसी क्रय में लक्ष्मण दत्त द्वारा संपादित ‘आर्यवीर’ ‘जागृति’ शीर्षक पत्र भी महत्व रखते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि ‘ओरियंट गजट’ नामक पत्र मारीशस से प्रकाशित हुआ। इसका प्रकाशन आरम्भ 1930 से हुआ। ‘जागृति’ नाम से एक पत्र का प्रकाशन सन् 1940 में हुआ। इसके सम्पादक आत्माराम थे। इसका पूर्व नाम ‘आर्य पत्रिका’ था। ‘मारीशस इण्डियन टाइम्स’ शीर्षक से एक साप्ताहिक पत्र पोर्ट लुई से प्रकाशित हुआ। यह बहुभाषी पत्र था, जिसमें हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के अंश भी रहते थे। सोमदत्त बरबौरी ने पोर्ट लुई से सन् 1968 में त्रैमासिक ‘अनुराग’ का सम्पादन करके हिन्दी पत्रकारिता का उन्नयन किया ।

सूरीनाम देश में भी हिन्दी पत्रकारिता के विकास के संकेत मिलते हैं। यहाँ से अनेक पत्र हिन्दी में दैनिक, साप्ताहिक और मासिक रूप में प्रकाशित हुए। ये पत्र जहाँ इस देश में हिन्दी पत्रकारिता के अस्तित्व के द्योतक हैं वहाँ दूसरी ओर प्रवासी भारतीयों की हिन्दी के प्रति रुचि को भी दर्शाते हैं। इनमें दैनिक ‘कोहिनूर’ अखबार, साप्ताहिक ‘प्रकाश’ और ‘शांतिदूत’ तथा मासिक ‘ज्योति’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

‘अमृतसिंधु नामक’ एक मासिक पत्र नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) से प्रकाशित हुआ। इसके सम्पादक भवानी दयाल थे। इसका प्रकाशन आरम्भ 1990 से हुआ था। इसी क्रम में दक्षिण अफ्रीका के डरबन नामक शहर से ‘धर्मवीर’ नामक पत्र का प्रकाशन सन् 1916 में आरम्भ हुआ था। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसका सम्पादक रल्लाराम गांधीलामल भल्ला ने अमर धर्मवीर पंडित लेखराम की स्मृति में आरम्भ किया था। यह पत्र हिन्दी में प्रकाशित होता था। रल्लाराम गांधीलामल भल्ला उर्दू भाषा में मूल सामग्री प्रस्तुत करते थे तथा उनके सहायक मेहर चन्द भल्ला उसका अनुवाद हिन्दी में करके उसे छपने को देते थे। सन् 1917 में इसका सम्पादन स्वामी भवानी दयाल सन्यासी ने किया। 1919 तक इस दायित्व को सफलतापूर्वक निर्वाह करने के पश्चात् कुछ लेख अंग्रेजी में भी प्रकाशित होते थे।

‘हिन्दी’नामक मासिक पत्रिका मई सन् 1922 में डरबन (दक्षिण अफ्रिका) से प्रकाशित हुई थी। इसका सम्पादन स्वामी भवानी दयाल सन्यासी करते थे। यह अपने समय का प्रवासी भारतीयों का लोकप्रिय पत्र था। इस प्रकार ‘आर्य संदेश’ शीर्षक से एक पाक्षिक ट्रिनिडाड (दक्षिण) से प्रकाशित हुआ था। इसके सम्पादक एल. शिव प्रसाद थे। इसका प्रकाशन आरम्भ सन् 1950 में हुआ था। एक अन्य पत्र ‘आर्यमिक्र’ शीर्षक से भी दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित हुआ था। यह आर्य प्रतिनिधि सभा का मुख पत्र था।
सन् 1904 में अफ्रीका के डरबन नामक स्थान से ‘इण्डियन ओपिनयन’ नामक पत्र प्रकाशित हुआ था। इसका सम्पादन मदन जीत द्वारा आरम्भ किया गया। कुछ समय पश्चात् यह गांधीजी के संरक्षण में फिनिक्स से भी प्रकाशित हुआ था। इस पत्र ने राष्ट्रीय आंदोलन के प्रसार में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। उस पत्र से जो अन्य पत्रकार जुड़े हुए थे उनमें मदनजीत, मनसुख लाल व भवानी दयाल प्रमुख थे। इसका प्रकाशन आरम्भ 1904 में तथा प्रकाशन स्थगित 1914 में हुआ। इस पत्र की एक प्रति का मूल्य 12 शिलिंग था। यह द्विभाषी पत्र था।

बर्मा से भी समय-समय पर हिन्दी की अनेक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती रही है। इनमें ‘प्राची प्रकाश’ ‘जागृति’ तथा ‘ब्रह्म भूमि’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि ‘प्राची प्रकाश’ दैनिक पत्र रंगून से प्रकाशित होता है। यह बर्मा से हिन्दी मंे प्रकाशित होेने वाला दैनिक पत्र है।

अविभाजित भारत में ढाका (संप्रति बंगलादेश) से भी हिन्दी की अनेक महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ 19वीं और बीसवीं षताब्दियों में प्रकाशित हुई हैं। इनमें प्राचीनतम ‘बिहार बन्धु’ हैं। यह पत्रिका मासिक रूप में प्रकाशित होती थी। इसका प्रकाशन वर्ष सन् 1871 है। इसी क्रम में 1880 में एक अन्य मासिक पत्रिका ‘धर्म नीति तत्व’ शीर्षक से भी प्रकाशित हुई थी। इसका प्रकाशन वर्ष भी 1880 है। इसके आठ वर्ष पश्चात् अर्थात 1888 में ‘विद्या धर्म दिपिका’ नामक पत्रिका ढाका से ही प्रकाशित हुई थी। सन् 1889 में ढाका से ही एक अन्य हिन्दी पाक्षिक पत्रिका भी प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक ‘द्वित्र’ था। इसी प्रकार 1904 में ‘नारद’ शीर्षक से भी एक पत्र का प्रकाशन ढाका से आरम्भ हुआ था। सन् 1905 में ‘नागरी हितैषी’ पत्रिका का प्रकाशन भी ज्ञातव्य है। सन् 1911 में ‘तत्व दर्शन’ शीर्षक पत्र का उल्लेख भी आवश्यक है। इस प्रकार 1939 में ‘मेल-मिलाप’ शीर्षक से एक मासिक पत्रिका भी ढाका से ही प्रकाशित हुई थी।

हिन्दी पत्रकारिता में नेपाल से प्रकाशित पत्रों का भी उल्लेखनीय स्थान है। नेपाल की राजधानी काठमाण्डू से ‘नेपाल’ शीर्षक से एक हिन्दी पत्र प्रकाशित होता है। ज्ञातव्य है कि यह पत्र दैनिक रूप में प्रकाशित होने वाला एक विशिष्ट पत्र है। आठमाण्डू से ही प्रकाशित जो अन्य पत्र उल्लेखनीय है उनमें ‘हीमोवत संस्कृत’ पत्र भी है। इसी प्रकार ‘हिमालय’ शीर्षक से भी एक पत्र बीरगंज से प्रकाशित हुआ था। इसी क्रम में ‘नव नेपाल’ शीर्षक से एक साप्ताहिक पत्र काठमाण्डू (नेपाल) से प्रकाशित हुआ। इसके सम्पादक मणिराज उपाध्यक्ष थे। इसका प्रकाशन 1955 से आरम्भ हुआ था।

स्वतंत्रतापूर्व के भारत एवं तत्पश्चात् पाकिस्तान के अन्तर्गत चले गये लाहौर से भी बहुसंख्यक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई हैं। इनमें ‘भारतीय’, ‘विश्वबन्धु’, ‘आर्यबन्धु’, ‘आर्यजगत’, ‘शान्ति’, ‘सुधाकर’, ‘क्षत्रिय पत्रिका’, ‘मित्र विलास’, ‘बूटी दर्पण’ व ‘आकाशवाणी’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त ‘आर्य प्रभा’ शीर्षक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी सन् 1914 में लाहौर से आरम्भ हुआ था। इसके आदि सम्पादक संत राम तथा सहायक सम्पादक महानन्द थे। सन् 1918 से यह पत्रिका साप्ताहिक रूप से प्रकाशित हुई थी। सन् 1914 में ही लाहौर से ‘उषा’ नामक पत्रिका भी प्रकाशित हुई थी। इसके सम्पादक भी संतराम थे। जमानत न देने की असमर्थता के कारण यह पत्र दो वर्ष बाद बन्द हो गया। इसी क्रम में ‘हिन्दी मिलाप’ नामक पत्र का प्रकाशन 11 सितम्बर 1927 को खुशहाल चन्द सुखचन्द (महात्मा आनन्द स्वामी) ने लाहौर से किया था। इसका सम्पादन सुदर्शन तथा बद्रीनाथ बर्मा करते थे। बाद में इसके प्रधान सम्पादक रणबीर तथा सम्पादक यश बने। हरिकृष्ण ‘प्रेमी’, रूपनाथ मलिक और संतराम भी इसके सम्पादकीय विभाग से जुड़े रहे थे। भारत विभाजन काल में इसके सम्पादक आत्म स्वरूप शर्मा थे जिन्होंने 15 अगस्त 1947 को अपना बलिदान कर दिया। सन् 23 सितम्बर 1949 से यश के सम्पादकत्व में यह जालंधर से पुनः प्रकाशित हुआ। इसका उर्दू संस्करण रणवीर के सम्पादकत्व में प्रकाशित हुआ तथा एक अन्य संस्करण युद्धवीर के सम्पादकत्व में हैदराबाद से प्रकाशित होता है। इसका एक अन्य संस्करण लंदन से भी प्रकाशित होता है।

हिन्दी पत्रकारिता के विकास में विदेशों मे जो कार्य हुआ है उसको दृष्टि में रखते हुए फिजी से प्राकशित हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का महत्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यहाँ से बहुसंख्यक पत्रों का प्रकाशन हुआ है जो सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक विषयों के साथ-साथ कृषि विज्ञान आदि से भी सम्बन्धित रहे है। ‘अखिल फिजी कृषक संघ’ शीर्षक से एक ऐसे ही पत्र का प्रकाशन दीनबन्धु के सम्पादकत्व में फिजी से हुआ था। इसी प्रकार ‘किसान’ शीर्षक से भी एक पत्रिका का प्रकाशन बी.बी. लक्ष्मण के द्वारा किया गया था। कृषि विषयक एक अन्य पत्रिका नन्द किशोर के सम्पादकत्व में ‘किसान मित्र’ शीर्षक से भी प्रकाशित हुई थी।
फिजी द्वीप समूह से जो अन्य पत्र-पत्रिकाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रही है, उनमें कमला प्रसाद मिश्र द्वारा ‘जय फिजी’ विवेकानन्द शर्मा द्वारा सम्पादित ‘सनातन संदेश’ तथा ‘फिजी संदेश’ जय नारायण शर्मा द्वारा सम्पादित ‘शांति दूत’ राघवनन्द शर्मा द्वारा ‘जागृति’, चन्द्रदेव सिंह द्वारा सम्पादित ‘फिजी समाचार’ आदि प्रमुख है। इसी क्रम में ‘फिजी सरकार’ तथा ‘पुस्तकालय’ आदि पत्रिकाएँ भी उल्लेखनीय हैं।

फिजी द्वीप समूह से ही प्रकाशित जिन अन्य बहुसंख्यक पत्र-पत्रिकाओं का उल्लेख करना यहाँ आवश्यक है, उनमें ‘इण्डियन टाइम्स’ शीर्षक मासिक पत्रिका भी प्रमुख है। यह रामसिंह के सम्पादकत्व में प्रकाशित हुई थी। यह एक द्विभाषी पत्रिका थी, जिसमें हिन्दी के साथ अंग्रेजी का अंश भी रहता था।

‘इण्डियन सेटेलर्स’ नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन सन् 1917 में हुआ था। इसके संपादक डा.मणिलाल तथा बाबू रामसिंह थे। 13 वर्ष तक प्रकाशित होने के पश्चात् सन् 1930 में यह पत्रिका बन्द हो गयी। यह सुवा से प्रकाशित होती थी। लिथो में मुद्रित यह बहुभाषी पत्रिका थी जिसमें हिन्दी का अंश भी रहता था।

सन् 1923 में ‘फिजी समाचार’ का प्रकाशन आरम्भ हुआ था। यह पत्र बाबू राम सिंह के सम्पादकत्व में प्रकाशित होता था। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसका सम्पादन राम खिलावन शर्मा ने भी किया था। इसकी एक प्रति का षुल्क 3 पेनी और वार्षिक षुल्क 10 शिलिंग था। इसका प्रकाशन सन् 1975 में स्थापित हो गया था। यह इण्डियन पब्लिसिंग कम्पनी माक्र्स स्ट्रीट सुवा (फिजी) से प्रकाशित होता था। यह एक द्विभाषी पत्र था जिसमें हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी का अंश भी रहता था। गुरुदयाल शर्मा ने सन् 1928 में ‘वृद्धि’, 1930 में ‘पैसेफिक’ तथा सन् 1932-33 में ‘वृद्धि वाणी’ का सम्पादन एवं प्रकाशन करके फिजी में हिन्दी पत्रकारिता का प्रसार किया। सन् 1935 में सुवा से प्रकाशित‘शान्ति दूत’की स्थापना का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है।

फिजी द्वीप समूह से ही ‘तारा’ नामक एक मासिक पत्रिका सन् 1941 में प्रकाशित हुई थी। इसका सम्पादन ज्ञानी दास करते थे। इस पत्रिका की एक प्रति का षुल्क 3 शिलिंग और वार्षिक 12 शिलिंग था। यह कुछ समय तक पाक्षिक रूप में ही प्रकाशित हुई थी। इसका त्रैमासिक संस्करण भी प्रकाशित होता था। इसका प्रकशन कार्यालय नसीनू (सुवा) में था। इसी प्रकार सिगातों का (फिजी) से राघवानन्द ने सन् 1976 से ‘जागृति’ शीर्षक का प्रकाशन करके हिन्दी पत्रकारिता के विकास में योगदान दिया। फिजी हिन्दी पत्रकार संघ के उप प्रधान के रूप में भी उनका क्रिया कलाप उल्लेखनीय है। इसी संदर्भ में यह ज्ञातव्य है कि ‘फिजी’ संदेश शीर्षक से एक पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन बी.एल. मानिस के द्वारा किया गया था।

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

बिहार: जीने का अधिकार छीन रही है कोशी


डा. मान्धाता सिंह, कोलकाता, भारत
Email to: Dr. Mandhata Singh


कोलकाता शहर के जाने माने पत्रकार डॉ.मान्धता सिंह ने बिहार के दर्दभरी कथा को एक पत्रकार के रूप में हमें भेजा, भले ही ये एक साहित्यिक मंच हो, परन्तु आज हमें सहित्य की नहीं बिहार के लोगों के दर्द के साथ खड़ा होना होगा। इसलिये इनके इस लेख को हम सहित्य मंच पर विशेष स्थान देने जा रहें हैं। - ई हिन्दी साहित्य सभा



मैं मुरलीगंज का रहने वाला हूं। मेरी बूढ़ी मां, मेरी बहन जिसकी गोंद में नवजात शिशु है, दो दिन से बिना कुछ खाए मेरे घर के छत पर पड़े हैं। नाववाले गांव के पास आकर भी उन्हें वहां से निकालने को राजी नहीं हुए। मैं यहां दूसरी नाव की तलाश में आया हूं ताकि अपने परिवार को बचा सकूं।....... इतना कहते-कहते एक नौजवान फफक कर रो पड़ता है। तभी माइक थमा दी जाती है एक महिला को जो अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों को लेकर यत्र-तत्र भटक रही है। जिस जगह पर ये सभी लोग जुटे हैं वह एक उंची जगह है और सुदूर इलाके से यहां पहुंचकर लोग बेचैन हैं कि उनके परिजन कैसे होंगे। इन्हीं में एक शख्स पतरहा के थे। इन्होंने बताया कि उनके गांव में एक छत पर चार सौ के करीब लोग हैं। वहां चार लोगों की मौत हो चुकी है और उनके शव वहीं पड़े हुए हैं। अब उनसे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। किसी हाजी की छत पर जमा इन लोगों को भी बचाने की गुहार माइक थामकर इस मौलाना ने भी लगाई।..........



ये सभी हिंदी समाचार चैनल स्टार न्यूज के संवाददाता के इर्दगिर्द जमा हैं। संवाददाता इनकी बात सीधे रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव और बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री नीतिश मिश्र से करवा रहा है। लोग यह सोचकर कि, सीधे मंत्री से गुहार लगाने पर शायद मौत के मुंह में खड़े उनके परिजनों को जीवन मिल जाए, वहां जमा हैं। एक बूढ़ा शख्स लपक कर संवाददाता के पैर पकड़ लेता है और अपने उन परिजनों को बचाने की मिन्नतें करता है जिन्होंने फोन करके इस शख्स से कहा कि ये आखिरी बातचीत है। अब हम लोगों की बिदाई होने वाली है। यानी अगर उन्हें बचाया नहीं गया तो किसी भी क्षण मौत के मुंह में जा सकते हैं। इन सबकी गुहार के बाद जब संवाददाता बोलने को मुखातिब हुआ तो वह भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं रहा। शायद आप भी यह देख रहे होते तो आपकी भी जुबां पर दर्द के ताले लग जाते। यह कोशी के प्रलय का छोटा सा दृश्य था। पूरी तस्वार कितनी भयावह है इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।


यहां पूछा गया कि आपको खाने के पैकेट तो मिल पा रहे हैं तो लगभग गुस्से में तमतमाते हुए एक नौजवान ने कहा कि हम दस दिन बिना खाए रह सकते हैं मगर हमें अभी ज्यादा से ज्यादा नावें चाहिए जिससे पानी में फंसे लोगों को निकाला जा सके। दरअसल इन कई लोगों ने शिकायत की कि नाववाले उनसे तीन हजार से लेकर पांच हजार रुपये तक मांग रहे है जबकि उनके पास कुछ नहीं बचा। वे सिर्फ जान बचाना चाहते हैं। आपदा प्रबंधन मंत्री ने भी माना कि नाववालों की बदमाशी की शिकायतें उन तक भी पहुंच रही हैं। ये नावें प्राइवेट नावें हैं।


इनकी त्रासदी यह भी है कि मौत सामने मुंह बाए खड़ी है फिर भी घर छोड़कर नहीं जा पा रहे हैं क्यों कि एक तो नावें उपलब्ध नहीं हैं और दूसरे लोग लूटपाट भी कर रहे हैं। खाली घरों के सामान व सामान के साथ जा रहे लोगों के सामान वगैरह लूट ले रहे हैं। यह शिकायत यहां पहुंचे कई लोगों ने की। इनकी मुसीबत तो देखिए कि कोशी इनसे जीने का अधिकार छीन रही है और जान बचाकर किसी तरह भागे भी तो बदमाशों व उचक्कों से भी नहीं बच पा रहे हैं। फिलहाल तो कोशी का यही प्रलय झेल रहा है बिहार। खौफ में गुजर रही हैं रातें और दिन भर अपने परिजनें को तलाशने के लिए दर -दर भटक रहे हैं उत्तर बिहार के २५ लाख लोग। कहा जा रहा है कि बाढ़ घट भी जाए तो इन लोगों को कम से कम दो साल तक कैंप में ही गुजारने होंगे। क्यों कि इस तबाही के बाद पुनर्वास में इतने समय तो लग ही जाएंगे।

साठ साल से चली आ रही है तबाही :


बाढ की यह तबाही तो बिहार साठ साल से झेल रहा है मगर तीस वर्षो के दौरान 1978, 1987, 1998, 2004 और 2007 नदियों से होने वाली व्यापक विनाशलीला वाले साल रहे। पिछले दस साल के आंकड़े बताते हैं कि 2005-06 को छोड़ दिया जाए तो लगभग हर साल इन इलाकों ने बाढ़ की तबाही झेली है और बर्बादी को जीया है। 1998 में बाढ़ की तबाही जुलाई के पहले हफ्ते ही शुरू हो गई थी। भारी बारिश से उत्तर बिहार से होकर गुजरने वाली लगभग सभी नदियों बूढ़ी गंडक, बागमती, अधवारा व कोसी ने जगह-जगह बांधों को तोड़ दिया था और भारी तबाही मचाई थी। इस प्रलय में 318 लोग काल-कवलित हो गए। नदियों का कहर अगले साल 1999 में भी जारी रहा।इस वर्ष अक्टूबर में अप्रत्याशित तौर पर भारी बारिश ने नदियों का मिजाज कुछ ऐसा बिगाड़ा कि उनके जलस्तर ने 1987 के रिकार्ड को भी तोड़ दिया। कमला बलान तो झंझारपुर [मधुबनी] रेलवे ब्रिज को पार कर गई थी। वर्ष 2000 के जुलाई में दो दफे भारी बारिश के बाद कमला बलान और भुतही बलान बौखलाई तो अगस्त में कोसी ने तबाही मचाई। इस बाढ़ में करीब 13 हजार गांव डूबे। साल 2001 में नेपाल जलग्रहण क्षेत्र में भारी बारिश के बाद कोसी ने जहां अपना पश्चिमी तटबंध तोड़ दिया, वहीं भुतही बलान ने दायां तटबंध तोड़ा। बागमती और बूढ़ी गंडक के बाएं तटबंध में कई जगह दरारें पड़ गई। 2002 भी बाढ़ की भीषण तबाही का ही गवाह बना। इस साल कमला बलान का बायां तथा खिरोई का दायां तटबंध टूटने से करीब 500 लोग मारे गए। 2003 में भागलपुर में 1978 की बाढ़ का रिकार्ड टूटा। इसी साल पटना के गांधीघाट के पास गंगा ने 1994 का रिकार्ड तोड़ा। 2004 की जुलाई में उत्तर बिहार में हुई भारी बारिश ने न केवल पिछले तीन साल का रिकार्ड तोड़ा, बल्कि इससे उफनाई नदियों की बाढ़ 1987 की तबाही से भी आगे निकल गई। 2005 और 2006 में स्थिति सामान्य रही। पर, 2007 में उत्तर बिहार में लगभग सभी नदियां लाल निशान को पार कर गई। विभिन्य स्थानों पर 28 तटबंध टूटे। बूढ़ी गंडक और बागमती के जल ग्रहण क्षेत्र में जुलाई और अगस्त महीने के दौरान लगातार बारिश होती रही। इससे लगातार जलस्तर बढ़ता रहा। पूरा उत्तर बिहार बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुआ। करीब 800 लोग मारे गए, जिनमें सर्वाधिक 140 लोग दरभंगा में मरे। साठ साल से चली आ रही तबाही का यह खेल इस साल भी कुछ ऐसी ही दास्तां छोड़ जाएगा।

बिहार का शोक कोसी और नेपाल :


नेपाल से निकलकर उत्तर बिहार होते हुए गंगा में मिलकर बंगाल की खाड़ी में समाने वाली कोसी को बिहार का शोक यूं ही नहीं कहा जाता। जानकारों की मानें तो कोसी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र [हिमालय] में प्राकृतिक और अन्य कारणों के चलते जमीन की ऊपरी परत अपनी जगह से हटती है और भूस्खलन के कारण मैदानी इलाके को हर साल बाढ़ से रूबरू होना पड़ता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालय की ऊपरी पहाड़ी इलाके से निकलने के कारण बारिश के मौसम में इस नदी का बहाव सामान्य से अठारह गुना तेज हो जाता है। ऐसे में यह सामान्य है कि नदी अपने साथ मिंट्टी की ऊपरी परत गाद के रूप में लेकर आए। मैदानी इलाके में बहाव की गति कम होने पर यह नदी की सतह पर जमा होने लगती है और उथला होने के कारण नदी का जलस्तर स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है। नदी के मार्ग बदलने का बड़ा कारण यह गाद ही है। पिछले सौ साल में ही नदी 200 किलोमीटर की लंबाई में अपना रास्ता बदल चुकी है।


नेपाल के सहयोग के बिना कोसी के कहर को कम करना संभव नहीं, इसलिए दोनों देशों के बीच 25 अप्रैल 1954 को एक समझौता हुआ, जिसके तहत दोनों देशों ने नेपाली क्षेत्र में हनुमाननगर के पास नदी पर बांध बनाने की योजना बनाई थी। इस समझौते पर भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और नेपाल की ओर से तत्कालीन नरेश के प्रतिनिधि मात्रिका प्रसाद कोइराला [गिरिजा प्रसाद कोइराला के बड़े भाई] ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते का उद्देश्य प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ को रोकना, जगह-जगह छोटे-छोटे बांधों का निर्माण करना और पनबिजली उत्पादित करने के साथ-साथ इलाके में कृषि को बढ़ावा देना था। इस समझौते के तहत कोसी बैराज बना। इसके बाद भी दोनों देशों ने संयुक्त प्रयास से कई बांधों का निर्माण किया। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि इन बांधों के निर्माण से भी बाढ़ से होने वाली तबाही नहीं रुकी।


नेपाल में बाढ़ के लिए वहां अब भारत को जिम्मेदार ठहराया जाता है तो इस इलाके में बाढ़ के लिए दोषारोपण नेपाल पर होता है। नेपाल का कहना है कि भारत ने नेपाल सीमा पर जिन ग्यारह बांधों का निर्माण कराया है उसमें आठ में नेपाल की सलाह नहीं ली गई। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानकों का भी ख्याल नहीं रखा गया। दूसरी ओर भारत का कहना है कि नेपाल हमेशा समझौैते का उल्लंघन कर बैराज के जरिए अतिरिक्त पानी छोड़ देता है जिससे यहां तबाही बढ़ जाती है। इन सबके इतर दोनों देशों में बांधों का विरोध पर्यावरणविद से लेकर आम लोग तक करते हैं। उनके मुताबिक उत्तरी बिहार और नेपाल का दक्षिणी हिस्सा भूकंप जोन में हैं। बाढ़ रोकने के लिए अगर यहां बांध बनाए गए तो भूकंप आने की स्थिति में बांधों को संभाले रखना असंभव है और तब जो तबाही होगी उसका आकलन सामान्य परिस्थितियों में नहीं किया जा सकता। भूकंप की स्थिति में संपूर्ण उत्तरी बिहार और खासतौर पर मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया और सहरसा जिले जलमग्न हो सकते हैं। बांधों के खिलाफ एक तर्क और है कि चाहे ये जितने मजबूत बनाए जाएं, इनका टूटना या क्षतिग्रस्त होना तयशुदा है। पर्यावरणविद बांधों का इसी आधार पर विरोध करते हैं, लेकिन राजनीतिक दल अपने हित में विशेषज्ञों की अनदेखी कर मनमर्जी वाले स्थान पर बांधों का निर्माण करा देते हैं और जिससे इनकी सुरक्षा को लेकर हरदम संशय बना रहता है। इस बार कहा जा रहा है कि नेपाल में माओवादियों ने तटबंध की मरम्मत में अड़ंगा लगाया अन्यथा बांध को बचाया जा सकता था।

राष्ट्रीय आपदा घोषित:

कोसी नदी के तटबंध टूटने से इस बाढ़ से कोई 25 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। बाढ़ से कुल 15 ज़िले प्रभावित हुए हैं। 900 गांवों में बाढ़ का कहर है। नेपाल में तेज बारिश ने कोसी में उफान ला दी है, जिस वजह से उत्तरी बिहार के मधेपुरा, सुपौल, अररिया और पूर्णिया के नए इलाकों में पानी भर गया है। कोसी में नेपाल से एक लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया है और बिहार सरकार को आशंका है कि आने वाले दिनों में नौ लाख क्यूसेक पानी छोड़ा जा सकता है। नेपाल में तटबंध टूटने के बाद कोसी नदी ने 1922 की धारा पर दोबारा बहना शुरू कर दिया है, जिस वजह से इतने बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। राहत और बचाव कार्य के लिए सेना को बुला लिया गया है।

बिहार में आई बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा करार देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने २८ अगस्त को बचाव और राहत कार्य के लिए 1,000 करोड़ रुपये और मौजूदा स्थितियों से निपटने के लिए 1.25 लाख टन अनाज की फौरी सहायता देने की घोषणा की। संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ राज्य के सबसे अधिक प्रभावित चार जिलों (सुपौल, सहरसा, अररिया और मधेपुरा ) के हवाई सर्वेक्षण के बाद प्रधानमंत्री ने बिहार को इस स्थिति से निपटने के लिए हरसंभव मदद करने का आश्वासन दिया। मनमोहन सिंह और सोनिया के साथ गृहमंत्री शिवराज पाटिल और लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मौजूद थे।