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मंगलवार, 15 जुलाई 2008

हिंद-युग्म एक परिचय

इंटरनेट ने सूचना के प्रचार-प्रसार का काम तो आसान किया ही है, एक सोच के बिखरे पड़े लोगों अथवा समूहों को एकजुट करने में भी भरपूर योगदान दिया है। इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी व अन्य भाषाओं का वर्चस्व तो है मगर हिन्दी ने पिछले कुछ सालों में जिस कदर इंटरनेट पर अपनी जगह बनायी है, यह तो कहा ही जा सकता है कि आने वाले समय में कम-से-कम हिन्दी को इस बात का मलाल नहीं रहेगा कि वो तकनीक की दौड़ में किसी भी अन्य भाषा से कमतर है।
इस क्रम में इलाहाबाद के तीन युवक जिन्होंने एक दूरदर्शी सपना संजोया और जुट गए हिन्दी कि सेवा में, एक ब्लॉग बनाया ‘‘हिन्दयुग्म’’ इसीलिए नहीं कि अपनी भड़ास निकालें, बल्कि इसीलिए कि ज्यादा से ज्यादा हिन्दी भाषी लोगों की बात विश्वभर के हिन्दी भाषी लोगों तक पहुँच सकें और अपनी बात रख सकें। सफर अभी शुरू ही हुआ था कि दिल्ली में ब्लॉग की दुनिया में सक्रिय कुछ हिन्दी-प्रेमियों की नजर इन युवाओं के प्रयास पर पड़ी। फिर राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल आदि जगहों से भी इंटरनेट पर सक्रिय कुछ लोग जुट गए। ब्लॉग के बड़े उद्देश्यों पर चर्चा हुई और शुरू हो गया महाप्रयास हिन्दी को तकनीक की दुनिया में परचम लहराने का। इनका मूलमंत्र ये था कि हिन्दी के नाम पर खास तारीखों पर रोने और गोष्ठियों-समारोहों में चीख मचाने से इस भाषा को कोई खास फायदा नहीं होने वाला बल्कि इसके लिये एक सार्थक पहल करने की जरूरत है। पर ऐसा देखा गया है कि हिन्दी की रोटी खाने वाले लोगों की जमात ही ऐसी सभाओं में अपनी भाषा को कैसे समृद्ध किया जाय पर चर्चा न कर आमतौर पर दूसरी या अन्य भाषाओं को कोसते नजर आते हैं। चीनी भाषा को आज दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा के रूप में हम सभी जानते हैं, इसका हाल भी हमारा जैसा ही है, परन्तु ये लोग निराशावादी न होकर आशावादी हैं, दूनिया की कई भाषाओं में अपनी बात रखते हैं, जिसमें हिन्दी भी है। चाइना रेडियो इन्टरनेशनल (CRI ) पुराना नाम रेडियो पेकिंग की स्थापना 3 दिसंबर 1941 को हुई ने हिन्दी भाषा में अपनी सेवा देना शुरू भी कर दिया। यह इस लिये नहीं कि उसे अपनी भाषा से प्यार नहीं वरण इसलिये कि ये लोग चीनी भाषा के विकास में हिन्दी का भी सहयोग ले सकें। खर! ये बात एक बहस का विषय है। चुकिं इस बहस में लाखों हिन्दी भाषी जिनकी रोजी चल रही है, वे अपना पालन-पोषण कर रहें हैं उनके हित को चोट पहुँच सकती है। बंगाल में जब कम्पूटर की बात शुरू हुई थी तो मुझे यह बात अच्छी तरह से याद है कि यही माकपा सरकार ने सबसे ज्यादा शोरशराबा मचाना शुरू कर दिया था, कि इससे लाखों युवक बेकार हो जायेगें, आज स्थिति कुछ ओर ही नजर आती है। आइये हम बात करते हैं, इन्टरनेट की दुनिया में हिन्दी के विकास की।
हिंद-युग्म एक परिचय
‘हिन्द-युग्म’ यानी हिन्दुस्तानियों का युग्म (समूह), जिसे हिन्दी भाषा में विश्वास है। ऐसे हिन्दी प्रेमियों का समूह जो कि केवल हिन्दी की बात नहीं करते बल्कि हिन्दी का प्रयोग करके, प्रयोग को प्रोत्साहित करके हिन्दी की सेवा करते हैं। जिन्हें आज पर भरोसा है। जो हिन्दी की दुर्दशा पर रोने से ज्यादा इसे बेहतर करने की कोशिश में लगें हैं।
इंटरनेट के जरिये देश भर में अपनी बात पहुंचाने के लिए धन की जरूरत महसूस की आपस में ही समूह के लोगों ने अंशदान करना शुरू कर दिया, कई और लोग भी आर्थिक मदद को आगे आए और मिशन जारी रहा । हिन्दयुग्म के सफर में सबसे सक्रिय शैलेश भारतवासी के अनुसार हिन्दी को इंटरनेट की भाषा बनाने और हर वर्ग को जोड़ने के लिए हम गाँव-गाँव तक जाते हैं, बेशक हमारे पास अभी पैसे नहीं हैं मगर हौसला तो है और फिर हिंदीप्रेमियों को जब हमारे उद्देश्य समझ आते हैं तो वह खुद ही मदद को तैयार हो जाते हैं। संपर्कः

वेबसाईट- www.hindyugm.com ईमेल- hindyugm@gmail.com
तो फिर देर किस बात की, आप भी जुट जाएँ हिन्दी की सेवा में, इंटरनेट पर जाएँ तो इन प्रयासों को जरुर देखें और सहयोग भी करें। -शम्भु चौधरी

सोमवार, 14 जुलाई 2008

सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग


राजस्थान पत्रिका ने अपने संडे के परिशिष्ट में हिंदी ब्लागिंग पर स्टोरी प्रकाशित की है जिसे लिखा है मशहूर हिंदी ब्लागर शैलेश भारतवासी ने। इसमें भड़ास के बारे में भी जिक्र है। यहां भड़ास के बारे में जो कुछ प्रकाशित हुए है, उसे हू ब हू दे रहा हूं ताकि बाकी भड़ासियों को भी पता चल सके....पत्रकारों के ब्लॉग सबसे आगे हिंदी ब्लागिंग में अभी पत्रकार ब्लागरों का प्रतिशत सबसे अधिक है। इस बात का अंदाजा यहां से लगाया जा सकता है कि हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले कम्युनिटी ब्लाग भड़ास http://bhadas.blogspot.com/ में 300 से अधिक कांट्रीब्यूटर हैं और अधिकाधिक पत्रकार हैं। इस ब्लाग पर हिंदी पत्रकारों की जाब छोड़ने-पकड़ने की जानकारी भी मुहैया कराई जाती है। भड़ास पर अभद्र ब्लाग का आरोप लगने पर ब्लाग प्रमुख यशवंत सिंह कहते हैं, ''हम तो खुद कहते हैं कि हम फटेहाल, परेशान, कुंठित, दमित, डरे हुए लोग हैं, जो गांव देहात से आए हैं और शहर के अजनबीपन और प्रोफेशनलिज्म में अपने अस्तित्व को तलाश रहे हैं। ''पूरी स्टोरी आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं"

- बधाई ! - ई हिन्दी साहित्य सभा


नोट: हमारी नजर में भी श्री शैलेश भारतवासी द्वारा संचालित 'हिन्द-युग्म' और भडा़स का चयन वर्ष २००७-२००८ के लिए क्रमशः सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग के रूप में किया गया है। शीघ्र ही इनका प्रमाण पत्र इन्टरनेट पर जारी कर दिया जायेगा - ई-हिन्दी साहित्य सभा

शुक्रवार, 11 जुलाई 2008

अपनी पहचान बनाने से पहले दूसरों को पहचाने - शम्भु चौधरी

साधारणतः हमलोगों मे एक हीन भावना ग्रसित है कि हम गरीब हैं, और यही गरीबी विरासत में हम अपने बच्चों को दे जाते हैं, बच्चे भी अपने बच्चों को और यह सिलसिला क्रमबद्ध चलता जा रहा है, क्यों न हम आज से हम अपनी गरीबी को मात देकर एक नई जिन्दगी शुरू करें। इस बीमारी को जड़ से समाप्त करने का यही एक मात्र तरीका है जिसे हमें अपनाना ही होगा। एक कदम हम आगे बढ़कर अपनी संतानों को थोड़ा ही सही अर्थ/शिक्षा से उन्हें समृद्ध करें, उनकी मानसिकता को कमजोर करने के बजाये उन्हें सबल प्रदान करें। लोग सोचते हैं कि हारा हुआ इंसान क्या कर पायेगा। परन्तु हमारी यह धारणा ही गलत बन चुकी है। हमें हार में से ही जीत की संभावनाओं को तलाशना होगा। कुछ लोग कहते है कि "जिन्दा रहेंगे तो फिर मिलेंगे" इस बात को इस प्रकार भी कहा जा सकता है " मिलते रहेंगे तो जिन्दा रहेंगे" । मैं जानता हूँ कि आपके पास मेरी बातों को उत्तर जरूर होगा। यदि है तो जरूर लिखें। -शम्भु चौधरी

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

जागो भारत जागो !

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

बन के पुजारी लोकतंत्र ये
लूट रहे मंदिर सब कोई,
मिटा नहीं अस्तित्व देश का
नंगे बन फिरते सब कोई।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

अंधी - लंगड़ी - लूली हो गयी
संसद देश की, गूँगी हो गयी,
भारत का स्वाभीमान खो गया,
हिन्दू - मुस्लिम - सिख - ईसाई,
संसद का ईमान खो गया ।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

सोने की चिड़ियां भूखी-प्यासी,
दाने-दाने को तरसाती,
साम्प्रदायिकता की आड़ में ये अब
हिन्दू-मुस्लिम गीत ही गाती ।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

इनके इरादे नेक नहीं अब,
'बुर्का' पहन सब एक हो गये;
सत्ता के सब अंधे हो गये।
खेत बैच दे, देश बैच दे,
सत्ता की जागीर बैच दे,
माँ का आँचल, दूध बैच दे,
बलदानी इतिहास बैच दे,
भगत सिंह का नाम बैच दे,
और बैच दे भारत को।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

संसद की ताकत पहचानो,
वोटों की ताकत जानो,
घर-घर अलख जगा दो आज,
धर्मनिरपेक्ष कौन बना है?
इनके इरादे जानो आज।

जागो भारत जागो !
इनकलाब नया लाओ भारत।
जागो भारत जागो !

बुधवार, 9 जुलाई 2008

अलग पहचान

इस शहर में कवि और साहित्यकारों की भरमार है,
ये सभी लावारिस इंसान है।
खो गई इनकी कलम भी भीड़ में,
न कोई अलग पहचान है।

हर कोई अब खोजता हर एक को,
जैसे दफ़ना दिया गया हो कोई शहर,
कब्र में ये कैसी आहट हो रही,
हर कोई मुर्दा यहाँ इंसान है।

दस्तकें मत दो....!! इन बन्द दरवाजों को,
हर कोई भीतर यमराज है,
तुम्हें भय हो न हो मौत का,
भय मौत को, तुमसे अब हो चला।

खो न जायें हम कहिं, खुद में ही;
'कलम' की भी खुद की पहचान है,
वक्त मिल जाये लिखने के बाद दोस्तों!
तो देख लेना, उसमें भी थोड़ी सांस है।

रोज पैदा हो रहे हैं हम मशरूम की तरह
कोई भीड़ चीर निकलता नहीं,
हर कोई बस एक ही ढर्रे पर जमे
मंच को कोई बदलता नहीं।

इस शहर में कवि और साहित्यकारों की भरमार है,
ये सभी लावारिस इंसान है।
खो गई इनकी कलम भी भीड़ में,
न कोई अलग कोई पहचान है।

सोमवार, 7 जुलाई 2008

उपेक्षित है हवेलियां - राजलदेसर की



यह लेख मुझे कल रात ही 'राष्ट्रीय महानगर' के संपादक श्री प्रकाश चण्डालिया द्वारा प्राप्त हुआ, जिसे मैं इस वेव पत्रिका के माध्यम से पाठकों के लिये जारी कर रहा हूँ। लेख के लेखक श्री कुन्दन शर्मा "दाधीच" (मोबाइल फोन न. 09829998494) जो कि स्वयं भी राजस्थान के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं ने राजस्थान की स्थापत्यकला और भित्ति चित्रों के जो दर्दनाक दृश्य हमें भेजे हैं उससे हम आपको भी परिचय कराते हैं। कहने को बात कुछ भी हो पर श्री कुन्दन जी के दर्द को कोई देख पाये तो जबाब लिखना न भुलें। - शम्भु चौधरी



स्थापत्यकला
और भित्ति चित्रों के लिये विख्यात थली अंचल के चूरू जिले के राजलदेसर कस्बे की हवेलियां सार संभाल के अभाव में पहचान खोती जा रही है। कस्बे में एक दर्जन से अधिक हवेलियां है। जो लोककला और संस्कृति से रू - ब- रू करवाती है। लकड़ी के बड़े-2 कलात्मक कपाटौं से सुसज्जित, गवाक्ष, दरवाजे तथा सामने की दीवारों पर राजपूत व 'फ्रेस्को बुआनो' शैली में उकेरित चित्र वास्तुकला का बैजोड़ नमूने देखने को मिलते हैं। शीशों की जड़ाई, चित्रशाला, वस्तुकला आन, बान और शान के प्रतीक भित्ति चित्र इन हवेलियों में देखे जा सकते हैं। चित्रशाला बनी सेठ सचियालाल की हवेली अपनी अन्तिम सांसे गिन रही है। इस हवेली के कमरों की दीवार में शीशों की जड़ाई का मनमोहक काम शीशमहल की यादगार को ताजा कर देती है। चौबारे के मुँह बोलते भित्ति चित्र एक से एक बढ़कर है। इसी प्रकार सेठ मोहनलाल बैद की हवेली का कमरा स्थापत्यकला का उत्त्कृष्ट नमूना है। दीवारों पर शीशे की जड़ाई, सोने की हिल का उपयोग व विभिन्न रंगों की बेल-बूटों के चित्र मनोहारी है।
सेठ हीरालाल नथमल बैद, मानिकचन्द भँवरलाल दूगड़, मोहनलाल बोथरा, मोटाराम बालचन्द लाडसरिया, संतोकचंद बैद की हवेलियों के बाहर व छज्जे के नीचे टोडों के बीच शिकारी, नायक-नायिका, मल्लयुद्ध, पशु-पक्षियों, देवी-देवताओं, लोककथाओं, ऊँट-घौडो़ पर चढ़े राजपूत, राजस्थानी पौशाक, गठीला शरीर, दाढ़ी-मूँछें तथा आभूषणों से श्रृगांरित कलात्मक भित्ति चित्र चित्रित है। सेठ जेसराज जयचन्दलाला बैद की हवेली की पोंली व टोडों के नीचे उकेरे गये चित्र बरबस ही लोगों को आकर्षित कर लेते हैं। सेठ शिद्धकरण बैद की हवेली की खिड़्कियों व शानदार मुख्यद्वार स्थापत्यकला में बेमिशाल है। परन्तु दुर्भाग्य है, कि आज अधिकांश इन हवेलियों की कोई सुध लेने वाला नहीं है।
हवेलियों के मालिक अन्य राज्यों में प्रवास करने लगे हैं जिन्हे भारत के अन्य हिस्सों में मारवाड़ी के रूप में जाना और पहचाना जाता है। चार-पांच हवेलियां तो गिरने के कगार पर है। हवेलियों के भित्तिचित्र इनके मालिकों की उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। इस सांस्कृतिक विरासत को धीरे-धीर हमारी आधुनिक सभ्यता ने अपना ग्रास बनाना आरम्भ कर दिया है। गत अर्द्ध शताब्दी से हवेलियां अतीत की चिजें बनकर रह गई है। चौबोर सूने-2 और उपेक्षित पड़े हैं,

तो भित्ति चित्र धूल-धसरित होकर धूमिल पड़ने लगे हैं। वर्तमान पीढी़ को इस कलात्मक सृजनता से कोई सरोकार है, दिखाई नही पड़ता। हवेलियों के वर्तमान मालिकों की अदासीनता साफ झलक रही है। न तो कोई सांरक्षण देने वाला दिखाई पड़ता है न ही कोई रुचि लेने वाला ही है।
- कुन्दन शर्मा "दाधीच" ( मोबाइल फोन न. 09829998494 )

रविवार, 6 जुलाई 2008

नन्हें से पहरेदार

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

जन्मेगा जब आतंकवाद,
इन भोले-भाले बालों में,
टपकेगें नयनों से आंसू
,
हीरे से मोती गालों पें।
घर-घर में जब आग जलेगी,
संध्या को दिवालों में,
पग-पग में तब मौत उगेगी,
खेतों और खलियानों में।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

न्यापालिका जब यहाँ पर,
सत्ता की गुलाम बनी,
जंजीरों को तोड़ यहाँ,
लुटेरों की सरकार बनी।
विधानसभा जलों में होगी,
संसद तब ' तिहाड़ ' बने,
थाने-थाने में गुण्डे होंगे,
देश के पहरेदार बने।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

न्यायपालिका जब यहाँ पर,
हो जायेगी 'गूँगी' तब,
संसद में बैठे नेतागण,
'चिर' का हरण करेगें तब।
कौन बनेगा 'कृष्ण' यहाँ,
किसकी सामत आयी है,
कलियुग के भीम-गदा को देखो,
युधिष्ठर, नकुल, सहदेव कहाँ
'अर्जून' की तरकश में अब,
वाणों का वह वेग कहाँ,
भीष्मपितामह की वाणी में,
ममता-व- स्नेह कहाँ,
'धृतराष्ट्र' ढग-ढग पे देखों,
सत्ता के गलियारों में,
दुर्योधन की गिनती कर लो,
चाहे हर मंत्रालयों में।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

आज यहाँ होली तू क्यों,
विधवा बनकर आयी हो,
सतरंगी - रंगों में देखो,
ये कैसी परछाई है? ।
होली तू ऎसी आयी क्यों?
सब अपने ही रंग में सिमट गये,
गांधी के भारत को देखो,
ये कैसी आग लगाई है।।

जल जायेगी धरती तब, संसद के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला जब, नन्हें से पहरेदारों में।

धर्मनिरपेक्ष?

धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में ,
देते हैं ये
आतंकवाद को पनाह,
मानो यह सुरक्षा कवच हो,
देश के गद्दारों का
जो करते हैं गद्दारी देश से,
फैलाते हैं आतंक,
इसलाम के नाम पर
अपने ईमान को भी
देते हैं दगा,
करते ये शरीयत की बात
वोट का यह ड्रामा कब और कैसे
समाप्त होगा?
कब मुसलमान अपने को
भारती समझेगा?
धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में ,
कब तक लेगा पनाह
कब वो हिन्दुस्तानी बन,
एक मन बना पायेगा ?
आजादी के इतने सालों बाद भी
एक आम मुसलमान,
अपनी बस्ती से अलग नहीं रहा पाता।
एक आम हिन्दु, मुसलमानों की बस्ती में-
टहल नहीं पाता।
फिर भी कहते हैं हम देश को
धर्मनिरपेक्ष?
सिर्फ वोट के लिये?
सिर्फ वोट के लिये?

शनिवार, 5 जुलाई 2008

कोलकाता शहर

विश्व के एक नम्बर में आने वाला शहर कोलकाता,
आज भारत की अन्तीम पंक्ती में खड़ा है।
विकास के नाम पर
कामगार मजदूरों के हाथों में
थमा दिया है झंण्डा,
हिंसा और अराजकता का डण्डा।
आज भी इस आशा में जीवित हैं,
जर्जर होता शरीर, कल-कारखाने
दिवारों पर लिखे नारे,
इस भयानक स्थिति की घोषणा करते हैं-
"यहाँ कोई आशा नहीं"
केवल '' मिथ्या आक्रोश "
शेष बचा है।


कचरे का अम्बार, विषाक्त हवा,
टूटी-फुटी सड़कें, बहती गंदी नालियाँ,
पानी के फटे पाइप,
पीने के पानी की वही पुरानी व्यवस्था,
कतार में लगे लोग,
रोजाना शहर आना, कुछ हो न हो
शहर को गंदा जरूर कर जाना।
चप्पा-चप्पा अबाद है,
शहर के फुटफाथ
कहिं दुकान, घर, या धर्मस्थल
यदि कुछ नहीं है तो, बस खाली जगह।


दो रोटी खा लेना,
सो जाना,
बहुत कुछ हुआ तो,
रास्ते पर ही कहीं बैठ- सुस्ता लेना;
न कोई मनोरंजन,
न कोई उत्साह,
बस,
दिनभर आने-जाने,
जाम और थकावट से
हर इंसान,
परिवार से इस कदर दूर हो जाता है;
पति-पत्नि का प्रेम,
बच्चों का प्यार, स्नेह,
बिस्तर में थकावट का रूप ले,
करवटें बदल सो जाता है।


-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता- 700106

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

कोलकाता में हिन्दी नाट्य और मारवाड़ी समाज

कोलकाता में हिन्दीभाषी समुदाय बहुत लंबे समय से और बहुत बड़ी तादाद में निवास करता आया है । यहां हिन्दी नाट्य प्रस्तु्तियों का इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है । इसके शुरूआती दौर में तो पारसी शैली के व्यावसायिक नाटक ही छाए रहे । 1906 में पहली बार मुंशी भृगुनाथ वर्मा के नेतृत्व में फूलकटरा में हिन्दी नाट्य समिति की स्थापना हुई । यह हिंदी में पहला गैरव्यावसायिक रंग प्रयास था । बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में पं। माधव शुक्ल के कोलकाता आगमन और भोलानाथ बर्मन के साथ ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना से कोलकाता के हिन्दी रंगमंच को अपेक्षित गति व प्रतिष्ठा मिली जिसका सतत विकास आज के समर्थ नाट्य आंदोलन में देखा जा सकता है । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर कंपनियों ने कोलकाता में पारसी शैली के नाटक प्रदर्शित करने शुरू कर दिए थे । मूनलाइट, मिनर्वा, कोरिंथियन आदि थियेटरों में व्यावसायिक दृष्टि से सफल नाटक खेले जाने लगे थे । मनोरंजन करना और पैसा कमाना इनका एकमात्र उद्देश्य था । वृहत्तर सामाजिक संदर्भों से इनका कोई गहरा सरोकार नहीं था परंतु भारी संख्या में आम जनता को रंगमंच की ओर आकर्षित कर लेना इनकी बड़ी सफलता थी । सरल उर्दू या हिन्दुस्तानी में खेले जाने वाले इन नाटकों की भाषानीति नारायण प्रसाद ‘बेताब’ के ‘महाभारत’ नाटक के इस उद्धरण द्वारा समझी जा सकती है :
" न खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दी जबान गोया मिली-जुली हो ।
अलग रहे दूध से न मिसरी, डली-डली दूध में घुली हो ।।
किन्तु पारसी नाटकों की प्रवृत्ति बाजारू और रुचि हल्की थी । अभिनय कला में भी एक तरह का उथलापन था । तिनाटकीयता के साथ आकस्मिकता और चमत्कार का संयोग उसे और भी भोंडा बनाता था । किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह हमारी रंगयात्रा का प्रारंभिक चरण था और व्यावसायिकता के दबाव के बावजूद पारसी शैली के कई नाटक तत्कालीन राष्ट्रीय भावनाओं और आकांक्षाओं को निरूपित करने का खतरा मोल ले रहे थे । हिन्दी रंगमंच की विकास यात्रा में पारसी नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान है । बहुत लंबे समय तक हिन्दी का गैरव्यावसायिक रंगमंच भी इनकी शैली से खासा प्रभावित रहा । 1930 तक पारसी शैली का थियेटर जिंदा रहा। सिनेमा के प्रचलन के बाद स्थाई रूप से इनका पर्दा गिर गया । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में व्यावसायिक व शौकिया रंगमंच समानांतर चलते रहे । देश इस समय नवजागरण की लहर पर सवार था । हिन्दी जाति के सांस्कृतिक अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट व पं। माधव शुक्ल जैसे अनेक बुद्धिजीवी और सुसंस्कृत देशवासी पारसी कंपनियों की लोकरुचि को दूषित करने वाली प्रस्तुतियों से क्षुब्ध थे । धीरोदात्त नायक दुष्यंत को खेमटेवालियों की तरह कमर मटका कर नाचते और ‘पतरी कमर बल खाय’ गाते हुए देखना इनके लिए असह्य था । ये वे लोग थे जो भाषा और देश दोनों के लिए चिंतित थे । वे अपनी भाषा में सुसंस्कृत और साहित्यिक अभिरुचि वाले नाटक खेलना चाहते थे और जनता को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना चाहते थे ।
1916 में प्रकाशित महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक की भूमिका में शुक्ल जी ने स्पष्ट लिखा है कि "आजकल पारसी नाटकों का प्रधान्य है । उसके साज-सामान हाव-भाव बिल्कुल कृत्रिम होते हैं । क्योंकि उनके सारे कार्य अर्थोपार्जन के उद्देश्य पर ही संबद्ध हैं……।’ परंतु शुक्ल जी यह भी अनुभव कर रहे थे कि "संपूर्ण परिवर्तन के साथ-साथ नाट्यकला में भी आशातीत परिवर्तन हो रहा है । दर्शकों की इच्छा भाव और दृष्टि में बहुत अंतर आ गया है । अब लोग उदारतापूर्वक नाट्यशाला में जाते हैं और बड़े ही उत्सुकता से नाटक देखते हैं । शिक्षित समाज अब बहुत कम पारसी कंपनियों की ओर झुकता है । राष्ट्रीय जागरण में नाटक की भूमिका के प्रति वे विशेष सजग थे । महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक में कुंती के मुंह से मानो भारत माता स्वयं आह्वान कर रही है :
"स्वाभिमान नहिं तजो आत्म चिंता नहिं छोड़ो ।
स्वाधिकार हित लड़ो सत्य से मुख नहिं मोड़ो ।।
1911 में माधव शुक्ल कोलकाता पधारे । ‘हिन्दी नाट्य समिति’ तब भारतेंदु के नाटक ‘नीलदेवी’ के मंचन की प्रक्रिया में थी । शुक्ल जी के मार्गदर्शन से 1912 में भारत संगीत समाज के मंच पर ‘नीलदेवी’ का सफल मंचन हुआ । पर इसी रान कुछ मतभेद उभरे और भोलानाथ बर्मन व शुक्ल जी हिन्दी नाट्य समिति से अलग हो गए । हिन्दी नाट्य समिति ने नीलदेवी’ के अतिरिक्त पं। राधेश्याम कथावाचक लिखित ‘वीर अभिमन्यु’ का सफल मंचन किया । पहले प्रदर्शन में ही इतनी धनराशि प्राप्त हुई कि प्रस्तुति का खर्च निकालकर चार हजार रुपये उड़ीसा के बाढ़पीड़ितों की सहायतार्थ दिए गए . 1920 में जमुनादास मेहरा ने ‘पाप परिणाम’ नामक नाटक के कई सफल मंचन किए । मेहरा जी द्वारा निर्देशित ‘भक्त हलाद’ के भी लगभग दस मंचन हुए । इसके अतिरिक्त ‘हिन्दी नाट्य समिति’ के बैनर तले सत्यविजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मिनी, सम्राट परीक्षित और स्कूल की लड़की आदि नाटकों के सफल प्रदर्शन किए गए । 1939 के बाद यह संस्था कुछ विशेष या सार्थक नहीं कर सकी । पं. माधव शुक्ल द्वारा ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना के साथ हिन्दी रंगमंच का संबंध देशानुरागी भावनाओं से और प्रगाढ़ हो गया था । शुक्ल जी नाटकों के द्वारा जागृति लाकर राष्ट्रीय आंदोलन को बल देना चाहते थे ।
परंतु अंग्रेज सरकार 1876 में ‘ड्रामैटिक पफ़ॉर्मेंस बिल’ पास कर चुकी थी और दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नीलदर्पण’ जब्त कर लिया गया था। खाडिलकर का ‘कीचक वध’ और वृंदावन लाल वर्मा का ‘सेनापति ऊदल’ भी प्रतिबंधित कर दिया गया था । ऐसे समय में जब परिषद ने राधाकृष्ण दास का नाटक ‘महाराणा प्रताप’ खेलना चाहा तो अनुमति नहीं दी गई। अत: यह नाटक ‘भामाशाह की राजभक्ति’ नाम से खेला गया। इसी तरह अंग्रेज सरकार की आंख में धूल झोंककर ‘महाभारत’ नाटक ‘कौरव कलंक’ नाम से व ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक ‘विश्व प्रेम’ नाम से खेला गया । इनके अतिरिक्त डी.एल.राय के ‘चंद्रगुप्त’ आदि नाटक सफलतापूर्वक खेले गए ।
लगभग दो दशकों तक ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की कमान पं। माधव शुक्ल के हाथों में रही और रंगमंच पर राष्ट्रप्रेम की धारा अप्रतिहत बहती रही । आलम यह था कि शुक्ल जी के प्रयत्नों से महाकवि निराला जैसे साहित्यकार भी नाट्य लेखन और अभिनय की ओर प्रवृत्त हुए । पं. माधव शुक्ल के पश्चात परिषद का नेतृत्व पं. देवव्रत मिश्र व ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने किया और नूरजहां, शाहजहां, उस पार, महात्मा ईसा, छत्रसाल व पुनर्मिलन (महानिशा) मंचित किए । ‘महानिशा’ नाटक का मंचन इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण था कि इसमें पहली बार स्त्री पात्रों की भूमिकाएं महिला कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की गई थीं । इससे पहले पुरूष कलाकार ही स्त्री पात्रों की भूमिका में आते थे । 1931 में कोलकाता से ही नरोत्तम व्यास के संपादन में ललित कला संबंधी सचित्र साप्ताहिक ‘रंगमंच’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । इसका उददेश्य निम्नलिखित काव्य पंक्तियों के रूप में लिखा रहता था :
" हिन्दी माता के पुत्रों में कला-विवेक भाव भर दे
जग में ये भी शीश उठाएं, इतना इनको अवसर दे ।।
क्रम-क्रम से वे सब उठ जाएं, पड़े हुए हैं जो परदे ।
कागज का यह ‘रंगमंच’, पैदा वह रंगमंच कर दे ।।
पं। माधव शुक्ल के महाभारत (पूर्वार्ध) में भी तो अर्जुन कुछ ऐसा ही उद्घोष करता है :
"आत्मदशा का ज्ञान नहीं जिस नर के भीतर ।
उसकी भी क्या है मनुष्य में संज्ञा क्षिति पर ।।
"हिन्दी नाट्य परिषद के ही कुछ सदस्यों ने बाद में अलग होकर ‘बजरंग परिषद और ‘श्री कृष्ण परिषद’ जैसी नाट्य संस्थाएं गठित कीं । ‘बजरंग परिषद’ ने 1939 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन में ‘श्रवण कुमार’ नाटक का मंचन किया जो सफल नहीं रहा। किंतु अगले दिन ‘भक्त प्रहलाद’ नाटक सफलतापूर्वक खेला गया । बजरंग परिषद द्वारा ‘सिंहनाद’, ‘भयंकर भूत’ और ‘जखमी पंजाब’ नाटक का भी मंचन किया गया । श्रीकृष्ण परिषद तो ‘कृष्ण- सुदामा’ नामक एक ही नाटक खेल सकी । बड़ाबाजार के ‘अपर इंडिया एसोसिएशन’ नामक क्लब ने ‘दुर्गादास’, ‘राजा हरिशचंद्र’ व ‘मधुर मिलन’ आदि नाटकों का मंचन किया । 1943 में स्थापित ‘बिड़ला क्लब’ ने 1945 से 1963 के बीच मिनर्वा, कालिका, कोरिंथियन, स्टार तथा विश्वरूपा आदि थियेटरों में डी।एल.राय के ‘मेवाड़ पतन’ ‘चंद्रगुप्त’ और ‘उस पार’ नाटकों का और उग्र के ‘महात्मा ईसा’ नाटक का मंचन किया । इस काल में कई सामाजिक विषयों पर भी नाटक खेले गये थे, जिसका मारवाड़ी समाज में काफ़ी प्रभाव पड़ा था। जिनमें प्रमुख रूप से दो नाटक- 'समाज दर्पण' और 'फ़ैशनेबुल लुगाई' का जिक्र मिलता है। स्व.गोरधन दास चौधरी द्वारा लिखीत नाटक- ' समाज दर्पण ' (राजस्थानी भाषा में) कोरिंथियन में खेला गया था, इसमें खास बात समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार करना था। इस नाटक में बाल विवाह, वृद्ध विवाह, मृतक भोज, ब्रह्मपुरी, परदा प्रथा, सड़कों पर नाच-गाना, जीमनवार- सज्जनगोठ (शादी के अवसर पर भोजन करवाना) जैसी समस्या पर तीखा और व्यंग्यात्मक तरीके से प्रहार किया गया था। इस नाटक में 'स्व. मनसुख रामजी मोर' ने खुद मुख्य भूमिका निभाई थी। 'फ़ैशनेबुल लुगाई' (राजस्थानी भाषा में) कोरिंथियन में ''स्व. काली प्रसाद खेतान के जातिय बहिष्कार'' को लेकर नाटक खेला गया था, जिसमें खुद स्व.काली प्रसाद खेतान ने मुख्य किरदार की भूमिका निभाई थी। इस नाटक के लेखक भी स्व.गोरधन दास चौधरी थे। जिसको लेकर उस जमाने में समाज के बीच काफ़ी हलचल पैदा हो गई थी। 1964 में ‘रुपया बोलता है’ का प्रदर्शन किया गया । 1947 में ‘तरुण संघ’ की स्थापना के साथ कोलकाता में नवीन विषयवस्तु वाले नाटकों का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ । क्रमश: पाश्चात्य रंगमंच के तत्वों को भी जगह मिलनी शुरू हुई । भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, सुशीला भंडारी, सु्शीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल जैसे ऊर्जस्वी कलाकार कुछ नया व सार्थक करने की बेचैनी लेकर रंग परिदृश्य पर उभरे । ‘तरुण संघ’ ने विष्णु प्रभाकर, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, जगदीशचंद्र माथुर व तरुण राय जैसे लेखकों के नाटक खेले । 1953 में राजेंद्र शर्मा द्वारा स्थापित संस्था ‘भारत भारती’ ने 1967 में खेले गए नाटक ‘डाउन ट्रेन’ के लिए इन्हें द्वितीय जनकीमंगल पुरस्कार प्राप्त हुआ । 22 दिसंबर 1955 को ‘अनामिका’ की स्थापना के साथ कोलकाता के हिन्दी रंगमंच ने एक नए युग में प्रवेश किया । श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, मन्नू भंडारी व तरुण संघ के उनके अन्य साथियों ने मिलकर इस संस्था का गठन किया । ‘अनामिका’ द्वारा प्रदर्शित कई नाटकों की अनुगूंज पूरे देश में सुनाई दी । इस संस्था ने पचास से भी अधिक नाटकों, कई एकांकियों व बाल नाटकों का मंचन किया । घर और बाहर ( रवींद्रनाथ ठाकुर के बांग्ला उपन्यास ‘घरे- बाइरे’ का प्रतिभा अग्रवाल कृत नाट्य रूपांतर), आर. जी. आनंद के ‘हम हिंदुस्तानी हैं’, विनोद रस्तोगी के ‘नया हाथ’, मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ व ‘लहरों के राजहंस’ व बादल सरकार के नाटकों के मंचन के लिए अनामिका को खासी लोकप्रियता हासिल हुई । अधिकांश नाटकों का निर्देशन श्यामानंद जालान,विमल लाठ और डा. प्रतिभा अग्रवाल ने किया । प्रतिभा अग्रवाल ने नाटकों के अनुवाद व नाट्य रूपांतर करने की दिशा में अत्यंत स्थायी महत्व का कार्य किया। 1964 में अनामिका ने एक नाट्य महोत्सव का आयोजन किया । उसमें देश के मशहूर लेखक, निर्देशकों व नाट्य समीक्षकों ने शिरकत की और उस अवसर पर आयोजित विचारगोष्ठियों में भाग लिया । इस नाट्य महोत्सव का उद्घाटन प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने किया था व इसमें थियेटर यूनिट, बंबई ने ‘अंधा युग’, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली ने ‘राजा ईडिपस’, अनामिका ने ‘छपते-छपते’, मूनलाइट ने ‘सीता बनवास’ व ‘रामलीला नौटंकी’, श्री आर्ट्स क्लब, दिल्ली ने ‘अंडर सेक्रेटरी’ व श्री नाट्यम, वाराणसी ने ‘गोदान’ का मंचन किया ।

Pratibha Agarwal in 'GODAN'
इसी वर्ष कृष्णाचार्य के संपादन में ‘हिन्दी नाट्य साहित्य’ का प्रकाशन हुआ । अनामिका को ‘नाट्य वार्ता’ नामक रंग पत्रिका के प्रकशन का भी श्रेय जाता है । 1963 से नाटकों के मंचन में सक्रिय ‘संगीत कला मंदिर’ नामक संस्था ने विभिन्न भाषाओं में पचास से अधिक प्रस्तुतियां की जिनमें ‘एक प्याला कॉफी’, ‘मृच्छकटिक’, ‘किसी एक फूल का नाम लो’, ‘एक गुलाम बीबी का’ व ‘एक और द्रोणाचार्य’ प्रमुख हैं । 1976 में इस संस्था ने मोहन राकेश को उनके नाटक ‘आधे-अधूरे’ के लिए मरणोपरांत पुरस्कृत किया ।अदाकार नाट्य दल को भी पचास से अधिक प्रस्तु्तियों का श्रेय है । यह दल ‘भूचाल’,'खामोश अदालत जारी है’ व ‘रिश्ते-नाते’ के उत्कृष्ट मंचन के लिए जाना जाता है । इसके निर्देशक-अभिनेता कृष्ण कुमार राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पाकर अहींद्र चौधरी से अभिनय का पाठ पढ़ने कोलकाता आए थे । अहींद्र चौधरी तब रवींद्र भारती में अभिनय कला के प्रोफेसर थे । अनामिका में अधिक प्रयोगशील व ‘बोल्ड’ नाटकों के मंचन के लिए वांछित खुलेपन की गुंजाइश न पाकर श्यामानंद जालान ने 1972 में ‘पदातिक’ की स्थापना की और ‘गीधाड़े’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे नाटकों को सफलतापूर्वक खेला । ‘पदातिक’ को ब्रेश्ट, मोलियर, इब्सन व सैमुअल बैकेट आदि विदेशी नाटककारों एवं मोहन राकेश, महा्श्वेता देवी,विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, निर्मल वर्मा व जीपी देशपांडे जैसे भारतीय लेखकों के नाटकों को मंचित करने का श्रेय प्राप्त है । पदातिक ‘शुतुरमुर्ग’ ‘एवम इंद्रजीत’, ‘आधे-अधूरे’, ‘पगला घोड़ा’ व ‘सखाराम बाइंडर’ की प्रभावोत्पादक प्रस्तुतियों के लिए ख्यात है ।
श्यामानंद जालान के अतिरिक्त विजय शर्मा और कुणाल पाथी ने पदातिक के नाटकों का निर्देशन किया है ।
1976 में रंगकर्मी ने कोलकाता के नाट्य परिदृश्य में ‘एंट्री’ ली और सबसे सक्रिय नाट्यदल के रूप में उभरकर आया । पिछले पच्चीस वर्षों में उषा गांगुली जैसे समर्पित रंग व्यक्तित्व और संगठनकर्ता के नेतृत्व में ‘महाभोज’, ‘लोक कथा’, ‘होली’, ‘वामा’, ‘कोर्ट मार्शल’, ‘रूदाली’, ‘खोज’ व ‘बेटी आई’ के प्रदर्शन के साथ यह राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण नाट्य दल के रूप में सराहा जाता है । ‘हिम्मत माई’ व ‘शोभा यात्रा’ के मंचन के पश्चात उषा गांगुली ने न केवल एक समर्थ अभिनेत्री और सफल निर्देशक के रूप में वरन विशिष्ट नाट्य समालोचक एवं व्याख्याकार के रूप में भी अपने को स्थापित किया है । उषा गांगुली ने हिन्दी रंगमंच को अधिक जनोन्मुख तो बनाया ही, साथ ही बांग्ला रंगमंच की गौरवशाली परंपरा से गहरे जुड़े बांग्लाभाषी दर्शकों के बीच भी हिन्दी नाटकों को प्रतिष्ठा प्रदान की ।

Gopal Kalwani in 'Ram-shyam-Jadhu'
अभी हाल ही में काशीनाथ सिंह की सुप्रसिद्ध रचना पर ‘काशीनामा’ और मंटो की कहानियों पर आधारित तीन नाटकों की श्रृंखला के सफल मंचन द्वारा उन्होंने अपनी निर्देशकीय क्षमता को प्रदर्शित किया है । कोलकाता की एक शताब्दी से चली आ रही हिन्दी रंग परंपरा के ध्वजवाहक के रूप में लगभग एक दर्जन नाट्य दल अपनी सक्रियता से इसे पुष्ट कर रहे हैं । महेश जायसवाल ने अपने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से हिन्दीभाषी समाज को जन संस्कृति के वृहत्तर सरोकारों से जोड़ा है । विपरीत परिस्थितियों में भी प्रताप जायसवाल ने न केवल अपनी टोली ‘अभिनय’ को बचाए रखा, बल्कि ‘मिस्टर अभिमन्यु’, ‘रावणलीला’ व ‘दुस्समय’ जैसी कई नाट्य प्रस्तु्तियों के माध्यम से हस्तक्षेप जारी रखा । स्पंदन, लिटिल थैस्पीयन, अकृत, रंगकृति, प्रयास, कला सृजन अकादमी, नीलांबर व कलाकार जैसी रंग संस्थाएं लगातार अपनी उपस्थिति का अहसास कराती रही हैं । सामूहिकता और सृजनात्मकता के लिए यह कठिन समय है । नाटक की तो संरचना ही सामूहिकता और सृजनात्मकता के पायों पर टिकी है । नाटक के होने का अर्थ है एकांतिकता और बंजरपन का न होना । एक समर्थ नाट्य आंदोलन जीवंत और गतिशील समाज की पहचान है । जिस भाषा में श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली जैसे तपे हुए नाट्य व्यक्तित्व सक्रिय हों, जिसमें नाट्य शोध संस्थान जैसी अद्वितीय संस्था का अस्तित्व हो, जिसमें आज भी संसाधनों के अभाव के बावजूद सामूहिकता के बल पर नाटकों का मंचन संभव हो तो गैरजरूरी हताशा का कोई कारण दिखाई नहीं देता । http://samakaal.wordpress.com

[संदर्भ:'वागर्थ' के मार्च-अप्रैल २००२ अंक प्रियंकर पालीवल द्वारा लिखित ]


अनामिका:

‘अनामिका’ की स्थापना कलकत्ता में 22 दिसंबर 1955 को हुई। संस्था के गठन के लिए पहली बैठक जुलाई-अगस्त 1955 में बुलाई गई थी। अध्यक्ष पद के लिए गोविंद प्रसाद कानोड़िया और मंत्री पद के लिए प्रतिभा अग्रवाल तथा श्यामानंद जालान का चुनाव हुआ। संस्था ने आगामी दो तीन बैठकों में अपने मूल उद्देश्य, नियमावली तथा कार्यक्रम निश्चित किए और सुमित्रानन्दन पन्त के गीतों पर आधारित ‘पन्त प्रवाहिनी’ कार्यक्रम के साथ 22 दिसंबर 1955 को जनता के समक्ष आई। और तबसे यही दिन स्थापना दिवस के रूप में माना जाने लगा।

‘अनामिका’ का प्रथम कार्यक्रम ही साहित्यिक था- सुमित्रानन्दन पन्त के गीतों का व्याख्या एवं विवरण युक्त गायन। मार्च सन् 1956 में आर. जी. आनंद लिखित ‘हम हिन्दुस्तानी है’ ‘अनामिका’ की पहली नाट्य-प्रस्तुति थी।
सन् 1959 में जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की नृत्य रूपक के रूप में प्रस्तुति साहित्य, संगीत एवं नाटक की त्रिवेणी थी, ‘अनामिका’ के मूल उद्देश्यों की सार्थक- समन्वित अभिव्यक्ति थी। इस काल में सौमेन टैगोर, भूपेन हजारिका (गुवाहाटी), चंद्रबदन सी. मेहता (बड़ौदा), चाल्र्स एल्सन (न्यूयार्क), पं.नारायण आचार्य (वाराणसी), कल्याणमल लोढ़ा (कलकत्ता) जैसे विद्वानों को ‘अनामिका’ ने अपने बीच पाया भवानी प्रसाद मिश्र और कैलाश वाजपेयी जैसे कवियों की कविताओं का रसास्वादन किया।
नाट्य क्षेत्र में ‘अनामिका’ को जो यश मिला, जो उसकी उपलब्धि हुई, उसने उसे नाट्य-प्रस्तुतियों पर ही अधिक ध्यान देने को प्रेरित किया। सन् 1959 में ‘संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा ‘नए हाथ’ के मंचन पर प्रथम पुरस्कार की प्राप्ति ने इस धारणा की पुष्टि की। सन् 1961 में रवीद्र जन्म-शतावार्षिकी के अवसर पर ‘संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा आयोजित विशेष समारोह में रवीन्द्रनाथ के ‘घरे बाइरे’ उपन्यास का नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत करने के लिए ‘अनामिका’ के आमंत्रित होने पर उक्त धारणा को और बल मिला।
‘अनामिका’ के प्रारंभिक पाँच वर्षों के इतिहास को हम देखें तो एक ओर हमें कार्यक्रमों की विविधता दिखलाई पड़ती है, दूसरी ओर हिंदी नाटक एवं रंगमंच को ठोस धरातल प्रदान करने की चेष्टा। सन् 1956 से 1960 के बीच ‘हम हिन्दुस्तानी है’ (आर. जी. आनंद, मार्च 1956: श्यामानंद जालान), ‘नए हाथ’ (विनोद रस्तोगी, अप्रैल 1957: बद्रीप्रसाद तिवारी), ‘चाय पाटियाँ’ (संतोष नारायण नौटियाल, जनवरी 1959: संतोष नारायण नौटियाल), ‘जनता का शत्रु’ (हेनरिक इब्सन, मार्च 1959: श्यामानन्द जालान) तथा ‘आषाढ़ का एक दिन’ (मोहन राकेश, सितंबर 1960: श्यामानन्द जालान) पूर्णांग नाटक प्रस्तुत किए गए तथा ‘संगमरमर पर एक रात’ (धर्मवीर भारती, सितंबर 1956), ‘सत्य किरण’ (कृष्ण किशोर श्रीवास्तव, सितंबर 1956), ‘नदी प्यासी थी’ (धर्मवीर भारती, जनवरी 1956), ‘पाटलीपुत्र के खँडहर में’ (कमलाकांत वर्मा, सितंबर 1957), ‘अँजो दीदी’ (अश्क, सितंबर 1958), तथा ‘नवज्योति की नई हीरोइन’ (सत्येन्द्र शरत, सितंबर 1958) एकांकी प्रस्तुत किए गए।

‘अनामिका’ की गतिविधियों का दूसरा पंचवर्षीय चरण सन् 1961 से 1965 तक था। इन वर्षों में ‘घर-बाहर’ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, 1961: श्यामानन्द जालान), ‘छपते-छपते’ (मिहिल सेबेशियन, 1963: श्यामानन्द जालान), ‘शेष रक्षा’ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, 1963: प्रतिभा अग्रवाल), ‘मादा कैक्टस’ (लक्ष्मीनारायण लाल, 1964: श्यामानन्द जालान), ‘छलावा’ (परितोष गार्गी, 1964: प्रतिभा अग्रवाल) एवं ‘कांचन रंग’ (शंभु मित्र तथा अमित मैत्र, 1965: कृष्ण कुमार) नाटक प्रस्तुत किए गए। इनमें से ‘मादा कैक्टस’ को छोड़कर अन्य सब अनुवाद एवं रूपान्तर थे।
सन् 1966 में अमृत लाल नागर के ‘सुहाग के नूपुर’ का नाट्यरूपांतर (प्रतिभा अग्रवाल) और मोहन राकेश का ‘लहरों के राजहंस’ (श्यामानन्द जालान), सन् 1967 में लक्ष्मीनारायण लाल का ‘दर्पण’ (बद्री तिवारी), ज्ञानदेव अग्निहोत्री का ‘शुतुरमुर्ग’ (श्यामानन्द जालान), शिवकुमार जोशी का ‘साप-उतारा’ सन् 1968 में बादल सरकार का एवं ‘इन्द्रजीत’ (श्यामानन्द जालान), लुइजी पिरैडेलो के ‘राइट यूँ आर इफयू थिंक सो’ का भारतीय रूपान्तर ‘मनमाने की बात’ (प्रतिभा अग्रवाल), सन् 1969 में आर्थर मिलर के 'आल माई सन्स’ का भारतीय रूपान्तर ‘मेरे बच्चे’ (शिवकुमार जोशी), सन् 1970 में मोहन राकेश का ‘आधे-अधूरे’ (श्यामानन्द जालान), बादल सरकार का ‘बल्लभपुर की रूप कथा’ (कृष्ण कुमार) तथा ‘राम-श्याम-जदु’ (बादल सरकार) नाटक प्रस्तुत किए गए। इनमें ‘साप-उतारा’, ‘रूप कथा एवं राम-श्याम-जदु’ हास्यरस प्रधान नाटक थे, शेष सभी गंभीर। गंभीर नाटक होने के कारण इन सभी प्रस्तुतियों का महत्व था तथापि, इनमें ‘लहरों के राजहंस’, शुतुरमुर्ग’, एवं ‘इन्द्रजीत’ तथा ‘आधे-अधूरे’ विभिन्न दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय हैं।

सन् 1971 से ‘अनामिका’ की गतिविधियों ने जोर पकड़ा। मई 1970 से प्रारंभ की गई रविवारीय प्रदर्शन की योजना ने ‘अनामिका’ के कार्यकर्ताओं को सत क्रियाशील रहने को बाध्य किया। 1971 के प्रारंभ में ‘पगला-घोड़ा’ (श्यामानन्द जालान) का मंचन हुआ। भावनाओं के आलोड़न को बड़ी तीव्रता से प्रस्तुत करने वाला बादल सरकार का यह नाटक लोकप्रिय हुआ। उसी समय ‘बहु-रूपी’ ने भी इसे बँग्ला में प्रस्तुत किया। दोनों प्रदर्शन महीनों तक साथ-साथ चले और चर्चा का विषय रहे। मई 1971 में रविवारीय कार्यक्रम को एक वर्ष पूरा हुआ।
सन् 1970 और 1971 के दो बाल नाटकों का उल्लेख इसी प्रसंग में आवश्यक है।
प्रथम वर्ष श्यामा जैन द्वारा रचित एवं निर्देशित ‘कृतघ्न मनुष्य’ तथा 1971 में आत्मानन्द द्वारा रचित एवं निर्देशित ‘मासूम’ बाल नाटक बड़े लोकप्रिय हुए। सच पूछिए तो कलकत्ता में तभी से बाल नाटक प्रस्तुत करने की परंपरा सी चल पड़ी। 1973 में ‘अनामिका’ ने ही श्यामाजी के एक और नाटक ‘सुधीर और शैल’ का मंचन किया।
सन् 1972 में पुनः तीन नए नाटक प्रस्तुत किए गए- ‘कहत कबीरा’ (लेखन एवं निर्देशन: शिवकुमार जोशी), ‘हय बदन’ (गिरीश कार्नाड निर्देशन: राजेन्द्रनाथ) तथा ‘चटनी टमाटर की’ (गणेश बागचीय निर्देशन: शिवकुमार झुनझुनवाला)। ‘कहत कबीरा’ में मंच पर छोटा सा चकी मंच (12 फिट) भी लगाकर दृश्य परिवर्तन करने का नया प्रयोग किया गया। ‘हय बदन’ के निर्देशन के लिए दिल्ली से श्री राजेन्द्रनाथ को आमंत्रित किया गया।
इसी वर्ष श्री बसंत पोद्दार के एकालाप ‘सेर सिवराज ह’ के छह प्रदर्शन भी ‘अनामिका’ के तत्वावधान में किए गए।
सन् 1973 में पुनः तीन नाटकों- ‘लँगड़ी टाँग’ (हरि शंकर परसाई), ‘अबूहसन’ (बादल सरकार), ‘इस अँधेरे से’ (अमृत राय) तथा दो एकांकियों- ‘सेतुबंध’ एवं ‘नायक खलनायक विदूषक’ (सुरेन्द्र वर्मा) के साथ ही बसंत पोद्दार का एकालाप ‘अग्नि-पुत्र’ प्रस्तुत किए गए। प्रथम दोनों नाटकों का निर्देशन विमल लाठ ने, तीसरे का शिवकुमार झुनझुनवाला ने, तथा एकांकियों का प्रतिभा अग्रवाल ने किया।
सन् 1974 में ‘सारी-रात’ (बादल सरकार), ‘प्रयोग’ (कमलाकान्त वर्मा), ‘बड़ी बुआजी’ (बादल सरकार) तथा ‘चन्द्रगुप्त’ (प्रसाद) प्रस्तुत किए गए। ‘सारी रात’ की प्रस्तुति अत्यंत प्रभावपूर्ण हुई। स्त्री-पुरुष के संबंधों की उलझनों और घुटन को बड़ी गहराई से इस नाटक में बादल सरकार ने चित्रित किया है और उसे उतनी ही निष्ठा एवं गहराई के साथ निर्देशक शिवकुमार झुनझुनवाला ने उभारा तथा स्त्री की भूमिका में अभिनय करने वाली कलाकार यामा ने जिया। इस प्रस्तुति से ‘अनामिका’ एवं निर्देशक दोनों को प्रतिष्ठा मिली।

Bimal Lath in Middel
सन् 1975 में ‘अनामिका’ ने केवल दो नाटक प्रस्तुत किए- शिवकुमार जोशी रचित ‘लक्ष्मण रेखा’ और बादल सरकार रचित ‘बाकी इतिहास’। प्रथम का निर्देशन स्वयं नाट्यकार ने किया और दूसरे का शिवकुमार झुनझुनवाला ने। इसी वर्ष अगस्त में ‘लक्ष्मण रेखा’ का दूरदर्शन से प्रसारण भी हुआ।
अप्रैल सन् 1976 में रवि दवे के निर्देशन में प्रेमचन्द की अमर कृति ‘गोदान’ का नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत किया गया। ‘अनामिका’ की इस प्रस्तुति ने साहित्य एवं नाट्य मर्मज्ञ, सामान्य दर्शक, छात्र वर्ग, ग्रामीण वातावरण में पले लोगों- तात्पर्य यह कि समाज के हर वर्ग के मन को को स्पर्श किया।
सन् 1976 में ही मणि मधुकर रचित ‘दुलारी बाई’ का मंचन हुआ, निर्देशक वे स्वयं थे।
अक्टूबर 1976 से ‘अनामिका’ ने एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया- ‘नाटक’। तीन अंकों के बाद इसका नाम बदलना पड़ा- ‘नाट्य वार्ता’।
सन् 1977 में ‘अनामिका’ केवल दो नए नाटक कर पाई- ‘देना-पावना और मिस आलूवालिया’। मिस आलूवालिया का निर्देषन किया स्व0 षेखर चटर्जी व गोपाल कलवानी ने। इस नाटक के 150 के करीब प्रदर्षन हुए। इसमें श्री कलवानी के अभिनय को बहुत ही सराहा गया। शरतचन्द्र की शतवार्षिकी के अवसर पर ‘देना पावना’ विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। रूपान्तर प्रतिभा जी ने किया एवं निर्देशन भी उन्होंने ही किया।
सन् 1978 प्रस्तुतियों की दृष्टि से अधिक सक्रिय वर्ष था। इस साल ‘वंशवृक्ष’, ‘एक था गधा’, ‘शरशय्या’ तथा ‘सूरदास’- चार नाटक प्रस्तुत हुए। कन्नड़ के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘वंशवृक्ष’ का रूपान्तर प्रतिभा जी ने किया।
इस साल की अंतिम प्रस्तुति ‘सूरदास’ थी। ‘सूरदास पंचशती समारोह समिति’ के आमंत्रण पर इसे विशेष रूप से तैयार किया गया पहला प्रदर्शन समिति द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सूर संगोष्ठी के अवसर पर 11 दिसंबर को किया गया। सूर-प्रेमियों ने इसे खूब सराहा, किन्तु नाट्य-प्रेमियों की दृष्टि में सूर के जीवन, दृष्टि और पदों को प्रस्तुत करने वाली यह कृति शिथिल रही।
सन् 1979 में दो नाटक हुए- ‘कथा एक कंस की’ तथा ‘हिमालय की छाया’। दया प्रकाश सिन्हा रचित ‘कथा एक कंस की’ एक सशक्त कृति है।
‘हिमालय की छाया’ वसंत काने टकर की बहुचर्चित
कृति है। इसका निर्देशन शिवकुमार जोषी ने किया। इसमें साठ-सत्तर वर्ष के बूढ़े की प्रमुख भूमिका में प्रदीप अरोड़ा ने बहुत सशक्त अभिनय किया। साथ ही सुस्मिता सिंघी (अब गुप्ता) ने माँ की भूमिका में अत्यन्त प्राणवान अभिनय किया। उसके लिए यह पहली महत्वपूर्ण भूमिका थी।
22 दिसंबर सन् 1979 को ‘अनामिका’ ने पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश किया। सन् 1980 को रजत जयन्ती वर्ष घोषित किया गया और अवसर के उपयुक्त वर्ष व्यापी कार्यक्रम आयोजित किया गया।
जनवरी 1980 में पाँच दिनों का ‘अनामिका’- नाट्योत्सव आयोजित हुआ, जिसमें तीन पुराने नाटकों की पुनरावृत्ति हुई तथा दो नए नाटक प्रस्तुत किए गए। सन् 1957 में प्रस्तुत ‘नए हाथ’ के तीन कलाकार भँवरमल सिंघी, नरेन्द्र अग्रवाल तथा प्रतिभा अग्रवाल ने पुरानी भूमिकाओं में अभिनय किया, शेष कलाकार नए रहे। इसी प्रकार सर्वप्रथम सन् 1969 में प्रस्तुत ‘बल्लभपुर की रूपकथा’ की पुनरावृत्ति हुई, जिसमें उत्तम राम नागर, आत्मानंद तथा नरेन्द्र अग्रवाल अपनी पुरानी भूमिकाओं में उतरे, रामगोपाल बागला नई में। सन् 1970 में प्रस्तुत ‘आधे-अधूरे’ के मूल कलाकारों में कृष्णकुमार तथा प्रतिभा अग्रवाल ने पुनः नई प्रस्तुति में अभिनय किया, शेष नए कलाकार लिए गए। सन् 1974 में अनामिका द्वारा आयोजित नाट्योत्सव में जयशंकर प्रसाद के चंद्रगुप्त की प्रस्तुति एक चुनौती थी। पूरे परिश्रम के बावजूद प्रस्तुति को सीमित सफलता मिली। केवल महोत्सव में एक प्रदर्शन होकर रह गया। इस प्रस्तुति के बाद निर्देशन में अंतराल रहा, सन् 1978 में शरद जोशी का 'एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ' को प्रस्तुत किया। ‘गोदान’ (1976), ‘आधे-अधूरे’ (1980), ‘नये हाथ’ (1980, पुनः मंचन), ‘रेशमी रूमाल’ (1988), ‘इस पार उस पार’ तथा ‘साँझ ढले’ (1985) आदि।
नई प्रस्तुतियों में ‘हानूश’ उल्लेखनीय है। भीष्म साहनी का यह नाटक दर्शकों द्वारा प्रशंसित हुआ, निर्देशक थे रवि दवे।‘अनामिका’ ने अपनी रजत जयंती मनाकर एक पड़ाव पार किया। उसके सामने उज्ज्वल किन्तु संघर्षमय भविष्य है।श्यामानन्द जालान ‘अनामिका’ के महत्वपूर्ण निर्देशक थे, सब उनकी कुशलता के कायल थे, कोई समस्या नहीं थी। सन् 1971 में अनामिका से श्री श्यामानन्द जालान का अलग होना, इस घटना को कोलकाता का कोई नट्य प्रेमी भुला नहीं पायेगा। श्यामानन्द जालान ने अनामिका में रहते हुए, अनामिका की ही एक अन्य कलाकार ' चेतना' से पहली पत्नी 'किरण' के रहते-रह्ते ही दूसरा विवाह कर लिया, जो 'अनामिका' जैसी संस्था के नाम पे बदनुमा धब्बा था । श्यामानन्दजी के ‘अनामिका’ से अलग होने पर निर्देंशक का भार दूसरों के कंधों पर देने को बाध्य होना पड़ा। हालांकि इस विघटन के बाद अनामिका का प्रदर्शन कम और प्रभावहीन होता चला गया श्री भंवरमल सिंघी व शुशीला सिंघी के देहावसान पश्चात तो यह संस्था प्रायः मृत सी हो गई है।

अनामिका से श्यामानन्द जालान अलग होने के बाद 1972 में ‘पदातिक’ नाम से नई संस्था का जन्म दिया। जिसके तत्वाधान में शुरूआती वर्ष में ‘गिधाड़े’, ‘सखाराम बाइंडर’, ‘हजार चैरासी की माँ तथा शकुंतला’ नाटकों का संचय किया गया। ‘पदातिक’ बन जाने के बाद कलकत्ते के हिन्दी रंगमंच में नए दौर की शुरुआत हुई। आज कोलकात्ता जैसे शहर में ‘पदातिक’ एक शिक्षण संस्थान के रूप में काफी चर्चित हो गई है। जिसका एक मात्र श्रेय श्री श्यामानन्द जी जालान को ही जाता है।
पदातिक


1949- नया समाज, 1950- विवाह का दिन, 1951- समस्या, 1952- अलग अलग रास्ता, 1953- एक थी राजकुमारी, 1954- कोणार्क, 1955- चंद्रगुप्त, 1956- हम हिन्दुस्तानी है, 1956- संगमरमर पर एक रात, 1956- सत्य किरण, 1957- नदी प्यासी थी, 1957- पाटलीपुत्र के खंडहर में, 1957- नये हाथ, 1958- अंजो दीदी, 1958- नवज्योती के नयी हिरोइन, 1958- नीली झील, 1959- जनता का शत्रु, 1959- कामायनी (डांस ड्रामा), 1960- आशाढ़ का एक दिन, 1961- घर और बाहर, 1963- शेष रक्षा, 1963- छपते छपते, 1964- मादा कैक्टस, 1966- लहरों के राजहंस, 1967- शुतुरमुर्ग, 1968- मन माने की बात, 1968- एवम् इंद्रजीत, 1970- आधे अधूरे, 1971- पगला घोड़ा, 1972- पंछी ऐसे आते हैं, 1972- तुगलक (बांग्ला),1973- सखाराम बाइंडर, 1977- गुड वुमन आफ सेटजुआन, 1978- हजार चैरासी की माँ, 1980- कौवा चला हंस की चाल, 1980- शकुंतलम्, 1981- पंक्षी ऐसे आते हैं, 1982- उद्वास्त धर्मशाला, 1982- बीबियों का मदरसा, 1983- आधे अधूरे, 1985- मुखिया मनोहरलाल, 1987- कन्यादान, 1987- क्षुदितो पाशाण, 1988- राजा लियर, 1989- बीबियों का मदरसा, 1991- सखाराम बाइंडर, 1992- आधार यात्रा, 1995- रामकथा रामकहानी, 1998- कौवा चला हंस की चाल, 2000- खामोश अदालत जारी है, 2006- माधवी, 2008- लहरों के राजहंस।
नोट: निर्देषक और अभिनेता के रूप में इन नाटकों में श्री श्यामानन्द जालान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
अकृतः

श्री गोपाल कलवानी द्वारा निर्मित नाट्य-संस्था है जिसका मूल उद्देश्य है कोलकाता में हिन्दी नाट्य-मंच पर व्याप्त षून्य में से गुजरते हुए उसे इकाइयों, दहाइयों एवं ईश्वर चाहे तो अनगिनत संख्याओं में परिवर्तित करना ।
हिंदी नाट्य-मंच जिसका स्वर्णिम अतीत आसमान की ऊँचाइयाँ पाने के बाद बादलों के पीछे ओझल होता प्रतीत हो रहा था, बादलों के साये में से उसके अलौकिक आलोक का उद्दीपन आपको नजर आये, उसे उसका वर्तमान मिल जाए । ‘अकृत’ नाटक के साथ-साथ कला एवं संस्कृति के हर क्षेत्र में कार्य करने को प्रस्तुत है। गीत-संगीत नृत्य, चित्रकला व साहित्य सभी लौह कड़ियों से एक ऐसी मजबूत श्रृंखला बने जिसे चाहकर भी कोई तोड़ न पाये-अकृत के कार्य कलापों में यही भावना परिलक्षित होगी । इसके प्रमाण स्वरूप ‘अकृत’ की पहली प्रस्तुति ‘मायाजाल’ है। विजयदान की राजस्थानी कहानी ‘अमित लालसा’ पर आधारित यह संगीतमय नाटक दर्शकों को खूब पंसद आया। निर्देशक गोपाल कलवानी ने स्वरचित गीतों और लोक नृत्यों के माध्यम से इसे लोक नाटक का रूप दे दिया है ।
‘LittleThespain’:



Uma JhunJhunwala In 'Yadoon ke bhuje savere'

उमा झुनझुवाला द्वारा संचालित संस्था ने कथा-कोलाज-1 और कथा कोलाज-2 (2007 में) ‘?’ प्रश्नचिन्ह (हिन्दी, 2007 में), मंटों की कहानी पर आधारित नाट्य मंटों ने कहा (उर्दू 2006) यादों के बूझे हुए सवेरे (उर्दू 2005) हयवदन (नेपाली 2004 में), शुतुरमुर्ग (हिन्दी 2004 में), काँच के खिलौने (हिन्दी 2002 में) लाहौर (हिन्दी 1999) सुलगते चिनार (उर्दू 1996) महाकाल (हिन्दी 1995) और जब
आधार नहीं रहते हैं (हिन्दी 1997) और भी कई नाटकों मे आपकी संस्था ने महत्व पूर्ण पार्ट अदा किया है जिसमें बड़े भाई साहब (हिन्दी उर्दू 2006) रक्सी को श्रृष्टीकर्ता (नेपाली 2003) नमक की गुड़ीया (उर्दू 2001) तमसीली मुशायेरा (उर्दू 1998) सतगति (हिन्दी उर्दू 1994) और आग अब भी जल रही है (हिन्दी 1994) प्रमुख हैं। आपकी संस्था द्वारा कई स्ट्रीट नाटकों का भी मंचन किया गया-जिनमें ब्लैक संडे, किस्सा कुर्सी का, अटलबाबू-पटलबाबू, हाहाकार, खेल-खेल में आदि प्रमुख हैं।

शनिवार, 28 जून 2008

Syamanand Jalan [ श्यामानन्द जालान ]

13 जनवरी 1934 को जन्मे श्री जालान का लालन पालन एवं शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः कलकत्ता एवं मुजफ्फरपुर में ही हुई हैं। बचपन से राजनैतिक वातावरण में पले श्री जालान के पिता स्वर्गीय श्री ईश्वरदास जी जालान पश्चिम बंगाल विधान सभा के प्रथम अध्यक्ष थे। वकालत का पेशा निभाते हुए रंगमंच के प्रति अपने दायित्व और प्रतिबद्धता को पूरी निष्ठा से निभाने वाले इस रंगकर्मी को ‘नए हाथ’ नाटक के लिए 1957 में सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए एवं 1973 में जीवन की जीवन की संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत कर सम्मानित किया जा चुका है।
श्री जालान को भारतीय रंगमंच का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। बचपन से नाटक से जुड़े श्री जालान एक प्रगतिशील रंगकर्मी, सशक्त अभिनेता एवं सफल निर्देशक हैं। इनकी शुरुआत हिन्दी नाटकों से हुई मगर बाद में बंगला में ‘तुगलक’ के निर्देशन एवं अँग्रेजी में ‘आधे-अधूरे’ के अभिनय के लिए भरपूर सराहना प्राप्त की।
बंगला फिल्म ‘चोख’ के लिए विशिष्ट सहायक अभिनेता का पुरस्कार बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एशोसियेशन द्वारा दिया गया। ‘तरुण संघ’ ‘अनामिका’ एवं ‘पदातिक’ जैसी नाट्य संस्थाओं के संस्थापक निर्देशक श्री जालान भारतीय सांस्कृतिक संघ परिषद - भारत महोत्सव और भारतीय नाटक संघ में कई देशों की यात्रा कर चुके हैं तथा मास्को, बर्लिन, फ्रेकफर्ट, हवाना और कनाडा में आयोजित कई नाट्य-गोष्ठियों में भारतीय रंगमंच का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। आपने टी0बी0 सीरियल ‘कृष्णकांत का वसीयतनामा’ का निर्देशन किया एवं टी0बी0 फिल्म ‘सखाराम बाइंडर’ का निर्देशन भी आपने ही किया है।
सर्वप्रथम आपने हरि कृष्ण प्रेमी द्वारा लिखित ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक में एक चपला युवती का अभिनय किया था। जिसका निर्देशन किया था। ललित कुमार सिंह नटवर ने, उसके बाद स्काटिश चर्च
कॉलेज में ललित कुमार जी के ही निर्देशन में उपेन्द्रनाथ का ‘अधिकार के रक्षक’ नाटक में अभिनय किया । 1949 से तरुण संघ के अंतर्गत नाटक करने लगे।
आपने तरुण राय से आधुनिक नाट्य विद्या और पश्चिमी नाट्य शैली का परिचय प्राप्त किया। उनके लिखे एक बाल नाटक ‘रूप कथा’ का ‘एक थी राजकुमारी’ के नाम से हिन्दी में अनुवाद और निर्देशन किया, इन्होंने ही बतौर निर्देशक यह इनका पहला नाटक था।
सन् 1955 में भँवरमल जी, सुशीला जी, प्रतिभा जी के साथ मिलकर ‘अनामिका’ की स्थापना की।
सन् 1971 तक का काल जब श्यामानन्द जी ‘अनामिका’ से अलग हुए, ‘अनामिका’ और श्यामानन्द दोनों के जीवनकाल में इस काल के पूर्व तक कई महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ सामने आई। जिन्होंने ‘अनामिका’ और श्यामानन्द जालान को गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित किया। उनमें विशेष उल्लेखनीय है। ‘छपते-छपते’, ‘लहरों के राजहंस’, ‘शुतुरमुर्ग’ तथा ‘इन्द्रजीत’ इन चारों के निर्देशक श्यामानन्द जालान थे। श्यामानन्दजी की एक और प्रस्तुति ‘विजय तेन्दुलकर’ के इस नाटक को उन्होंने सर्वथा भिन्न शैली में प्रस्तुत किया।
‘अनामिका’ में श्यामानन्द की यह अंतिम प्रस्तुति थी। इसके बाद कुछ व्यक्तिगत कारणों से आप ‘अनामिका’ से अलग हो गए। सन् 1972 में उन्होंने ‘पदातिक’ नाम से एक अलग संस्था को जन्म दिया। जिसके तत्वाधान में शुरूआती वर्ष में ‘गिधाड़े’, ‘सखाराम बाईपुर’, ‘हजार चैरासी की माँ तथा शकुंतला’ नाटकों का संचय किया गया। ‘पदातिक’ बन जाने के बाद कलकत्ते के हिन्दी रंगमंच में नए दौर की शुरुआत हुई। आज कोलकात्ता जैसे शहर में ‘पदातिक’ एक शिक्षण संस्थान के रूप में काफी चर्चित हो गई है। जिसका एक मात्र श्रेय श्री श्यामानन्द जी जालान को ही जाता है।
श्यामानन्द जालान 'पदातिक' की प्रस्तुति


1949- नया समाज, 1950- विवाह का दिन, 1951- समस्या, 1952- अलग अलग रास्ता, 1953- एक थी राजकुमारी, 1954- कोणार्क, 1955- चंद्रगुप्त, 1956- हम हिन्दुस्तानी है, 1956- संगमरमर पर एक रात, 1956- सत्य किरण, 1957- नदी प्यासी थी, 1957- पाटलीपुत्र के खंडहर में, 1957- नये हाथ, 1958- अंजो दीदी, 1958- नवज्योती के नयी हिरोइन, 1958- नीली झील, 1959- जनता का शत्रु, 1959- कामायनी (डांस ड्रामा), 1960- आशाढ़ का एक दिन, 1961- घर और बाहर, 1963- शेष रक्षा, 1963- छपते छपते, 1964- मादा कैक्टस, 1966- लहरों के राजहंस, 1967- शुतुरमुर्ग, 1968- मन माने की बात, 1968- एवम् इंद्रजीत, 1970- आधे अधूरे, 1971- पगला घोड़ा, 1972- पंछी ऐसे आते हैं, 1972- तुगलक (बांग्ला),1973- सखाराम बाइंडर, 1977- गुड वुमन आफ सेटजुआन, 1978- हजार चैरासी की माँ, 1980- कौवा चला हंस की चाल, 1980- शकुंतलम्, 1981- पंक्षी ऐसे आते हैं, 1982- उद्वास्त धर्मशाला, 1982- बीबियों का मदरसा, 1983- आधे अधूरे, 1985- मुखिया मनोहरलाल, 1987- कन्यादान, 1987- क्षुदितो पाशाण, 1988- राजा लियर, 1989- बीबियों का मदरसा, 1991- सखाराम बाइंडर, 1992- आधार यात्रा, 1995- रामकथा रामकहानी, 1998- कौवा चला हंस की चाल, 2000- खामोश अदालत जारी है, 2006- माधवी, 2008- लहरों के राजहंस।
नोट: निर्देषक और अभिनेता के रूप में इन नाटकों में श्री श्यामानन्द जालान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
संदर्भः ‘मंचिका’ विकासोत्सव विशेषांक मारवाड़ी युवा मंच और 'पदातिक' संपर्क: 9830059978

रविवार, 22 जून 2008

इंसान

जिन्दगी को बार-बार 'खोज' देखो यहाँ
ये बड़ा रत्न अनमोल, 'तरास' देखो यहाँ ।
बन प्रकाश बाती, 'जल' देखो यहाँ,
जिन्दगी को एक बार 'जळा" देखो यहाँ ।।

जिन्दगी तराजू है, 'तौळ' देखो यहाँ,
ये बड़ी पहेली है, 'मोळ' देखो यहाँ ।
हर चौराहे पे खड़ा 'शैतान' देखो यहाँ,
दीप न जले तो, 'हैवान' देखो यहाँ ।।

आँसुओं के बीच 'मेहमान' देखो
माँ के दर्द में 'भगवान' देखो यहाँ ।
काँटों में भी खिलता 'फूल' देखो यहाँ,
जहर पी के भी जीता 'इंसान' देखो यहाँ ।।

सोमवार, 16 जून 2008

सभ्य समाज के पहरेदारों!


इटावा जिले के एक गांव में जमीन के विवाद में वहां की स्‍थानीय पुलिस ने विवाद को समाप्त करने के लियें जो कार्य किया उससे यह सिद्ध कर दिया कि निजाम चाहे जो भी हो लेकिन पुलिस की कार्य प्रणाली में कोई बदलाव नही आने वाला है । थानों में बडे-बडे बोर्ड लगाकर मानवधिकार का पाठ पढाने वाली पुलिस यहां पर सरे राह पुलिस मानवधिकार को धता बता रही है । एक महिला (जिसे सभ्‍य समाज मे अबला भी कहा जाता है) के बाल पकड़ कर पिटायी करती हुयी ले जा रही है । साभार : दैनिक जागरण ।

सभ्य समाज के पहरेदारों!
देखो मानव आज,
इनकी भृकुटी तनी हुई है,
चहरे पे रोआब,
मानो कोई जीत लिया हो
सारा हिन्दुस्तान।
बात-बात में अड़ जाते हैं
सत्ता की ले धार....
इनको सबक मिलेगी तब,
गूंगी संसद में होगी,
जब महिलाओं की आवाज। - शम्भु चौधरी

भोपाल तीन काल

-1-

चलती ट्रेनों में,
जिन्दा लाशों को ढोनेवाला,
ऎ कब्रगाह- भोपाल!
तुम्हारी आवाज कहाँ खो गई?
जगो और बता दो,
इतिहास को |
तुमने हमें चैन से सुलाया है,
हम तुम्हें चैन से न सोने देगें।
रात के अंधेरे में जलने वाले,
ऎ श्मशान भो-पा-ल....
जगो और जला दो
उस नापाक इरादों को
जिसने तुम्हें न सोने दिया,
उसे चैन से सुला दो। [प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र: 28 दिसम्बर1987]

-2-

वह भीड़ नहीं - भेड़ें थी ।
कुछ जमीन पर सोये सांसे गिन रही थी।
दोस्तों का रोना भी नसीब न था।
चांडाल नृत्य करता शहर,
ऎ दुनिया के लोग;
अपना कब्रगाह या श्मशान यहाँ बना लो।
अगर कुछ न समझ में न आये तो,
एक गैसयंत्र ओर यहाँ बना लो।
मुझे कोई अफसोस नहीं,
हम तो पहले से ही आदी थे इस जहर के,
फर्क सिर्फ इतना था,
कल तक हम चलते थे, आज दौड़ने लगे।
कफ़न तो मिला था,
पर ये क्या पता था?
एक ही कफ़न से दस मुर्दे जलेगें,
जलने से पहले बुझा दिये जायेगें,
और फिर
दफ़ना दिये जायेगें। [प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र: 02 दिसम्बर1987]


-3-

भागती - दौड़ती - चिल्लाती
आवाज...
कुछ हवाओं में, कुछ पावों तले,
कुछ दब गयी,
दीवारों के बीच।
कुछ नींद की गहराइयों में,
कुछ मौत की तन्हाइयों में खो गई।
कुछ माँ के पेट में,
कुछ कागजों में,
कुछ अदालतों में गूँगी हो गयी।
गुजारिश तुमसे है दानव,
तुम न खो देना मुझको,
जहाँ रहते हैं मानव। [प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र: 5 नवम्बर 1988]

-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106
email; ehindisahitya@gmail.com

सोमवार, 9 जून 2008

कारगिल

विधवा! विधवा न कहलाना,
तेरे माथे का सुहाग
अमर-अमिट हो लहरायेगा;
फूल खिलेगें उस धरती पर
जहाँ हमने शीश कटाया है।
रणभूमि हो या जन्मभूमि
बलिदान उसी का लेती है,
जो शीश कटाने जाते हैं,
माँ शीश उसी का लेती है।
तेरी ममता, तेरी छाया,
तेरे आँचल का श्रृंगार,
घर-घर में अब याद करेगा
सारा हिन्दुस्तान।
विधवा! विधवा न कहलाना,
तेरे माथे का सुहाग
अमर-अमिट हो लहरायेगा;
फूल खिलेगें उस धरती पर
जहाँ हमने शीश कटाया है। [karagil]
-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

चूँड़ियों की खनक

चूँड़ियाँ पहन बैठे वतन के पहरेदारों!
चूड़ियों की खनक तो सुनो,
ये तेरी ही माँ-बहनों की है।
जो सड़कों पे खड़ी मांग रही है,
देश की रक्षा,
संसद में सीट,
बच्चों की सुरक्षा।
गर नहीं दे सकते,
संसद खाली कर दो।
अब तुम्हें नहीं देना है,
उनको आरक्षण,
नहीं देना है उसे मताधिकार,
उठो! उठो! पकड़ लो कलम बस
सुना दो इन्हें चुड़ियों का भैरवी राग।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

एक गीत: आसमान को छू लें

आओ हमसब मिल, आसमान को छू लें।
चन्दामामा से मिल सब,
दूध-बतासा ले लें।
चुन-चुनकर 'तारे' सब,
झोली में हम भर लें,
आओ हमसब मिल, आसमान को छू लें।
सूरज की किरणों से मिल,
नई राह दिखलायें,
प्रकाश ज्ञान का फैले,
ऎसा मार्ग बनायें।
आओ हमसब मिल, आसमान को छू लें।
बादल के ओटों में छुप-छुप
आँख मिचौली खेलें,
बरस रहे बादल को,
होटों से हम पीं लें।
आओ हमसब मिल, आसमान को छू लें।
पौ फटने से पहले ही हम
नये गीत को रच लें,
चन्दामामा-तारे सब,
रंगों से हम भर लें,
आओ हमसब मिल, आसमान को छू लें।
स्वर की रचना,
नित्य नवगीत बनाना,
नाच रहे हो कृष्ण-कन्हाई
ऎसे भाव जगाना,
आओ हमसब मिल, आसमान को छू लें।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

ई-हिन्दी साहित्य सभा' द्वारा वर्ष 2008-09 का ब्लॉग पुरस्कार


ई-हिन्दी साहित्य सभा' द्वारा वर्ष 2008-09 के लिये श्रेष्ट ब्लॉगधारक/संचालक को 500/- रुपये की धनराशी (पाँच अलग व्यक्ति को अलग-अलग) से पुरस्कृत किया जायेगा। आप अपनी या किसी अन्य के ब्लॉग के विषय में यहाँ प्रविष्टी जमा करा सकते हैं । यहाँ जमा प्रविष्टियोँ में से ही पाँच व्यक्तियों को पुरस्कृत किया जायेगा। -- शम्भु चौधरी

कुछ शर्तें:-
1.प्रविष्टियोँ जमा करने की अंतीम तारीख: 30.08.2008 है।
2.प्रतियोगियों को अपना पूरा परिचय,ई-मेल पता, फोन नम्बर देना अनिवार्य होगा।
3.जिस ब्लाग से आपकी प्रविष्टी जमा होगी, उस ब्लाग से जूड़ी सभी ब्लाग्स को एक ही माना जायेगा।
4.चुने हुये पाँच ब्लागधरकों में से एक को राष्ट्रीय विजेता घोषित किया जायेगा,
जिसका चयन तीन सदस्यों की एक टीम करेगी। उसे 'ई-हिन्दी साहित्य सभा' द्वारा सम्मानित किया जायेगा।

शब्दों का अध्ययन

जीवन में मनुष्य के पास एक अनमोल खजाना है, जिसे हम शब्दों का भंडार भी कह सकते हैं। संसार की किसी भी भाषा को हम लें , साहित्य से ही उस समाज की संस्कृ्ति - समृद्धी का पता चलता है। साहित्य बिन भाषा नहीं लिखी जा सकती। भाषा का आधार भले ही किसी भी लिपि में क्यों न हो, उसमें भरे हुए शब्दों का भंडार ही उस समाज की संस्कृति को बचाये रखने में समर्थ हो सकती है। अन्यथा मनुष्य जीवन पशु समान हो जाता, या पशु जीवन यापन करता। हम कभी-कभी इन शब्दों के कारण कई जगह हार जाते हैं , सम्मान भी पाते हैं। परिवार में कई बार आपसी कलह भी देखने को मिलते हैं। परिवार टूटते और बिखर जाते हैं।
माता-पिता कुंठित हो जाते हैं, पति-पत्नी के जीवन में कलह भर जाता है, दो प्रेमियों में विवाह तो कहिं तलाक हो जाता है। सास-बहु की तकरार में न जाने कितनी बहुओं ने अपने जीवन को स्वाह कर दिया । जीवन का उतार-चढ़ाव, कटुता, व्यंग्य, हास्य, प्रेम-पश्चात्ताप, युद्ध-शान्ति ये सभी शब्दों के साथ बनते और बिगड़ते हैं। हम जब महाभारत में 'कामधेनु' विनोद व्यंग्य की कथा याद करते है तो इसका परिणाम पार्वती को "द्रोपदी" के रूप में पाँच भाइयों की पत्नी बनकर पश्चाताप करना पडा़ था, पुनः द्रोपदी के कटाक्ष " अन्धा का बैटा अंधा" कहने का परिणाम भी भरी सभा में भुगतना पड़ा था। हम यह मान लेते हैं कि हम जो कुछ कहते हैं वह सही है, या वे ही सही है, या उतना ही सही है - यह सोचना सामने वाला आपकी बात को किस तरह या किस रूप में ग्रहण करता है, पर ही निर्णय लिया जा सकता है कि आपकी बात किस हद तक सही है और सही है भी कि नहीं।
कलिंग युद्ध में अशोक का हृदय परिवर्तन, सिकन्दर और पोरस की लडा़ई, हिटलर का प्रेम विवाह एवं सुहागरात के रात्री ही जीवन की समाप्ती, सिद्धार्थ का बुद्ध बनना, रावण द्वारा सीता का हरण, विभेषण द्वारा रावण को समझाना एवं लंका का त्याग, द्रोपदी का चीरहरण, महाभारत में 'अश्वातामा मारो गयो' , कर्ण की दानवीरता, राजा हरिश्चन्द्र का त्याग, एकलव्य की गुरू दक्षिणा, ईसा का सूली पर चढ़ना, अथवा जितने भी प्रकार के धार्मिक ग्रन्थ भले ही किसी भी धर्म के हों ये सभी शब्दों के अनुमोल भंडार से भरा हुआ हैं, एक-एक शब्दों के आज भी कई-कई माने निकाले जार रहें हैं, उपरोक्त सभी घटनायें या ऎसी ओर भी घटनायें शब्दों से पटा पड़ा है। जिसे ज्ञान का सागर नहीं समुद्र कहा जा सकता है। आपकी इच्छा शक्ति इस बात पर निर्भर करती है कि आप इस सागर से कितना कुछ ले पाते हैं। आज के युग में तो यह ओर भी आसान हो गया है, शब्द जानने की जरूरत भर ही आपको उस शब्द से जूड़ी तमाम जानकारी खुद-व-खुद आपके सामने एकत्र हो जाती है। बस हमें सोचने भर की देर है। परन्तु इस ज्ञान का प्रयोग जब हम अपने स्वार्थ के लिये करने में लग जाते हैं तो शब्दों का अर्थ बदल जाता है। एक किसान के शब्दों में जो स्वच्छता झलकती है, वहीं शिक्षित व्यक्ति के स शब्दों में स्वच्छता हमें खोजनी पड़ती है। एक बच्चे का तू-तू और हमलोगों द्वारा किया गया तू-तू में अन्तर शब्दों का नहीं , परन्तु बच्चे के शब्दों में जो स्नेह झलकता है वहीं हमलोगों के शब्दों में विवाद को जन्म देने की बात सामने आती है। हमालोगों के जीवन में भी कई ऎसे क्षण आते हैं हम किसी बात पर अति भावुक हो जाते तो वहीं किसी अन्य बात पर हँसने या रोने लगते हैं यह क्रिया शब्द के प्रभाव को हमारे जीवन में दर्शाती हैं। इसके लिये हमें इस बात का ज्ञान होना जरूरी हो जाता है कि हम उस शब्द को ग्रहण कर पा रहें हैं कि नहीं। उदाहरण के तौर पर एक बंगलाभाषी किसी बात को ग्रहण कर हँसने लगता हो, तो वहीं खड़ा एक अंग्रेज यह सोच में पड़ जाता है कि वह व्यक्ति आखिर किस बात पर हँसा।
वैज्ञानिक तौर पर हम इसे निम्न श्रेणी में विभक्त कर सकते हैं।
1. स्वयं पर : जब किसी घटना का वृतांत आप दूसरे को सुनाते हैं, तो आप स्वयं भी भावुक हो जाते हैं।
2. अन्य पर : जब कोई अन्य आपको कोई घटना का वृतांत सुना रहा होता तो , उसके सामने आप भावुक होने का दृश्य पैदा तो करते है परन्तु मन में संतोष जाहिर करते हैं, कि जो हुआ अच्छा हुआ। जबकि सामने वाला आपके सहानुभूती से प्रभावित हो रोने लगता है।
3.अपने और दुश्मन की बात पर एक तरफ़ हम रोने लगते तो दूसरी तरफ खुशी का इजहार करते हैं।
4.खेल के मैदान में हार-जीत पर भी अस तरह की प्रतिक्रिया हमें देखने को मिलती है।
5.कई बार एक बात को सुनकर भी हम गम सह लेते हैं और समारोह में या परिवार के बीच उस घटना को मामूली मान कर हँसने का नाटक करते हैं, परन्तु एकांत में जाते ही फूट-फूटकर रोने लगते हैं।
इस तरह की कई क्रियाओं का अलग-अलग अध्ययन किया जा सकता है। जिससे हमें जीवन के महत्वपूर्ण गूढ़ तत्व प्राप्त हो सकते हैं। - शम्भु चौधरी [09-06-2008]

रविवार, 8 जून 2008

राजस्थानी कविता: म्हानै कईयाँ भूल्या रे!

मेरी पहली राजस्थानी कविता जिसे 4 मार्च 1987 को लिखी थी। यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ।
कोई गलती हो तो जानकारी देने की कृपा करेगें। - शम्भु चौधरी

कठे से थे आया रे, कठे थे जाओ रे,
एक बार देखने म्हाने भी आओ रे।
शेखावटी री हेल्यां, जोधपुर री छांव रे,
जयपुर री माया, बालू री टींला पर,
पानी भी न पायो रे।
कठे से थे आया रे, कठे थे जाओ रे,
एक बार देखने म्हाने भी आओ रे।
केरीयों रे खेत, सांगरी बचाओ रे,
फाँफरो रे देश, बाजरो भी रोयो रे,
थे तो म्हाने भूल गया,
म्हैं कईयाँ भूलाँ रे।
कठे से आया रे, कठे थे जाओ रे,
एक बार देखने म्हाने भी आओ रे।
रूँधती आवाज सूँ, आँसू कोनी गिरा,
वेश भुलाय, देस भुलाय,
भाषा कईंयाँ भुलाय रे...
थे तो म्हानै भूल गया
म्हैं कईयाँ भूलाँ रे
आपणो छोड़ थे,
परदेश कईयाँ बसायो रे,
छोड़-छोड़-छोड़ - एक दिन आओ रे।
कठे से थे आया रे, कठे थे जाओ रे,
एक बार देखने म्हाने भी आओ रे।

-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

अंधेरे में.......

इंसान बना एक दिन
खोज रहा था मैं -
अंधेरे में....
भटकती हुई गुफाओं में,
गुंजती हुई हवाओं में,
समुद्री तुफानों में,
मन्दिर-मस्जिद, गुरुद्वारों में
गिरजा, वीणा-सितारों में
तबला, ढोल-नगाड़ों में
संसद के गलियारो में
कानून के पहरेदारों में
सत्ता के हिस्सेदारों में
इंसान बना एक दिन
खोज रहा था इंसान।
अंधेरे में....
[प्रकाशित - दैनिक विश्वमित्र : 13 जनवरी 2000]
-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

श्रद्धांजलि

अन्तिमयात्रा के विदाई समारोह में,
भावभीनी श्रद्धांजलि।
बीती बातों को याद कर,
श्मशान घाट पर सब
एक-दूसरे को सुना-बता।
कितना गहरा संबंध ?
सबके सब आत्मप्रसंसा में लगे,
कोई अपनी तो कोई उनकी,
कुछ देर में लकड़ियां जलकर,
राख का ढेर हो चुकी थी
अवशेष के नाम पर बचा था-
मांस का एक लोथड़ा,
कुछ यादें, कुछ बातें,
हाथ जोड़ - सहज ही लोट जाना
सबको अच्छा लगता है।
पंचतत्व में विलिन
आग की लपटों से लिपटा
एक पूरा शरीर -
जिसे कल तक खुद पर गुमान था,
आज चुपचाप पड़ा था
सच! बड़ा दुर्लभ होता है।
दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं
सांत्वना के शब्द
स्मृति पटल से खोज दे देते हैं
विदाई....
भावभीनी श्रद्धांजलि।


-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

बन्धन

किताबों के पन्नों में,

धागे के बंधन में,
सहारा सिर्फ इतना सा,
भावना का, विचारों का,
रिश्ते जुड़ते हैं, टूटते हैं,
बनते और बिगड़ते हैं;
टूटता है दिल अपना
कुछ खुद टूटते हैं,
कुछ तोड़ दिये जाते हैं,
मैं तो दोषी सिर्फ इतना ही,
शब्दों को तोड़ता नहीं
जोड़ता हूँ।
-शम्भु चौधरी

शनिवार, 7 जून 2008

हाँ! मैं आधुनिक इंसान हूँ।

हाँ! मैं आधुनिक इंसान हूँ।
आधुनिक जो हो गया हूँ;
वन को काट कर,
जल को गंदा कर,
पर्यावरण को प्रदुषित कर,
वातावरण को दुषित कर
हाँ! मैं आधुनिक इंसान हूँ।

रिस्ते को तौड़कर,
अपने-पराये को भूल,
सुख-दुःख को त्याग,
अपने और सिर्फ अपने ही
स्वार्थ में खोया हुआ हूँ।
हाँ! मैं आधुनिक इंसान हूँ।

करता हूँ मानवता की बात,
निद्वंद्व बन,
खा जाता हूँ वेजुबानों को
और जपता ....
मानव.. मानव,
हाँ! मैं आधुनिक इंसान हूँ।

निर्दोषों की हत्या करता,
दोषी को पनाह देता हूँ,
मेरा नाम है "मानवाधिकार"
इसलिये मानवता के नाम पर
मानवता की हत्या करता हूँ।
हाँ! मैं आधुनिक इंसान हूँ।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

निर्निड़

माँग रहा रोटी टूकडा़, करके अनशन आज।
कई दिनों से भूखा-प्यासा,
भटक रहा तेरे दर पर
पग-पग, डग-डग को सेहजा,
दाने-दाने -- चुग-चुग कर
बचपन को पाला-पोसा।
खुद भूखा रह भूख मिटाई थी
आज बडा़ हो, बड़ा निष्ठुर हो चुका
कितनी आस लगाई थी।
घर में रोटी-पानी होगी
आंगन में धूप सुहानी होगी,
बच्चों से चहकेगा आंगन,
मन में कई कहानी होगी।
पर तरस गया....
टुकड़े-टुकड़े को,
भूखा-प्यासा, तिल-तिल को,
आँखें धंस गई, आंत अकड़ गई,
गाल दुबक गये,
पाँव कांप गये,
कम्बल, चादर, पलंग चटक गये,
सूख गये आँसू नाद।
अपने घर हुआ निर्निड़;
माँग रहा रोटी टुकड़ा, करके अनशन आज।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106