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शनिवार, 8 मार्च 2008

होली के रंग अनेक होली तो हो ली भाई! - शम्भु चौधरी

होली की बात हो और ब्रज का नाम ना आए, ऐसा तो हो ही नही सकता। होली शुरु होते ही सबसे पहले तो ब्रज रंगों मे डूब जाता है। सबसे ज्यादा मशहूर है बरसाना की लट्ठमार होली। बरसाना, भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय राधा का जन्मस्थान। उत्तरप्रदेश में मथुरा के पास बरसाना मे होली की धूम, होली के कुछ दिनो पहले ही शुरु हो जाती है और हो भी क्यों ना, यहाँ राधा रानी जो पली बढी थी। दो सप्ताह तक चलने वाली इस होली का माहौल बहुत मस्ती भरा होता है। एक बात और यहाँ पर रंग और गुलाल जो प्रयोग किया जाता है वो प्राकृतिक होतें है। आजकल कुछ लोभी व्यापारी के चलते इसमें मिलावट भई देखने को मिलती है। इस होली को देखने के लिये देश विदेश से हजारो सैलानी बरसाना पहुँचते है।


नैनीताल की संस्कृति: बरसाने की होली के बाद अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए कुमाऊंनी होली को याद किया जाता है। नैनीताल में परम्परागत कुमाँऊनी संस्कृति बनी हुई है। क्योंकि नन्दा देवी मन्दिर की उपस्थिति से इसका धार्मिक महत्व है। यहाँ पर होली के गीत होली त्यौहार के अवसर पर गाये जाते हैं। होली के गीतों को मुख्य रुप से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- खड़ी होली, बैठकी होली तथा महिला होली। फूलों के रंगों और संगीत की तानों का ये अनोखा संगम देखने लायक होता है। शाम ढलते ही कुमाऊं के घर घर में बैठक होली की सुरीली महफिलें जमने लगती है। बैठक होली घर की बैठक में राग रागनियों के इर्द गिर्द हारमोनियम तबले पर गाई जाती है।


".....रंग डारी दियो हो अलबेलिन में.........गए रामाचंद्रन रंग लेने को गए..........गए लछमन रंग लेने को गए............रंग डारी दियो हो सीतादेहिमें..........रंग डारी दियो हो बहुरानिन में...."
यहां की बैठ होली में नजीर जैसे मशहूर उर्दू शायरों का कलाम भी प्रमुखता से देखने को मिलता है।


"....जब फागुन रंग झमकते हों.........तब देख बहारें होली की..........घुंघरू के तार खनकते हों.........तब देख बहारें होली की......"


बैठकी होली में जब रंग छाने लगता है तो बारी बारी से हर कोई छोड़ी गई तान उठाता है और अगर साथ में भांग का रस भी छाया तो ये सिलसिला कभी कभी आधी रात तक तो कभी सुबह की पहली किरण फूटने तक चलता रहता है। होली की ये रिवायत महज़ महफिल नहीं है बल्कि एक संस्कार भी है। बैठ होली की पुरूष महफिलों में जहां ठुमरी और खमाज गाये जाते हैं वहीं अलग से महिलाओं की महफिलें भी जमती हैं। इनमें उनका नृत्य संगीत तो होता ही है, वे स्वांग भी रचती हैं और हास्य की फुहारों, हंसी के ठहाकों और सुर लहरियों के साथ संस्कृति की इस विशिष्टता में नए रोचक और दिलकश रंग भरे जाते हैं। इनके ज्यादातर गीत देवर भाभी के हंसी मज़ाक से जुड़े रहते हैं जैसे... फागुन में बुढवा देवर लागे.......
बनारस में तो रंग और अबीर की दर्जनों दुकानों को देखकर लोग यह गीत भी गाते हैं

भाई का पे डालूँ अबीर!:

"संउसे सहरिया रंग से भरी,

केकरा माथे ढ़ारूँ अबीर,

हो केकरा माथे ढ़ारूँ अबीर?"


कई प्रदेशों में होली को फगुआ भी कहा जाता है. फगुआ मतलब फागुन, होली। इस वेला में आम के पेड़ों में मंजर निकल आतें है। खेतों में गेहूँ की बालियाँ हवाओं के साथ अठखेलियाँ करने लगती है। सरसों के फूलों से लदे खेतों की छंटा ही कुछ निराली हो उठती है, आलू खेतों से निकल कर बाजारों में जाने लगते हैं। जिस तरह हम दिवाली के समय अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, यह वक्त किसानों के घरों में खुशियाली के साथ- साथ साफ- सफाई का समय भी होता है।
इस अवसर पर गाये जाने वाले लोकगीतों में देवी-देवताओं का जितना महत्व तो होता ही है, प्रकृति का भी काफी महत्वपूर्ण स्थान रहता है।
एक लोकगीत को देखें:


राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए॥ राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए॥ इन्द्रलोक से इन्द्र जी आए, घटा उठे घनघोर, बूँद बरसत आए... राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए.. राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए.. ब्रह्मलोक से ब्रह्मा आए,पोथियां लिए हाथ, वेद बांचत आए... राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए.. राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए.. शिवलोक से शिवजी आए , गौरा लिए साथ, भांग घोटत आए.. राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए.. राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए.. वृन्दावन से कान्हा आए राधा लिए साथ। राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए.. राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..


असम में इस समय ढोल की थाप और बांस की बांसुरी की आवाज से सारा का सारा असम गुंजायमान हो जाता है। जगह-जगह ढोल और बांसुरी की थाप व तान पर लोगों को डांस करते देखें जा सकतें हँ। असमी नववर्ष यानी बोहाग बिहू नामक इस त्यौहार का लोग हर साल बेसब्री से इंतजार करते हैं। हांलाकि बिहू असम का जातीय त्योहार है।
फिर भी इसकी तुलना बसन्तोत्सव से की जा सकती है। बिहू के लोकगीतों में प्रेम, ऋगांर, प्रकृति, सम्मान एवं आध्यात्मिक भावों से परिपूर्ण गीत-श्लोकों से असम की धरती मानों प्रकृति प्रदत भाव गीतों के रूप में स्वयं प्रस्फुटित हो गई हो।


मारवाड़ी:
होली मनाने का अंदाज भी कुछ निराला सा


एक बने रंग ऎसा,

जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,

हरा नहीं हो यार।

इसका रंग कुछ ऎसा हो,

जो तन को नहीं - मन को छू सके। -शम्भु चौधरी



इस अवसर पर हिन्दू धार्मिक परम्परा के अनुसार होलिका दहन की परंपरा रही है, राजस्थानी और प्रवासी राजस्थानी ( मारवाड़ी) के घरों में दस दिनों पहले से ही इस होलिका दहन की तैयारी शुरू हो जाती है, घर-घर में बड्डकुल्ला ( गोबर के होला-होली,चान्द-सितारा, चकला-बेलन, पान-सुपारी, ढाल-तलवार आदि) बनाये जाते हैं, सुख जाने के बाद इनकी रोली, अबीर, गुलाल आदि रंगों से सजाया जाता है, होलिका दहन के दिन ठीक समय में सभी घरों में प्रायः एक ही वक्त पर पूरे परिवार के साथ पूजा की जाती है, बच्चे अपने माता-पिता, दादा-दादी , बड़ों से चरण छूकर आशिर्वाद ग्रहण करते हैं। घर के सभी लोग खाशकर नवनवेली दुल्हन एक सार्वजनिक स्थान पर जहाँ समाज की तरफ से होलिका दहन का स्थान तय किया जाता है, उस स्थान में जाकर इन पूजे गये बड़कुल्लें को जो कि कई मालाओं में पिरोये रहते हैं को प्रज्वलित होलिका स्तल में अग्नि के हवाले कर दिया जाता है। इस दिन हर राजस्थानी परिवारों में होली के पकवान भी बनाये जाते हैं, जो दूसरे दिन छारंडी तक चलते हैं। होली की बात हो तो बिहार- यू.पी. की कादो- कीचड़ और कपड़ा फाड़ होली की बात न हो तो होली की बात ही नहीं पूरी होती। परन्तु सबसे डर इस बात से लगता है जब भी होली आने का समय होता है तो ट्रेन से गुजरने वाले यात्रियों की तो शामत ही आ जाती है। बच्चे खेत और खलियानों से कादो के मोटे-मोटे ढेले बना-बना कर सामने से गुजरती ट्रेनों पर फेंकने लगते हैं हालांकि बच्चे इसे मनोरजन का माध्यम समझते हैं परन्तु कई बार इससे चोट भी लग जाती है। इसे हम होली कह लें या होली के नाम पर कुछ शरारत जो भी कह लें हमें इस समय सावधान होकर ही सफर करना पड़ता है। अरे भाई सिर्फ गांव के लोग ही इसके लिये दोषी नहीं अब देखिये कोलकाता शहर की ही बात लें यहाँ तो सभी पढ़े-लिखे लोग रहतें हैं। कोलकाता शहर के बड़ाबाजार का हाल कुछ इससे भी बुरा होता है। बड़े-बड़े भवन की छतों से पता नहीं कब आपके सर पर रंग भरा पानी का गुब्बारा आ टपकेगा , किसी को पता नहीं। भाई ये तो रंग खेलने का अलग- अलग अंदाज है। बस मजा आपको लेना है। मारवाड़ी समाज में होली खेलने का अंदाज भी बड़ा निराला है, बिहार के एक शहर कटिहार की ही बात लें , तो वहाँ दस - पंद्रह रोज पहले से ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है, होलिका दहन के दिन अलग टोली स्वांग भर कर एक जुलूस के रूप में महात्मा गांधी रोड से निकल कर बड़ाबाजार तक जाती है। इस जुलूस को देखने के लिये भीड़ उमड़ पड़ती है, वहीं मुजफ्फरपुर में छारण्डी के बाद समाज के सभी लोग नया कुर्ता-पेजामा पहन कर अबीर की थैली हाथ में लिये चतुर्भुज स्थान में स्थित शिव मंदिर जाते हैं। आपको जानकर यह सुखद आश्चर्य भी हो सकता है कि यह स्थान शहर का लालबत्ती ईलाका माना जाता है, परन्तु इस दिन इस इलाके की सभी महिलायें समाजिक वातावरण के रूप में देखी जा सकती है। शायद यही कारण है कि इस दिन सपरिवार सभी लोग सज-धज के जा पाते हैं। बिहार की होली देखने के लिये, यहाँ ‘कपड़ा फाड़ मस्ती’ देखने वालों की भीड़ जुटती है और तब शरमाती हुई पत्नी को अपने पति के जो रूप का दर्शन होता है उसका एक अलग ही अंदाज होता है, जब किसी कोने में छुपकर वो यह देखती होगी।


जयपुर में होली के अवसर पर पारंपरिक तमाशा अब भी होता है लेकिन ढाई सौ साल पुरानी इस विधा को देखने के लिए अब उतने दर्शक नहीं आते जितने पहले आते थे। होली के समय पास आते ही तमाशे की श्क्ल में किसी नुक्कड़ नाटक की शैली में मंच सज्जा के साथ कलाकार आते हैं और अपने पारंपरिक हुनर का प्रदर्शन करते हैं। तमाशा की विषय वस्तु पौराणिक कहानियों और चरित्रों के इर्दगिर्द तो घूमती ही है लेकिन इन चरित्रों के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी चुटकी ली जाती है। तमाशा शैली के वयोवृद्ध कलाकार गोपी जी मल तो इस बात से ही ख़ुश हैं कि उनकी यह विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी अभी चली आ रही है। तमाशा एक ऐसी विधा है जिसमें शास्त्रीय संगीत, अभिनय और नृत्य सभी कुछ होता है। तमाशा सम-सामयिक राजनीति पर टिप्पणी करता है। आमतौर पर तमाशा हीर-राँझा और पौराणिक पात्रों के ज़रिए अपना बात कहता है। इसमें राग जौनपुरी और दरबारी जैसे शास्त्रीय गायन शैलियों को भी शामिल किया जाता है।


बंगाल : कहा जाता है कि बंगाल जो आज सोचता है, वो बाक़ी देश कल सोचता है. कम से कम एक त्यौहार होली के मामले में भी यही कहावत चरितार्थ होती है.
यहाँ देश के बाक़ी हिस्सों के मुक़ाबले, एक दिन पहले ही होली मना ली जाती है। राज्य में इस त्यौहार को “दोल उत्सव” के नाम से जाना जाता है। इस दिन महिलाएँ लाल किनारी वाली सफ़ेद साड़ी पहन कर शंख बजाते हुए राधा-कृष्ण की पूजा करती हैं और प्रभात-फेरी (सुबह निकलने वाला जुलूस) का आयोजन करती हैं। इसमें गाजे-बाजे के साथ, कीर्तन और गीत गाए जाते हैं। दोल शब्द का मतलब झूला होता है. झूले पर राधा-कृष्ण की मूर्ति रख कर महिलाएँ भक्ति गीत गाती हैं और उनकी पूजा करती हैं। इस दिन अबीर और रंगों से होली खेली जाती है, हालांकि समय के साथ यहाँ होली मनाने का तरीक़ा भी बदला है। शांतिनिकेतन की होली का ज़िक्र किये बिना दोल उत्सव अधूरा ही रह जाएगा। काविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वर्षों पहले वहाँ बसंत उत्सव की जो परंपरा शुरू की थी, विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में छात्र और छात्राएँ आज भी पारंपरिक तरीक़े से होली मनाती हैं। लड़कियाँ लाल किनारी वाली पीली साड़ी में होती हैं. और लड़के धोती और अंगवस्त्र जैसा कुर्ता पहनते हैं। वहाँ इस आयोजन को देखने के लिए बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों तक से भी भारी भीड़ उमड़ती है।
होली का नाम आते ही वह बचपन के दिन आँखों के सामने आ खड़े होते हैं। क्या दिन थे, क्या ज़माना था और क्या उत्साह था होली खेलने का। सुबह-सवेरे ही घर से निकल कर, हम बच्चों की टोलियाँ घर-घर जातीं और दोपहर तक रंगों में सराबोर हो कर अपने घरों की राह लेतीं। चेहरे इतने पुते हुए होते कि कई बार तो माएँ मुँह धुलाने के बाद ही जान पातीं कि यह किसी और का बच्चा है। होली के दिन रंगो में रंग जाना और हंगामा मचा देना, ये ख़ूबसूरत यादें हैं। "जी चाहता है एक बार फिर सब इक्ठ्ठा हों। अब भी वही मोहब्बत है, वही प्यार है। वही समां फिर से बना लें तो क्या रंग जमेगा सचमुच."
‘जो जीए सो खेले फाग’ यानी होली को ज़िंदादिली का त्योहार कहा जाता है। जब मैं ढोल, मृदंग, मजीरा बजाते लोगों को मस्ती में नाचते गाते और ‘बुरा न मानो होली है’ के नुस्ख़े से तनाव मुक्त होते देख, मानो ऎसा लगता है कि भारत के ये अलग-अलग रंग जब एक साथ मिल-जुल कर गाते -नाचते हैं तो दुनिया यह देख कर ही दंग हो जाती होगी कि आखिर ऎसी भी क्या खास बात है इस धरती में कि सारा का सारा देश एक ही दिन में बदल जाता है हर तरफ रंगों की बरसात है।
होली में भांग की बात न हो तो होली का कोई महत्व ही नहीं रह जाता, कहा जाता है होली और भांग का चौली-दामन का साथ है। होली कए समय तो की बार ऎसा लगत है कि कुएँ में ही भांग पड़ गई हो , जिधर देखो उधर ही कुछ न कुछ उलट-पुलट है, जिसे कल तक आपने नाचते नहीं देखा हो उसे यदि नाचते -कपड़ा फाड़ते देख लें तो अपको ऎसा लगेगा कि क्या यह वही लोग है ? हाँ कुछ ऎसा ही हो जाता है, य़दि इस कभी आपके सामने भी या आपके साथ भी हो तो यह मौका हाथ से जाने नहीं दिजीयेगा, पता नहीं यह जीवन फिर कब मिले।


होली की बात हो और अमीर ख़ुसरो न हो तो होली का कोई अर्थ ही नही रह जाता। अमीर खुसरो को कैसे भुला जा सकता है। फाग पर जितने गीत और चौपाईयाँ इनके द्वारा लिखे गये हैं वे आज भी होली के अवसर पर गाये- बजाये जाते हैं, एक प्रकार से इनके गीत लोकगीत बन चुके हैं।


दैया री मोहे भिजोया री

शाह निजाम के रंग में

कपडे रंग के कुछ न होत है,

या रंग मैंने मन को डुबोया री

दैया री मोहे भिजोया री



विभीन्न स्त्रोतों से संकलित लेख - शम्भु चौधरी

जी! राज ठाकरे जी! ये है बिहार

आज का समाचार पढ़कर मन गदगद हो गया। मन किया नीतीश जी को जाकर चुम लूँ।

समाचार में लिखा था " बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोगों से एक-दूसरे पर हावी होने की बजाए उनकी भावनाओं की कद्र करने का आह्वान किया है। कहा कि महाराष्ट्र समेत देश के कई राज्यों में बिहारियों के साथ दुर्व्यवहार किये जाने को लेकर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इससे लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर अवसर इस चुनौती को एक अवसर के रूप में बदलने को कहा। उन्होंने कहा कि हमें बिहार को एक ऎसा राज्य बनाना है कि जिसमें अन्य राज्यों के लोग रोजगार के लिये यहां आयें। साथ ही उन्होंने उन लोगों को अपने शैली से करारा चांटा भी मारा जो बिहार के मजदूर को काम करने की मशीन भर समाझते हैं। यह बात सही है कि बिहार के लोग गरीबी और अभाव के शिकार हैं लेकिन ये समाज न तो बेईमान है और न ही किसी के रहमो करम पर रहते हैं। यह समाज अपने महेनत और परिश्रम के बल पर देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी अलग पहचान कायम की है। बिहार की ताकत उसका मानव संसाधन है और अस्के बलबूते ही बिहार के निर्माण की कल्पना की जा सकती है।" - शम्भु चौधरी

बुधवार, 5 मार्च 2008

लघु कथा: नहीं.............................

सूरज को आज न जाने क्या हो गया, सुबह से ही कुछ परेशान सा दिख रहा था।
कल रात की कलह को लेकर मस्तिष्क में तूफ़ान सा मचा हुआ था।
छोटी-मोटी बातें तो रोज ही होती रहती थी।
आज ऎसी क्या बात थी जो सूरज को सोचने के लिये मजबूर कर रही थी।
सूरज की शादी हुये चार साल हो गये थे, सीमा एक माह बाद ही मायके से लोटी थी।
सूरज को दो बच्चे सोनू तीन साल का हो गया था। छोटी लड़की अभी गोद में ही थी।
तीन माह ही तो हुये थे उसको, सीमा का पहला जापा ( प्रसूति) घर में ही हुआ था।
इस बार सीमा चाहती थी कि उसका दूसरा बच्चा पीहर में ही हो,
जहाँ घर के पास ही एक मारवाड़ी अस्पताल है,
जहाँ आसानी से अपने होने वाले बच्चे को जन्म भी दे सकेगी।
बस इतनी सी ही बात थी जो कल के कलह का मूल कारण था।
माँ को यह बात नागवार गुजरा।
जैसे ही सीमा ने घर में कदम क्या रखा, माँ ने तो मानो स्वांग ही भर लिया हो।
"मांगने से भीख भी नहीं मिलती"
बड़ा आया है - "भीख माँग लूँगा - भीख माँग लूगा!
पढ़ा-लिखा के इसलिए तुझे बड़ा किया था?
""काम-धाम तो रहा नहीं।"
दो-दो बच्चे पैदा कर लिये।
पाल नहीं सकते तो, किसने कहा था बच्चे पैदा करने के लिये।
न घर की इज्जत, ना गाँव का ख्याल,
मान- मर्यादा को ताख पर रख दिया।
थोड़ा तो अपने खानदान की इज्जत रख ली होती।
बस बहु क्या आ गयी, ससुराल का हो गया।
मैं तो जलती लकड़ी हूँ!
कब बुझ जाऊँगी, पता नहीं!
सीमा के घर में प्रवेश करते ही मानो,
तीन महिने का गुस्सा फूट परा हो।
कल तो माँ ने तूफान ही मचा दिया था।
सूरज को लगा कि अब इस घर में ओर बर्दास्त नहीं हो सकेगा।
बहुत हो गया.... यह सब।
बस काम मिलते ही घर छोड़कर चला जायेगा।
रात को सीमा ने भी कसम ही खा ली थी, कि
अब या तो तुम भी साथ चलो, नहीं तो वह इस घर में नहीं रहेगी।
बहुत दिन हो गये माँ की सुनते-सुनते।
सीमा रात भर रो-रोकर कभी मुझे, तो कभी माँ को कोसती रही।
बहुत समझाने की चेष्टा कर ली।
परन्तु सीमा ने तय कर लिया था कि
कल फैसला कर ही लेना है।
दोनों तरफ से समझौते की संभावना नहीं नज़र आ रही थी।
यह द्वंद्व मुझे पशोपेश में डाल दिया था।
घर में माँ एकेली कैसे रहेगी?
सीमा अब घर में किसी भी हालात मै रहने को तैयार नहीं थी।
यह सब सोचते-सोचते घर से बाहर निकल..... रेल की पटरियों के बीच चलने लगा
दिमाग पूरी तरह से खोखला हो चुका था।
काम कि तलाश, घर की इज्जत, माँ की देखभाल,
बच्चे का ख्याल, सीमा की बात, माँ के ताने,
गाँव की मर्यादा, सबकुछ एक साथ अपना हक माँगने के लिये खड़े थे।
एक की बात सुनूँ तो दूसरे का अपमान,
किसकी मानूँ,
रेल की पट्रियों से आती आवाज ने रफ्फ्तार ले ली थी,
सूरज को पता था कि अब कुछ ही पलकों में इन पटरियों के ऊपर से ट्रेन गुजरने वाली है।
सूरज को यह भी पता था कि उसे इन पटरियों से नीचे दूर हटना ही होगा।
सूरज चाहता भी नहीं था कि उसे कमजोर होकर लड़ना है।
आत्महत्या का जरा भी विचार मन में नहीं था।
वह यह भी जानता था कि यह कार्य कमजोर मानसिकता का जन्म है,
या फिर मानसिक अस्वस्थता के लक्षण।
वह जीवन से हताश नहीं था,
परेशान जरूर हो चुका था, लेकिन इतना भी नहीं कि उसे जीवन के इतने करीब ला खड़ा कर दे।
ट्रेन की रफ्तार काफी नजदीक आ चुकी थी,
सूरज बस अब हटने की सोच ही चुका था।
एक तेज आवाज बस कान को सुनाई दी।
नहीं..................ट्रेन की पटरियों पर लोगों की हुजूम लग गया था।
ट्रेन रूक चुकी थी।
भीड़ से एक ने सूरज को पहचानते हुये....
चिल्ला पड़ा .... अरे ये तो सूरज है। - शम्भु चौधरी 6th March'2008

मंगलवार, 4 मार्च 2008

होली के रंग

एक बने रंग ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो तन को नहीं - मन को छू सके।
एक बने रंग ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो राज्य-राज्य की बात न कर
करे राष्ट्र की बात।
एक बने रंग ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो जात -पात का भेद भुला कर
करे प्रेम की बात।
पर देखो इस देश को लग गई
किस मनहूस की हाय।
ये मेरा महाराष्ट्र, तो ये मेरा बंगाल,
ये मेरा गुजरात, तो ये मेरा पंजाब,
ये मेरा बिहार, तो ये मेरा असम,
कोई नहीं कहता यारों
भारत! ये मेरा देश बने महान
आओ हम सब मिलकर बनायें
एक नया और रंग
जिसमें दिखे भारत का
साथ-साथ सातों रंग।
शम्भु चौधरी, कोलकाता - 700106

सोमवार, 3 मार्च 2008

क्या मेरी सोच गलत थी, ठाकरेजी?

इस लेख के लेखक श्री रामनिरंजन गोयनका असम के गुवाहाटी शहर से हैं. आपके कई लेख "समाज विकास: मासिक पत्रिका में छप चुकें है़ यह लेख इनके अबतक के सर्वोत्तम लेखों में से एक है। इस लेख के लिये श्री गोयनका जी को मेरी बधाई!- शम्भु चौधरी
http://samajvikas.in/article.html

इस महान भारत का एकमात्र बिहारी समाज ही राष्ट्र के प्रति स्वाभिमानी समाज है, जो गर्व से अपना परिचय ‘‘हिन्दुस्तानी’’ के रूप में देता है, बाकी तो हम सब राजस्थानी, असमिया, बंगाली, पंजाबी, मदरासी, गुजराती आदि आदि हैं। इस महान भारत राष्ट्र में एक मात्र प्रदेश है जिस प्रदेश के नाम के साथ ‘‘राष्ट्र’’ शब्द जुड़ा है वह भी ऐसा वैसा नहीं, वह नाम है ‘‘महाराष्ट्र’’। महान भारत राष्ट्र का एक महान अंगराज्य महाराष्ट्र, अर्थात छत्रपति शिवाजी महाराज की तपोभूमी महाराष्ट्र, जिस महान राष्ट्रसेवक ने अखण्ड भारत की कल्पना की थी और अनेक विपरीत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मुगलों से लोहा लिया था-इसका इतिहास साक्षी है। सारे राष्ट्र को शिवाजी का स्वदेश प्रेम और जीजाबाई की वीरव्रती संतान की राष्ट्र समर्पित वीरता पर गर्व है।
इस महान भारत राष्ट्र में, इसके विभिन्न प्रान्तों भाषाई प्रदेशों मे अनेक समाज सेवी संगठन, युवा संगठन तथा जातीय संगठन गठित हुये हैं-उनके नाम गोत्र तथा उद्देश्यों और कार्यों में उसकी क्षेत्रीयता की झलक हमें देखने को मिलती है जो अधिकतर एक सीमा में, एक परीधि में बंधे हुये कार्य करते हैं-परन्तु क्षेत्रवाद की संकरी गली से ऊपर उठकर प्रखर राष्ट्रवाद के निर्माण के लिये इस महान भारतराष्ट्र में महाराष्ट्र ही एक ऐसा प्रदेश है जिसके वीर सपूतों ने सन् 1925 में महाराष्ट्र के ही प्राचीन नगर नागपुर में सर्वप्रथम एक नये युवा संगठन का गठन कर राष्ट्रीयता की अलख जगाई थी और उस युवा संगठन का नाम रखा गया था ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’’ और उस युवा संगठन के प्रणेता थे मराठा देशभक्त डॉ. केशव बलिराम हेडगवार। हेडगेवारजी ने उस संगठन का नाम जातीयवाद पर नहीं रखा जैसा कि आज यह यत्र-यत्र देख रहे हैं। हमारा मानना है कि प्रखर राष्ट्रवाद के कवच में ही जातिवाद की रक्षा हो सकती है। तो राष्ट्रवाद के माध्यम से पूरे भारत राष्ट्र को जोड़ना था। यही था महान उद्देश्य परमपूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के सहयोगियों तथा निष्ठावान समर्पित देशभक्त मराठा प्रचारकों में परम पूजनीय माधव सदाशिव गोलवलकर जिन्हें हम गुरुजी के नाम से अधिक जानते हैं-दूसरे सरसंघचालक बने। इसके अतिरिक्त माननीय एकनाथजी रानाडे (महाराष्ट्रीय न थे) जिन्होंने भारत महासागर के बीच विवेकानन्द शिला पर प्रथम विवेकानन्द स्मारक की स्थापना की जिसके केन्द्र गुवाहाटी समेत सब सम्पूर्ण भारत में स्थापित हो गये हैं। ये एकनाथजी रानाडे ही सर्वप्रथम असम में संघ के स्थापनार्थ गुवाहाटी पधारे थे। उस समय मैं युवा था हमलोगों में स्व. केशवदेवजी बावरी, स्व. कामाख्यारामजी बरुवा, स्व. भास्करजी शर्मा, नगांव के स्व. राधिका मोहन गोस्वामी, स्व. गणपतरायजी धानुका, स्व. केदारमलजी ब्राह्मण ने उनका स्वागत किया तथा नीति के अनुसार उन्हें कामाख्यरामजी बरुवा के घर पर रहने की व्यवस्था हुयी। सबसे पहले संघ की स्थापना शाखा उजान बाजार जोरपुखुरीपार के स्व. केशवकान्त बरुवा के बंगले के अहाते में प्रथम शाखा लगी। उस समय हमें ध्वज नहीं मिलता प्रारम्भ में यू हीं पंक्तिबद्ध खेड़े होकर ‘नमस्ते सदावत्सले मातृभूमे’ प्रार्थना होती थी कुछ देरी बाद ही ध्वज मिलने का नियम था।
इस प्रकार सम्पूर्ण भारत में फैल चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की असम के गुवाहाटी नगर में स्थापना हुयी। उसके बाद जो प्रचारक आये अधिकांश महाराष्ट्रीयन (मराठे) ही थे। सबसे पहले प्रचारक गुवाहाटी आये थे माननीय दादाराव परमार्थ जिन्हें हम मान से दादाजी कहते थे। जैसे पूज्य मूलकरजी, पूज्य श्री कृष्ण परांजपे, पूज्य सहश्रभोजनेजी, पूज्य श्री कान्त जोशी, श्री दत्तात्रेय बन्दिष्ठेजी, ठाकुर रामसिंहजी, मधुकरजी लिमये और कृष्ण भगवन्त मतलगजी तथा अनेकों के नाम अब याद नहीं आते। उसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आज सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया है-सम्पूर्ण भारत को राष्ट्रीय भावना-‘‘महामंगले पुण्य भूमे त्वदर्थे पतत्वे सकायो’’ का पाठ पढ़ाया एक मराठे संत के’ाव बलिराम हेडगेवार ने त्वदीयाय कार्याय वद्धा कटीग्राम, अर्थात हे भारत मां तेरे ही कार्यों के लिये हमने कमर कसली है-ऐसा उदघोष संघ की प्रार्थना में किया था। और उस संघ में तपे हुये एक से एक निष्ठावान कार्यकत्ता निकले जिनके प्रयास से कई राष्ट्रीय संगठन-विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, वनबन्धु परिषद, एकल विद्यालय अभियान, आदर्श विद्यालय विद्याभारती शिक्षा संस्थान अखिल भारतीय साहित्य परिषद, भारतीय इतिहास संकलन योजना आदि संस्थान राष्ट्र को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। मुझे सदैव गौरव होता है कि महाराष्ट्र के नागपुर के डॉ. हेडगेवार ने जो एक हृदय हो भारत जननी रूपी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बीज बोया था, वह अंकुरित, प्रस्फुटित, पल्लवित, पुषिपत होकर आज फलित हो रहा है-लोगों में राष्ट्रभाव का ‘‘पूर्वोदय’’ हुआ है-राष्ट्रीय एकता से ही भारत परम वैभव को प्राप्त हो सकता है यही विचार मैंने हमारे स्थानीय युवा संगठनों के नेताओं से समय समय पर बांटे हैं कि महाराष्ट्र के ही डॉ. हेडगेवार ने जातिवाद से ऊपर उठकर देश में राष्ट्रवाद की कल्पना की थी। हम बृहत्तर असम को राष्ट्रवाद के द्वारा ही असम की भाषिक जनगोष्ठियों को एक सूत्र में पिरो सकते हैं आदि आदि बातों के बीच में ही इन दिनों फिर जातिवाद के नाम पर ही उसी महाराष्ट्र की मुम्बई में जिसे भारत की आर्थिक तथा सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है-हम भारतवासियों को मुम्बई पर गर्व होता है। परन्तु आज वहाँ जो कुछ हो रहा है-वह हमारे पूर्वपुरूष महान देशभक्त डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, माननीय माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरूजी) के किये कराये पर कहीं पानी न फेर दे यही डर सता रहा है।
जहां एक ओर महाराष्ट्र के महान राष्ट्र सेवकों ने राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोकर अखण्ड भारत की कल्पना की थी वहां आज क्या वहीं वीर मराठे भाषा के आधार पर भारत राष्ट्र को तोड़ने का कार्य करेंगे। मैं आजकल यही सोचता रहता हूँ कि क्या मेरे मराठों के बारे में मेरी अब तक की सोच गलत थी।

शनिवार, 1 मार्च 2008

मारवाड़ी देस का न परदेस का भाग- 7 लेखक : शम्भु चौधरी


"मैं भी मारवाड़ी हूँ"
कई बार सोचता हूँ कि मारवाड़ी समाज में जन्म लेकर किसी ने कोई अपराध तो नहीं किया, तो कई बार गर्व भी होता है कि "मैं भी मारवाड़ी हूँ" स्व.भंवरमल जी सिंघी की पुस्तक "मारवाड़ी समाज: चुनौती और चिन्तन" के अन्तरावलोकन-1 को जब पढ़ता हूँ तो कुछ इस तरह कि बल्कि इससे भी बुरी स्थिति में समाज को आज भी मैं पाता हूँ। देखें स्व. सिंघीजी ने क्या कहा था। आपको यह बता देना चाहता हूँ कि मारवाड़ी समाज में सुधार की प्रक्रिया लागू कराने में स्व.सिंघी जी का नाम राजा राममोहन राय के समतुल्य तो नहीं लिखा जा सकता है। हाँ समझाने के लिये या इनके कार्य क्षेत्र को समझने के लिये राममोहन राय का उदाहरण दिया जा सकता है, जिससे पाठकों को इनके कद का अहसास हो सके। - "तीस वर्ष पूर्व जब मैं बी.ए. में पढ़ने के लिये जयपुर से बनारस आ कर हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रविष्ट हुआ, उस समय तक मारवाड़ी कहलाने वाले राजस्थानियों के सम्बन्ध में मेरी बहुत कम जानकारी थी। पर जानकारी बहुत थोड़ी होने पर भी उनके बारे में मेरे मन में बड़ी उपेक्षा और घृणा का संस्कार था। बनारस में पहले-पहल कतिपय सहपाठी छात्र मिले जो विश्वविद्यालय में राजस्थानी छात्र संघ के सदस्य तो थे पर जिनका निवास बंगाल, बिहार, मद्यप्रदेश आदि प्रान्तों में था। इनके साथ के संपर्क ने थोड़ी सान्त्वना तो दी कि मारवाड़ियों में भी शिक्षा का संस्कार है, परन्तु छुट्टियों में घर जाते-आते रेल की मुसाफिरी में बंगाल, असम और बिहार आदि से आते- जाते हुए जो मारवाड़ी परिवार देखे, उनके रहन-सहन के तौर- तरिकों से वह घृणा का संस्कार कायम ही रहा और मैं जितने अभिमान के साथ अपने को राजस्थानी कहता था, अतनी ही घृणा के साथ के साथ मारवाड़ी की निन्दा भी करता था।" [ "मारवाड़ी समाज: चुनौती और चिन्तन" के अन्तरावलोकन-1 पृष्ठ-5 ]
राजस्थान का यह प्रवासी समाज जिसे देश के सभी भागों में हम मारवाड़ी कौम के रूप में जानते हैं, इसमें व्यापारी वर्ग की बाहुलता हमें देखने को मिलती है, ऎसा नहीं है कि इस समाज में सभी वर्ग के लोग व्यापारी ही हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि आमतौर पर हमारे मानस में मारवाड़ी शब्द आते ही एक व्यापारी सेठ की छवी सामने उभर कर आ जाती है। मानो एक प्रकार से व्यापारी सेठ, मारवाड़ी शब्द का प्रायःवाची बन गया हो। कई बार टी.वी. सिरीयलों में इस तरह का चित्रण भी हमें देखने व कहानी-किस्सों में पढ़ने को मिल जातें हैं। इसके कारणों को काफी खोजने का प्रयास किया कि, वास्तव में जबकि इस समाज में ऎसी बात नहीं है तो यह छाप क्यों और कैसे लग गई? इसके लिये मुझे ज्याद दूर नहीं जाना पड़ा। पिछले एक दो-तीन दशक पुराने वातवरण से ही इस बात का हल खोजने का प्रयास करता हूँ। मुझे याद आता है जब इस समाज का कोई बच्चा पढ़-लिख लेता था तो वो अपने आपको या तो मारवाड़ी कौम से अलग मानता था, या फिर अपने नाम के साथ लगी टाइटील जैसे- बजाज, चौधरी, अग्रवाल, जालान आदि लिखना बन्द कर देता था। अब बात विमल जालान की ही लें कहने को हम यह कहते हैं कि ये मारवाड़ी है, परन्तु आप उनके विचार जानेगें तो दंग रह जायेगें जबकि इनके साथ के ही श्री मनमोहन सिंह भी हैं वे अपने आपको पंजाबी कहने में गर्व महसूस करते हैं वहीं श्री विमल जी को यह बात मानने में बड़ा संकोच होता है। भले ही वे आज राज्यसभा के सांसद हैं भारत के वित्त सचिव, रिजर्वबैंक के गवर्नर भी रह चुकें हों, कुछ दिनों IMF में भी कार्य कर चुके थे। कोई इनको पुछे कि इनको यह ओहदा दिलाने में किनकी देन थी? निश्चय ही इनके दादा स्व. इस्वरदास जालान की । जिन्हें बंगाल में मारवाड़ी समाज के निर्धारित विधानसभा सीट का उत्तराधिकारी बनाया गया था। और इस बात को भी स्वीकार कर लेना चाहिये कि वे भारत सरकार के सरकारी दफ़तर में अपनी पढ़ाई के साथ-साथ किसी न किसी रूप से अपने दादा की पैरवी का माध्यम निश्चित तौर पे लिया होगा। और यदि नहीं भी लिया हो तो क्या, इनके दादा की जीवनी का एक हिस्सा जिसे इससे पहले ही जारी किया था, उसमें वे लिखते हैं कि "हमलोगों की कपड़े की दुकान थी" अर्थात इनका परिवार एक व्यापारी तो था ही, मारवाड़ी कौम का भी था।
भले ही ये बात सही है कि इनको जाति सूचक शब्दों से नफरत है, यह अच्छी बात है, परन्तु जिस कौम में इनकी पैदाइस हुई हो, उस कौम के कार्यक्रमों में जाने में इनको हिचक होती हो तो, यह इनका दोष नहीं है, यह बात केवल इतनी सी ही है कि मारवाड़ी शब्द के पीछे लगा वह बदनुमा दाग कहीं न कहीं इनको भीतर ही भीतर कचोटता जरूर होगा। अगले लेख में इस बात की ओर गहराई तक जाने का प्रयास करूँगा।
नोटः इस लेख में किसी व्यक्ति विशेष को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं है, यह एक मानसिकता का प्रस्तुतिकरण सिर्फ है। समाज में श्री विमल जालान जी जैसे उदाहरण भरे पड़े हैं उन नामों में यह नाम चुनकर प्रस्तुत करने का उद्धेश्य मात्र पाठकों को आसानी से बात समझाई जा सके।
आपके विचार आने से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती है, अतः आपसभी से मेरा निवेदन है कि आप अपने विचारों से मुझे अवगत कराते रहें। - क्रमश: लेख जारी रहेगा । शम्भु चौधरी आज दिनांक: 1.03.2008, कोलकाता।

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

इस बहस में भाग लें: प्रन्तीयतावाद का जहर

महाराष्ट्र के राज ठाकरे व बाल ठाकरे का उत्तर भारतियों के प्रति विषपान एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषा दिवस की पूर्व संध्या पर भाषा चेतना समिति के एक कार्यक्रम में भाषण देते समय बंगाल के भूमि व भूमि सुधार मंत्री माननीय अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने ये वक्तव्य दिया है। इस बयान के प्रकाश में कई सवाल खड़े होते हैं। यह एक अलग विषय है कि श्री मोल्ला ने क्या कहा और क्या नहीं, हमारे राष्ट्र के समक्ष यह प्रश्न जरूर खड़ा हो गया कि इन राजनैतिक नेताओं के इस जहर का सामना हमें किस तरह करना होगा
एक समय था जब इन प्रन्तों से राष्ट्रवाद की मशाल जलायी जाती थी। आज इन प्रान्तों के राज नेताओं का इतना पतन हो चुका है कि ये क्या कह रहें हैं और इनको क्या कहना चाहिये इसमें इनका स्वार्थ कितना छुपा है। यह कोई नहीं जानता, शायद भगवान भी नहीं? इस बहस में पक्ष और विपक्ष दोनों विचार आप दें सकतें हैं बस आपको अपनी भाषा पर नियत्रण रखना जरूरी होगा। आपकी इस बहस को समाज विकास के अगले अंक में प्रकाशित की जायेगी। कृपया अपना पता जरूर लिखें ताकि आपको यह अंक डाक द्वारा भेजी जा सके।
आप अपनी प्रतिक्रिया डाक द्वारा भी हमें भेज सकतें हैं। हमारा पता है:
- शम्भु चौधरी, सहयोगी संपादक , समाज विकास, 152बी, महात्मा गांधी रोड, कोलकाता - 700007
email : samajvikas@gmail.com
भूमि सुधार मंत्री श्री अब्दूल रज्जाक मोल्ला की कथित टिप्पणी:
‘‘जारा मारवाड़ी, तारा सब किछु पोयसा दिए मैनेज कोरे निच्चे, ऐरा मैनेज मास्टर। बांगालीरा किछु कोरते पारचे ना।
ओरा कोनो काज कोरते गेले 10 परसेंट मनी रेखे दाय। पोयसा दिए जे कोनो काज कोरिये नाय।
अर्थात
जो मारवाड़ी हैं, वो सब कुछ पैसे देकर मैनेज कर लेते हैं। ये लोग मैनेज मास्टर हैं। बंगाली लोग कुछ नहीं कर पाते हैं। वो लोग कोई भी काम शुरू करते समय 10 परसेंट मनी रख देते हैं। पैसे देकर कोई भी काम करवा लेते हैं।
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की टिप्पणी:
मारवाड़ी समुदाय के खिलाफ राज्य के एक मंत्री अब्दुल रज्जाक मोल्ला के गैर जिम्मेदाराना बयान शर्मसार राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आज सरकार की ओर से माफी मांगी। राइटर्स बिल्डिंग में जब तृणमूल के विधायक दिनेश बजाज व मारवाड़ी समाज के प्रतिनिधियों ने मंत्री के बयान के खिलाफ मुख्यमंत्री के समक्ष शिकायत दर्ज करायी। मुख्यमंत्री ने इनके माध्यम से समुदाय से मांफी मांगी। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा है कि मारवाड़ी या हिंदीभाषी को लेकर किसी तरह की दुर्भावना सरकार में नहीं है । उन्होंने मामले मे सफाई देते हुए कहा कि मारवाड़ी व हिंदीभाषी समाज के बिना हम सब अधूरे हैं । आपके समाज का बंगाल के विकास में बहुत बड़ा योगदान हैं। औद्योगिकीकरण की दिशा में जिस तरह से यह राज्य आगे बढ़ रहा है, इसमें आपके समाज की अहम भूमिका है।
विमान बोस (मकपा राज्य सचिव) - पार्टी सहमत नहीं
माकपा के राज्य सचिव विमान बोस ने कहा कि राज्य के भूमि सुधार मंत्री अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने मारवाड़ी (हिंदीभाषी) समुदाय के खिलाफ जो टिप्पणी की है, उससे राज्य माकपा का कोई लेना देना नहीं है, हमारी पार्टी किसी संप्रदाय या समुदाय या भाषा के खिलाफ किसी तरह का विद्वेष नहीं रखती। हमारी पार्टी सामाजिक समरसता की हिमायती है। हम किसी भी समुदाय या जाति या प्रांतवाद पर यकीन नहीं रखते ।
महाश्वेता देवी - एकता को खतरा
मारवाडि़यों पर रिश्वत देने का रास्ता अपनाने का आरोप लगाने के मंत्री अब्दुल रज्जाक मोल्ला के बयान पर साहित्यकार महा’वेता देवी ने कहा कि ऐसे बयानों से देश की एकता को खतरा हो सकता है। रिश्वत देकर काम निकालने का रास्ता सभी अपनाते हैं। ऐसे में केवल एक समुदाय पर आरोप लगाना काफी गलत हैं। मंत्री का बयान गैरजिम्मेदाराना है।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

प्रान्तीयवाद का पनपना खेद का विषय- शम्भु चौधरी

अंतरराष्ट्रीय भाषा दिवस की पूर्व संध्या पर भाषा चेतना समिति के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बंगाल के भूमि व भूमि सुधार मंत्री माननीय अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने एक नये विवाद को जन्म दे दिया, पहले ही महाराष्ट्र के श्री राज ठाकरे उत्तर भारतीय ,बाद में यु.पी और बिहार के लोगों, और फिर छठ पूजा के ऊपर अपना आक्रोश जाहिर कर चुके थे, वह विवाद अभी थमा ही नहीं था, कि पश्चिम बंगाल के मंत्री महोदय ने मीडिया वाले को एक नया मसाला थमा दिया, जब से माननीय मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव बाबू ने दूसरी बार शपथ ग्रहण लिया, तब से पता नहीं इनकी सरकार को क्या ग्रहण लग गया, कि वे जब-जब वे राज्य में विकास कि बात करते हैं, कोई न कोई नया हंगामा खड़ा हो जाता है, और इनके विकास की पटरी लाइन से उतरकर खेतों, नदी-नाले, या फिर मीडिया में दौड़ने लगती है। नहीं तो, ऐसी क्या खास बात थी भूमि सुधार मंत्री में जिसके बयान से राज ठाकरे भी फीके दिखे। इन राज नेताओं से किस बात की हम आशा कर सकते हैं? जिनके बयान ही कटूता भरें हों। जिन लोगों से समाज जोड़ने की उम्मीदें की जानी चाहिये। उनके श्रीमुख से प्रान्तीयतावाद का जहर निकल रहा है। हमारे राजनेताओं का स्तर इस कदर नीचे गिरेगा, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इस तरह का वातावरण समाज के ताने-बाने को चकनाचूर/तहस नहस कर के रख देगा। जिस भूमि में छत्रपति शिवाजी जैसे योद्धा, डॉ.केशव बलिराम हेडगवार जैसे संगठनकर्ता, रविन्द्रनाथ ठाकुर व नजरूल ईसलाम जैसे कवि, स्वामी विवेकानंद जैसे विचारक,राजाराम मोहन राय जैसे समाज सुधारक, सुभाषचन्द्र बोस जैसे क्रांतिकारी ने जन्म लिया हो, उस भूमि से प्रान्तीयता-जातियता का पनपना बड़े खेद का विषय है। यू.पी.-बिहारी के मजदूर राष्ट्र के निर्माण में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। खेत-खलियान से लेकर भवन निर्माण, शिक्षा के जगत में भी इस समाज का कोई मिसाल नहीं है। यह बात अलग है, कि ये लोग बड़े ही सरल स्वभाव के होते हैं, गरीबी भी इनका पीछा नहीं छोड़ती। इसका अर्थ यह नहीं कि इनका समाज में कोई स्थान नहीं।
हमारा समाज के सभी शिक्षित लोगों से भी निवेदन है कि, वे प्रान्तीयता के किसी भी विवाद को समाचार-मीडिया में आमदनी का जरिया न बनाये, ऐसे लोग पहले भी थे, आगे भी पनपते रहेगें। यह बात देश की अख्ण्डता के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण है। इन दिनों कई बार इस तरह के समाचार मीडिया में देखने को मिल रहें हैं, यह हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे लोगों को महत्व न देकर उनके कद को छोटा कर दे। अभी ताजा उदाहरण प.बंगाल का ही लें- विडिओ क्लिप में ध्यान दें तो पाते हैं कि, अब्दुल रज्जाक साहेब ने वास्तव में क्या कहा, उन्होंने जिस वक्त मारवाड़ी समुदाय की बात कही, उसी वक्त उन्होंने साथ में यह भी कहा कि ‘‘बंगालीरा एक-दूई परसेंट दिये-लिये काज कोरते चाय’’ सम्मेलन की तरफ से जब उनसे संर्पक किया गया तो,उन्होंने फोन पर स्पष्ट किया कि उनके कहने का अर्थ था कि वे मारवाड़ी समाज की कार्यकुशलता की तुलना बंगाली समाज से करना चाह रहे थे। जबकि मीडियावालों ने इस समाचार को जिस तरह से प्रस्तुत किया, यह हम सबके सामने है। यह अलग बात है कि जिस कार्यक्रम में मंत्री महोदय शरीकत ले रहे थे, वह एक उदेश्य के तहत माकपा द्वारा समर्थीत साहित्यिक मंच ‘भाषा चेतना समिति’ के कार्यक्रम में विश्व मातृभाषा दिवस मनाने इकट्ठे हुऐ थे। यह एक सोचने की बात है कि मंत्री महोदय को मातृभाषा के विकास पर बोलना था कि या उनको कौन कितना घुस देता या लेता है पर? जहाँ तक मातृभाषा का प्रश्न है तो यह लिखना जरूरी हो जाता है कि मारवाड़ी सम्मेलन बंगाल में बंगला एकाडमी के साथ मिलकर बंगाला साहित्यकारों को सम्मानित करती आई है, ठीक इसी प्रकार असम में भी असमिया साहित्य सभा के विकास में इस समाज के योगदान को इंकार नहीं किया जा सकता। समाज की यह मान्यता रही है, कि समाज के लोग जिस प्रान्त में हैं वे उस प्रान्त की भाषा, साहित्य व संस्कृति को न सिर्फ सम्मान करें उसे अपनावें भी। कोलकाता में स्थापित भारतीय भाषा परिषद इस दिशा में मह्त्वपूर्ण भूमिका भी निभा रहा है, माकपा समर्थित इस मंच से यदि बंगला भाषा के विकास बात की गई हो तो, किसी भी समाज को कोई आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन यदि इस मंच का इस्तमाल बंगाली-अबंगाली करने के लिये किया जाता हो तो, माकपा को सोचने कि जरूरत है। इस बात में कोई दो मत नहीं कि बंगाल हमेशा से इस तरह के लोगों को दरकिनार करता रहा है। माकपा के शासन में तो इसके पर ही काट दिये गये, ऐसी स्थिती में माकपा के बैनर तले, माकपा का ही कोई मंत्री इस आग को हवा दे यह कदापि स्वीकार नहीं।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

व्यंग्य: मंत्री की भडास - शम्भु चौधरी

अंतरराष्ट्रीय भाषा दिवस की पूर्व संध्या पर भाषा चेतना समिति के कार्यक्रम को संबोधित करते हुऎ बंगाल के भूमि व भूमि सुधार मंत्री माननीय अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने एक नये विवाद को जन्म दे दिया, पहले ही महाराष्ट्र के श्री राज ठाकरे उत्तर भारतीय ,बाद में उ.पी और बिहार के लोग, और फिर छ्ठ पूजा के ऊपर अपना गुस्सा जाहिर कर चुके थे, वह विवाद अभी थमा ही नहीं था, कि पश्चिम बंगाल के मंत्री महोदय ने मीडिया वाले को एक नया मसला थमा दिया, जब से मानणीय मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव बाबू ने दूसरी बार शपथ ग्रहण लिया, तब से पता नहीं इनकी सरकार को क्या ग्रहण लग गया, कि वे जब-जब विकास कि बात करते हैं, कोई न कोई नया बबंडर खड़ा हो जाता है, और इनके विकास की पटरी लाइन से ऊतरकर खेतों, नदी-नाले, या फिर मीडिया में दौड़ने लगती है। आइये देखते हैं ऎसी क्या खास बात थी, भूमि सुधार मंत्री माननीय अब्दुल रज्जाक मोल्ला के बयान में जिसको लेकर राज ठाकरे भी फिंके पड़ने लगे, जब राज ठाकरे ही फिंके पड़ गये तो बाल ठाकरे को कौन पुछता है। बालासाहेब को इतना तो सब्र रखना ही चाहिये, कि लिखने से पहले असम, चनैई, बंगाल, उडिसा में छठ पूजा के समय निकलकर देख आना चाहिये कि छठ पूजा सिर्फ बिहारी समुदाय ही नहीं मनाते, मारवाड़ी, बंगाली, यहाँ तक पंजाब, गुजरात, मराठा, दक्षिण भारत के कई घरों में भी श्रद्धा से मनाई जाती है, जिस श्रद्धा से महाराष्ट्र में गणेश उत्सव मनाया जाता है। भारत किसी एक सांस्कृति से नहीं सबकी संस्कृति को लेकर चलता है, इन जैसे लोग ही, राजनीति के दुकानदार कई प्रान्तों में फल-फूल रहें है, कहीं जात-पात के नाम पर तो कहीं धर्म के नाम पर। इस बात में कोई दो मत नहीं कि महाराष्ट्र प्रान्त में जाकर लालू जी, मुलायम जी, और मायावती जी को जातिवाद की राजनीति नहीं करनी चाहिये, इससे विवाद को जन्म ही दिया जा सकता है।
अब बंगाल में कल की बात ही लें बंगाल के भूमि सुधार मंत्री माननीय अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने कल ऎसी कोई नई बात नहीं कही जिसको लेकर मारवाड़ी समाज को उत्तेजित होना पड़े, अरे भाई अभी तो ये बंगाल की वफादारी में लगे है, ये तो असली बंगाली हैं, और मारवाड़ी "मेड़ा" ?
पहले देखते हैं इनके श्री मूख ने क्या कहा-
"जारा मारवाड़ी, तारा सब किछु पोयसा दिए मैनेज कोरे निच्चे, ऐरा मैनेज मास्टर. बांगालीरा किछु कोरते पारचे ना.ओरा कोनो काज कोरते गेले 10 परसेंट मनी रेखे दाय. पोयसा दिए जे कोनो काज कोरिये नाय."अर्थात "जो मारवाड़ी हैं, वो सब कुछ पैसे देकर मैनेज कर लेते हैं. ये लोग मैनेज मास्टर हैं. बंगाली लोग कुछ नहीं कर पाते हैं. वो लोग कोई भी काम शुरू करते समय 10 परसेंट मनी रख देते हैं. पैसे देकर कोई भी काम करवा लेते हैं."

सिर्फ इतना ही नहीं आगे भी उन्होंने कहा कि " बंगाली 1-2 परसेंट ही ले-देकर काम चला लेते थे" मंत्री महोदय शायद भूल चुके होगें कि स्व. इन्दीरा गांधी के समय बोफोर्स दलाली का बहुत बड़ा मामला श्री विश्वनाथ सिंह के पिटारे से जिन बन बहार निकला था, सरकार कि हिला कर रख दिया, वहां पर कौन थे? इस घुस देने लेने की बात आपको इस लिये अच्छी नहीं लगी कि आप भूमि सुधार मंत्री होते हुऎ भी , बंगाल की जमीन पर आपको कोई घुस देने नहीं जाता। अच्छा एक बात पुछता हूँ, ये सलीम कौन है, जिसने कोलकाता में एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट लाने की घोषणा की थी , सरकार ने उसे बहुत बड़ा भू-भाग दिया था, उसका अब क्या हाल है, और उस प्रोजेक्ट का क्या हाल है, आप तो भू मालिक हैं जरा बताइयेगा कि उसे अब कौन बना रहा है, सरकार ने उसे कितने में बैची थी, बाद में कितने में बिका। ये "सहारा" वाले कौन है, शायद मारवाड़ी ही होंगे है? आप जरा पता लगाईयेगा कि DLF वाले के पास इतना धन कहाँ से आ गया, इण्डिया बुल्ल रिलेटर, एमार, ये सब तो मारवाड़ी ही हैं क्यों ठीक बात हैं न , बंगाली से सहानुभुति लेने के किये कुछ तो आपको कहना ही होगा, जमीन को लेकर पहले ही सिंगुर, नन्दीग्राम में आपलोगों की किरकरी हो चुकी है।
अरे भाई बंगाल में भाषा चेतना समिति का कार्यक्रम हो रहा था, जमीन या घुस पर शोध नहीं हो रहा था। देखिये भाषा चेतना समिति के लोगों ने कितनी अच्छी बात कही: " इमानूल हक साहब ने कहा- जो प.बंगाल में रहना चाहता हो, उसे बंगला सिखना पड़ेगा। दूसरे बड़े नेता श्री रतन भट्टाचार्या ने कहा कि- मारवाड़ी लोग फैक्टरी के नाम पर जमीन लेकर उसे सॉपिंग मॉल बनाते जा रहें इससे बंगाल के बच्चों को काम नहीं मिल रहा। इन्होंने तो लालू को भी नहीं छोड़ा- आगे कहा कि बिहारी बड़ी संख्या में रेल में भर्ती हो रहे हैं बड़ी संख्या में हिन्दी भाषी लोग हमलोगों का काम छिन रहें हैं। अब बात भाषा चेतना समिति की हो, और अपने मन की बात भी नहीं कहे ,तो भला कब कहेगें, आपको इनकी भावना की कद्र करनी चाहिये, कि इन लोगों ने खुलकर अपने मन के भड़ास को निकाला। सिर्फ एकेले ही बाला साहेब ठाकरे, लालू जी, मुलायम जी, राज ठाकरे जी ही देश को थोड़े चलायेगें, इस श्रेणी में बंगाल का नाम नहीं आयेगा तो इतिहासकार कहीं फिर न लिख दे कि देश कि प्रगति में बंगाल पीछे रह गया। वैसे भी वामपंथियों में इस बहस को लेकर मतभेद सामने आया है, पहली बार विमान बोस ने बात काबिले तारीफ़ कही - "बंगाल की यह संस्कृति नहीं रही है", वैसे शायद विमान बाबू को याद दिला देना चाहता हूँ कि बंगाल की संस्कृति में क्या है क्या नही, परन्तु माकपा के सिद्धान्त में इस तरह के लोगों का कोई स्थान नहीं है, आपको यदि मो, सलीम साहेब जैसे लोग न मिले तो जगह को खाली रहने दें। -शम्भु चौधरी
नोट: मारवाड़ी समाज की प्रतिनिधि संस्था अ.भा.मारवाड़ी सम्मेलन ने एक प्रेस विज्ञप्ती जारी कर कहा है कि: भूमि सुधार मंत्री श्री अब्दूल रज्जाक मौल्ला की कथित टिप्पणी पर उन्हेंने स्पष्ट किया कि उनकी कथित टिप्पणी को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है। श्री मौल्ला ने अपने वक्तव्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने यह कहा था मारवाड़ी समुदाय मुख्यतः व्यवसाय में है अपने व्यवसाय को अच्छा ‘‘मैनेज’’ करना जानते हैं। श्री मौल्ला ने कहा इस ‘‘मैनेज’’ ‘शब्द को मीडिया द्वारा गलत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। श्री मौल्ला ने श्री शर्मा से कहा कि वे मारवाड़ी समाज सहित सभी समाज की इज्जत करते हैं एवं जातिगत तथा साम्प्रदायिक आधारित टिप्पणी में विश्वास नहीं करते । उन्होंने कहा कि मेरा अभिप्राय मारवाड़ी समाज की भावना को ठेस पहुँचाना कतई नहीं था। अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन, मंत्री महोदय के स्पष्टीकरण पर संतोष व्यक्त करते हुए ऐसे संवेदनशील विषय पर मंत्रियों द्वारा टिप्पणी में संयम एवं सावधानी बरतने की अपील करती है। सम्मेलन मारवाड़ी समाज से भी मंत्री महोदय के स्पष्टीकरण एवं ठेस नहीं पहुंचाने के वक्तव्य को सही भावना के साथ लेने की अपील करता है

रविवार, 17 फ़रवरी 2008

पत्रकारिता और मारवाड़ी समाज:

मारवाड़ी देस का न परदेस का भाग - 6 लेखक- शम्भु चौधरी
पत्रकारिता और मारवाड़ी समाज:

मारवाड़ी समाज में पत्रकार तो बहुत हैं, परन्तु पत्रकारिता का अभाव है। समाज प्रेस तो खरीद सकता है, परन्तु कलम नहीं। समाज का एक धड़ा यह मानता रहा कि वह प्रेस का मालिक बनकर एवं अपनी कारों में प्रेस का बिल्ला चिपका कर समाज में शोहरत हासिल कर 'अंधों में काना राजा' वाली कहावत चरितार्थ कर रातों-रात साहित्यकार, पत्रकार, लेखक या फिर संपादक बन जाएंगे। ऎसे लोग सामाजिक संस्थाओं के द्वारा पूज्यणीय भी बन जाते हैं, जबकि न तो समाज को इनसे कोई लेना-देना होता, न ही इन्हें समाज से। अपने समाचार पत्रों में उन समारोह की फोटो छप जाने व सुबह कुछ मित्रों के फोन आ जाने भर से ही इनकी पत्रकारिता जीवित रहती है। विज्ञापनदाताओं और विज्ञापन की राशी इस बात का मापदण्ड होती है कि वे किसके समारोह में शामिल हो, या किसे अपने कार्यक्रमों में बुलाये। इनका काम कई बार राजभवन में आये नेताओं की जी-हजुरी करने और शहर के कुछ चुने हुए विज्ञापन दान-दाताओं को बुलाकर उनकी फोटो उतारना, उनका कोई सरकारी काम अटका पड़ा हो तो उसे सलटाने के लिये मोल-तौल कराना, किसी को सम्मानित करा देना, किसी को भामाशाह घोषित करा कर उस व्यक्ति से मोटी रकम वसुल कर लेना यह इनका मुख्य व्यापार रहता है। पत्रकारिता के नाम पर ये समाज के कलंक है, जो खुद तो बदनाम होते ही हैं, साथ ही समाज की गलत तस्वीर इतर समाज के समक्ष रख, पूरी की पूरी कौम को बदनाम करने में इनको जरा भी हिचक नहीं होता, पर मन को थोड़ा शुकून तब मिलता है कि इन सबके बीच कुछ अच्छे लोग भी बचे हुये हैं, इनमें स्व। रामनाथ गोयनका का नाम लिखा जा सकता है, और कुछ ऎसे उद्योगपति जो इस क्षेत्र को अपना आर्थिक सहयोग देकर साहित्यकारों, लेखकों, कवि, पत्रकारों का पोषण करते हैं, देश में ऎसे समाचार पत्रों की संख्या कम है, 20 वर्ष पूर्व की एक घटना मुझे याद आती है, उस रात मैं भी गुवाहाटी के एक होटल में ठहरा हुआ था, जब कामरूप चेम्बर आफ कॉमर्स के तत्कालीन अध्यक्ष शंकर बिरमीवाल की हत्या 'अल्फा' वालों ने कर दी थी, सुबह के समाचार इस घटना से रंगे पड़े थे, समाज के लोग सड़कों पर उतर पड़े थे, चारों तरफ भय का वातावरण बना हुआ था। समाज के कूछ लोग मूझसे आकर मिले और असम की सारी स्थिति की जानकारी दी, मैंने यह तय किया कि ' अल्फा' के इस आतंक को देश के सामने रखा जाय, कोलकाता आकर अपना पहला लेख तैयार कर समाज के इन तथाकथित समाचार पत्रों के मालिकों से मिलता रहा, सबने एक स्वर में कहा कि अल्फा के खिलाफ वे अपने समाचार पत्र में कुछ भी छाप नहीं सकते, मुझे काफी हताशा का सामना करना पड़ा, उन दिनों कोलकाता के एक समाचार जिसे रामावतार गुप्ता जी चलाते थे, उनके पास गया, उन्होने कहा कि मैं उपाध्यायजी से मिल लूँ। मुझे देखकर उपाध्याय जी ने कहा 'तुम मारवाड़ी हो?' मैने कहा हां, तो उन्होंने पास पड़े एक कागज को लिया, मुँह से पान की पीक उस कागज पर थूंकी, कागज को मोड़कर नीचे पड़े रद्दी के टोकरी में डालते हुऎ बोले, रखकर जाओ, कल और लिखकर लाना। मैंने पूछा आप एक बार देख लेते तो अच्छा रहता, उन्होने कहा कल अखबार में देख लुंगा। सच! दूसरे दिन 'सन्मार्ग' के तीसरे पृष्ठ पर "असम में अल्फा का आतंक" नामक शीर्षक से लेख छप चुका था, असम से दूसरे दिन समाचार आया, इस लेख की काफी प्रतिक्रिया हुई है, दूसरे दिन तो असम में संन्मार्ग हवाईजाहज से ऊतर पाया, तीसरे दिन ही इस पर अल्फा वालों ने पाबंदी लगा दी, तब तक बिहार के श्री कैलाशपति मिश्र ने संसद में सन्मार्ग को संसद के पटल पर रखते हुए सरकार से इस दिशा में स्पष्टीकरण की मांग कर डाली, हमारा उद्धेश्य सफल हो चुका था। पूर्वांचल प्रहरी, असम के मालीक श्री जी.एल.अग्रवाल उन दिनों कोलकाता के असम हाउस में ही ठहरे हुवे थे, उनसे मुलाकत करने असम हाउस गया, उन्होंने बताया कि वे इस संबंध में अपने समाचार में कुछ भी नहीं छाप पायेगें, यह बात तो मेरे समझ से बाहार है कि ये अखबार क्या सिर्फ समाज को मुर्ख बनाने के लिये ही चलाते हैं? कई बार कुछ राजनैतिक कारण होते हैं जैसे इन्दीरा गांधी द्वारा जारी आपातस्थिति की घोषणा के समय प्रायः सभी हिन्दी भाषी समाचार केवल ' जनसत्ता' को छोड़कर अपने घुटने टेक दिये थे। रोजना समाचार के नाम पर समाज में अश्लीलता भरे समाचार, सनसनी भरे समाचार, या फिर खुदके समाचार और विज्ञापनों से समाचार पत्रों को पाट कर पाठकों को रोजना मुर्ख बनाने के लिये ही समाचार पत्र नहीं होते, कई बार सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी निभाई जाती है, परन्तु ऎसे वक्त ये लोग बगले झांकते नजर आते हैं। ये लोग पत्रकारिता के सारे नियम-कायेदे को तोड़कर सिर्फ विज्ञापन की दुकानदारी चलाते नजर आते हैं। मेरा यह भी मानना है कि विज्ञापन ही समाचार पत्रों की अहम् खुराक है, लेकिन एक-एक इंच समाचार को विज्ञापन के नाम पर बैच देना यह कैसी पत्रकारिता है, इन दिनों मीडियावाले भी कुछ इस तरह का ही करने लगे हैं एक समय में 'आजतक' ने दूरदर्शन वालों को धुल चटा दी थी , आज इन लोगों ने भी समाचार के नाम से घर-घर में अश्लीलता, सनसनी समाचार फैलाने का मानो एक प्रकार से ठेका ही ले लिया हो, पिछले दिनों आदरणीय प्रभु चावलाजी इस विषय की एक बहस में हिस्सा लेते हुये इसे लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा करार दिया। कई बार सोचता हूँ, इनकी मानसिकता कहाँ लुप्त हो गई, या फिर हमारी सोच को हमें ही बदलना होगा। हिन्दी समाचार पत्र कि एक और त्रासदी यह है कि रोजना बच्चों से जुड़ी घटनाओं को सेन्सर न कर उस समाचार को रोचक तरीके से प्रस्तुत कर ये लोग दुसरे बच्चों की मानसिकता पर गहरी छाप बना देते हैं। हर वर्ष बच्चों द्वारा की जा रही आत्महत्या के लिये मैं सीधे तौर पर इन समाचार पत्रों, और मीडिया वाले को दोषी ठहराता हूँ। इसमें हमारे समाज के पत्र भी शामिल हैं। मेरी दृष्टि में समाचार पत्र , समाचार खरीदते और पाठकों को बैचते हैं। तो क्यों नहीं इस समूह को भी "उपभोक्ता-कानून" के अन्तर्गत न लाया जाय? इससे न सिर्फ समाचार समुह को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होगा, समाज को हम सब मिलकर एक स्वस्थ वातावरण भी दे सकेगें। क्रमश: लेख आगे भी जारी रहेगा, आप अपने सूझाव से मुझे अवगत कराते रहें , अच्छे सूझाव को इस लेख का हिस्सा माना जायेगा। - शम्भु चौधरी , 17.02.2008 शाम 5.25 पिछले भाग यहाँ से पढ़ें:
http://groups.google.com/group/samajvikas

सोमवार, 11 फ़रवरी 2008

एमजे अकबर का दंगा?

कलकात्ता में जब एमजे अकबर साहेब 'टेलीग्राफ़' समाचार पत्र के सम्पादक हुआ करते थे, तब से आप दंगा पर शोध करने में लगे थे, अब इनका यह शोध समाप्त हो चुका है, वैगर किसी डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त किये इनका यह शोध पूरा भी हो गया, देखिये क्या लिखते हैं अकबर साहब " मैं सांप्रदायिक संघर्ष का हल ढूंढने के काफी करीब पहुंच चुंका हूँ। इसे लोभ की संज्ञा दी जा सकती है। एक लंबे अरसे तक, लगभग दो दशकों से हिंसक घटनाओं की रिपोर्टिंग करते हुए मुझे यह भ्रम रहा कि शांति मानवीय आवश्यकता की दृष्टि से एक अनिवार्य तार्किक परिणिति है। संघर्ष से अच्छा, विशिष्ट या सामान्य जैसा कोई भाव नहीं पैदा होता। सवाल है, क्या कभी अच्छी भावना मानव व्यवहार के लिए निर्धारक कारक रही है? घृणा की मूल प्रवृत्ति समाप्त करने के लिये उससे अधिक शक्तिशाली प्रतिरोध की जरूरत होती है। इस समस्या का समाधान लोभ में खोजा जा सकता है। ध्यान देने योग्य बात है कि पिछले 15 वर्षों के दौरान मात्र दो बड़े सांप्रदायिक दंगे हुऎ। एक बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद और दूसरा गुजरात में गोधरा घटना के बाद। ऎसा नहीं है कि इस दौरान छोटी घटनाएं नहीं हुई। 80 के दशक में मुरादाबाद, मेरठ,
भागलपुर
, दिल्ली आदि में मातम का माहौल देखा गया। कुछ शहरों में हुई हैवानियत न सिर्फ लोगों के मारे और जलाये जाने के गवाह बने, बल्कि चाकू घोंपने की वारदातें वहां बढ़ी। सांप्रदायिक जहर लोगों की नसों में दौड़ रहा था। ऎसे महौल में बदलाव नहीं आता।" आगे जाकर अकबर जी ने इस लेख का पूरा राजनीतिकरण कर दिया। जिस शौध की बात कर रहे थे, वो बस इन्ही चार पंक्तियों में समाप्त हो गया, तो मेंने सोचा कि क्यों न इनकी अधुरी बात को ओर आगे बढाया जाय।
मेरी चार पंक्तियों से अपनी बात शुरू करता हूँ :
'जब भी कोई दंगा होगा, कोई न कोई नंगा होगा।
हिन्दू-मुसलिम न हो भाई, ऎसा ही कोई बंदा होगा।।
अकबर साहब जरा गौर फरमाते तो यह भी पता लगाते कि दंगे की शुरूआत कब, कैसे और कहाँ से होती है। देश में दंगों का इतिहास इनके 20 साल में ही न ही शुरू हुआ और न ही इस लेख के बाद खतम और कम हो जायेगा। यदि ईमानदारी से दंगों के तह में जाने का प्रयास किया जाय तो एक नया दंगा हो जायेगा। दंगे कब और कैसे और किसने करवाये यह भी बताना जरूरी होगा। शायद यह बताने से अकबर साहब को कोई भी राजनीति दल अपनी पार्टी के कोटे से राज्यसभा का सदस्य नहीं बनायेगा। यह बात सही है कि इससे समस्त मानव जाति को क्षति उठानी पड़ती है। एम.जे.अकबर साहब को भले ही भ्रम हो सकता है, कि ' शांति मानवीय आवश्यकता की दृष्टि से एक अनिवार्य तार्किक परिणिति है। " परन्तु मुझे जरा भी झीझक नहीं कि यह प्रायोजित सांप्रदायिक दंगों के सुत्रपात सत्ता के गलियारे से शुरू हो कर वहीं दफ़न हो जाती है। भारत के पिछले दंगों के इतिहास को यदि ईमानदारी से देखा जाए, तो भारत के जिस-जिस क्षेत्र में दंगे हुए हैं, ( इंदिरा गांधी हत्या के बाद कांग्रेसी दंगे को छोड़कर ) वे हिन्दू बहुल क्षेत्र में न होकर मुस्लिम बाहुल क्षेत्र ही रहें हैं, ये दंगे ईद या बकरीद के समय नहीं होते, जब भी हुए हैं उस समय हिन्दूओं का कोई न कोई पर्व या त्योहार रहा है। गुजरात का मोदी सरकार प्रायोजित मार-काट भी गोधरा की कड़ी ही मानी जायेगी। जो लोग मानते हैं कि दंगे का फल दुःखदायी होता है, उनके मन की बात लेने के लिये सांप्रदायिकता फैलाई जाती है। अल्पसंख्यकवाद का सहारा लेकर देश में राजनीति की जाती है। दंगे का इतिहास कोई दो सौ साल पुराना नहीं, जिसपर शौध नहीं किया जा सकता। हाँ कुछ लिखने से पहले दिमाग की खिड़कियों को खोलना जरूरी है, जो शायद ही अकबर साहब कर पायेगें, उनको अपना हाल तस्लिमा जैसा तो कराना नहीं जो मुस्लमानों का कच्चा चिट्टा खोल कर रख दिया हो। सत्ताभोगिया कलम के लेखक में इतना दंम कहाँ कि वे दंगे की बात खुलकर कह सके।

-शम्भु चौधरी

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

प्रश्न समाज की व्यवस्था का है न कि प्यार का?

ज़नसत्ता कोलकाता संस्करण दिनांक 11.11.2007 के अंक में अलका सरावगी का लेख "चाहे जो कहिए" पढा़। इस बात से कोई दो मत नहीं कि प्रेम की राह में एक अच्छे इंसान की मौत हो गई। परन्तु यह भी हमें मानना पडे़गा कि इसमें न्याय दिलाने की आढ़ में शहर की प्रायः सभी राजनैतिक दलों ने वोटबेंक का ज्यादा से ज्यादा ख्याल रखा। देश में प्राय: रोजाना इस तरह के हादसे हो रहे हैं, प्रेम की आढ़ में सामाजिक संरचना चरमरा रही है, हम सभी घटनाओं को एक दृष्टि से देखने का प्रयास कर समाज के सामने नया संकट पैदा कर रहें है। जहाँ तक अलका जी के विचार 'प्रेम के उत्सव' से मेल खाते है वहीं इस घटना को मेरे दृष्टिकोण से देखता हूँ तो पाता हूँ कि रिजवानुर समाज की नजर में एक अपराधी करार दिया जाना चाहिये। रिजवानुर-प्रियंका का मामला हो या पटना कालेज के प्रोफेसर मटुक नाथ यह और भी इससे मिलते-जुलते कई मामले जैसे ; मालिक-नौकरानी का प्रेम नौकर- मालिक की लड़की का प्रेम, कर्मचारी के साथ मालिक के लड़के- लड़की का प्रेम शिक्षक का छात्राओं को पढ़ाने के नाम पर प्रेम और इसे प्रेम को उम्र की आढ़ में अदालती संरक्षण देना कितना उचित होगा, इस पहलु पर हमें नये शिरे से सोचना चाहिये। मैं मानता हूँ भारतीय समाज को प्रेम की भाषा समक्षने में अभी थोड़ा ओर वक्त लगेगा, मीडिया, समाचार पत्र और भारत का तथाकथित बुद्धिजीव वर्ग प्रेम को ज्यादा अच्छी तरह से परिभाषित कर सकते हैं, चुंकि उन्हें समाज की ज्यादा चिन्ता है। इस तरह के अप्रिय प्रेम जिसमें पारिश्रमिकता का संबंध बना रहता है, पहले हमें क्रमवार इसके अन्य पहलुओं को देखना भी जरूरी हो गया है, कि क्या हमारा समाज ऎसे प्रेम को प्रेम की मान्यता भी देगा या नहीं। बार-बार हमें सामाजिक ढाँचे पर चोट करने से पहले हमारे चिन्तन पर भी दस्तक देनी होगी, सड़क छाप साहित्यकार न बनकर समाज को अपने चिन्तन से नये विचार देने होगें। अलका जी एक बहुत अच्छी लेखिका हैं इनके कई लेख मैंने पढे़ थे, परन्तु इस लेख ने मुझे काफी हतोत्साहित किया। रिजवानुर एक शिक्षक था, पहले हमारे शास्त्र में शिक्षक को क्या स्थान दिया गया है इस पर एक साहित्यकार के नाते उन्हें ध्यान देने की भी जरूरत थी, संस्कृत का वह श्लोक तो हम सभी जानते ही होगें:

गुरूर्बह्मा
गुरूर्विषणुः, गुरूर्देवो महेश्वरः ।
गुरूः साक्षात्परं ब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति ने गुरू को माता पिता से भी उँचा दर्जा दिया है, इस लिये नहीं कि वे बच्चों को पढा़ने के नाम पर शिक्षा देते-देते बच्चे को बहला-फुसलाकर अपने प्रेमजाल में फंसाकर कानून और सड़क छाप पत्रकारिता के बलपर समाज को प्रेम की परिभाषा समझाने लगे। शायद ही दुनियां का कोई धर्म इस तरह की हरकतों को प्रेम की आढ़ देता होगा, यदि ऎसा हो जायेगा तो एक बाप - बेटी, माँ -बेटा, भाई-बहन के रिश्ते को भी उम्र और कानून की दहलीज पार करते ही प्रेम करने की राह से कोई नहीं रोक सकता। शायद प्रेम शब्द के इतने गलत प्रयोग के लिये हम जैसे साहित्यकार ही दोषी माने जायेंगे। आज हमारे शिक्षण संस्थानों को आगे बढ़कर इन प्रश्नों का समाधान खोजना होगा, कि उनके यहाँ कार्यरत शिक्षक इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल पाया जाय तो तत्काल ऎसे शिक्षक को समाज के सामने नंगाकर कानून के हवाले कर दिया जाना चाहिये।
हम यदि इस तरह के प्रेम को प्रेम की भाषा में तौलने का प्रयास करते रहे तो, घर-घर में कोई शिक्षक के नाम से, कोई नौकर बनकर, हमारी सामाजिक व्यवस्था को क्षिन्न-भिन्न कर देगें, सामाजिक व्यवस्था कानून से नहीं विश्वास से चलती है, इस विश्वास को कानून का जामा पहनाकर अपहरण करने वाले तत्वों को कानूनी संरक्षण देना कितना उचित होगा, इस पहलु पर भी हमें गम्भीरता से सोचने की जरूरत है। हमारा दायित्व बनता है कि प्रेम के बढ़ते इस तरह के अपराधिकरण को रोकने के लिये कानून में इसकी विस्तार से चर्चा हो, कि क्यों न इस तरह के अपराध को कानून के दायरे में लाया जाय ताकि कोई माँ-बाप अपने बच्चे को शिक्षा के लिये भेजे तो कोई शिक्षक उसको बहला-फुसलाने की जगह शिक्षा पर ही ध्यान दे, और कोई ऎसा नहीं कर प्यार का नाटक करता हो तो उसे, कानूनी समर्थन की जगह उस शिक्षक को समाज का सबसे बड़ा अपराधी करार दिया जाना चाहिये।
प्रेम के बीच कोई समाज बाधक नहीं बन सकता, परन्तु सामाजिक व्यवस्था भी कोई चीज होती है, ओर सामाजिक व्यवस्था से ही हमारा समाज चलता है, कानून मात्र सहायक होता है, कानून से समाज की सभी व्यवस्थाऎं नहीं चलाई जा सकती, समाज का काम होता है कानून का निर्माण करना, कानून से समाज नहीं बनता। इस तरह के प्रेम को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिये कि नहीं इस बात को हमें नये सिरे से सोचने की जरूरत है। आपकी राय क्या है जरुर दें, प्रश्न समाज की व्यवस्था का है न कि प्यार का? - शम्भु चौधरी

गुरुवार, 31 जनवरी 2008

व्यंग्य: बड़ाबाजार में आग तो रोज लगती है!

वाममोर्चा सरकार एक तरफ 30 वर्षों की अपनी सफलता का जश्न मना रही थी, दूसरी तरफ दमकल कर्मी खतरे की घंटी बजाना बन्द कर रैली के पीछे-पीछे सरकते जा रहे थे, और बड़ाबाजार धू-धू कर जलता रहा। संवेदनशील विचारधारा के धनी मुख्यमंत्री माननीय श्री बुद्धदेव बाबू की ज़ुबान राज्य के 100 से कम कट्टरपंथियों के आगे लडखड़ा गयी। परन्तु बिग्रेड मैदान में खूब जमकर बोले राज्य की तरक्की के लिये उद्योगपतियों की सराहना की और कहा कि राज्य में उद्योग लगाने के लिये कई देशी-विदेशी प्रस्ताव सरकार के पास आयें हैं, उन्होंने माना कि बाम विचारधारा और प्रगति एक साथ नहीं चल सकती, तीस साल बाद बामपंथियों को यह बात समक्ष में आयी, यही एक अच्छी बात है, सर्वहारा वर्ग के मसिहा होने का ढींढोरा पिटने वली वाममोर्चा की सरकार, किसानों की हत्याकर, उद्योग बैठायेगें यह बात गले नहीं उतरती, मुक्षे क्या किसी भी वाम विचारधारा को नजदिक से जानने वाले को भी नहीं उतरेगी। किसानों की उपजाऊ जमीन को गैरकानूनी तरिके से अधिकृत कर उद्योगपतियों को औने-पौने दाम में बैच देना, नंदीग्राम के खेतिहर मजदूरों को मौत के घाट सुला देना, कोई इनसे सीखे। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की जुबान पर नपे-तुले शब्द थे, राज्य की प्रगति बस ! दूसरी तरफ एक कोस की दूरी बड़ाबाजार में व्यापारियों का सबकुछ जलकर खाक हो रहा था, सारा का सारा प्रशासन इस बात के लिये लगा था कि, मुख्यमंत्री महोदय को धूआं न लग जाये। राज्य के वित्तमंत्री श्री असीमदास गुप्ता को छोड़कर सभी मंत्री मकरसंक्रांति की ठण्ड में अपने-अपने घरों में वातानुकुलित शयनकक्ष का आनन्द उठा रहे थे। वेतुके शब्दों की राजनीति करने वाले श्री विमान बोस जिस तरह तस्लीमा के लिये अपनी जीभ हिला सकते थे, थोड़ा बहुत बड़ाबाजार के व्यापारियों के प्रति भी हिला पाते तो कुछ सुकून मिलता, लेकिन बामपंथी स्वभाव ने इनके हमदर्दी भरे शब्दों को भी जात और धर्म में वांट रखा है, समाज के अन्दर असभ्यता फैलाने वाले एक शिक्षक जिसने अपनी एक छात्रा को बहला-फुसला कर निकाह कर प्रेम का जामा पहनाया, जिसे राज्य के स्पीकर हालीम साहेब ने राजस्थान की याद दिलाते हुये इस अपराध को नई पीढ़ी का परिवर्तन बताया, राज्य के मुख्यमंत्री एक आम घटना पर उसके घर जाकर सहानुभुति बटोर आये, शायद इसलिये कि मामला एक धर्मविशेष से जुड़ा था, वाम विचारधारा को मानने वाले मेरे जैसे अनेक स्वतंत्र लोगों को तब घोर आश्चर्य हुआ, जब 30 वर्षों से जो दल आम के फल को खट्टा बता कर , जी भर कर कोसते रहे, आज उसी फल के गुण बताते नहीं थकते। हर मंत्री यहां तक एक जमाने में पाँच पैसे भाड़े में वृद्धी को लेकर शहर की कई ट्रामों को आग के हवाले कर देने वाले माननीय ज्योति बसु भी इस बात से सहमत नजर आये, पूरे बंगाल के कल-कारखाने जब नरकंकाल बन चुके तब जाकर इनको, इस बात का ख्याल आया कि इन नरकंकालों में अब भी थोड़ी जान बची है, जिससे राज्य का विकास संभव है।
बड़ाबाजार आग की लपटें देशभर में फैल चुकी थी, परन्तु 100 गज की दूरी पर खड़े राइटर्स भवन की लाल दीवारें इतनी शख्त विचारों की बनी है कि उस भवन में बैठे मंत्री के चेम्बर तक नहीं पहूंच पाई। नगरनिगम के कर्मी और महाखलनायक कोलकाता के मेयर श्री विकास रंजन भट्टाचार्य बाबू और इनके प्यादे यह बताने में लगे थे कि बड़ाबाजार की सारी इमारते गैरकानूनी है, कहने का अर्थ यह था कि बंगाल में सिर्फ बड़ाबाजार में ही गैरकानूनी निर्माण होता है, आग बुझे इस बात की चिन्ता किसी भी निगमकर्मी को नहीं थी, सारा का सारा कॉरपोरेशन इस बात को लेकर परेशान था, कि यदि कोई कानूनी रूप से सही भवन को आग लग जायेगी तो उसे भी गैरकानूनी कैसे साबित किया जाय सके। राज्य में राजस्थान का एक तीन सदस्यी मंत्रियों का एक दल घटनास्थल का निरक्षण करने राजस्थान से पहुंच गया, राज्य के दमकल मंत्री से मिलने उनके कार्यलय भी गये, परन्तु राज्य के दमकल मंत्री श्री प्रतिम चटर्जी आग बुझाने में इतने व्यस्थ थे कि इनके पास मिलने का भी वक्त नहीं था, भला हो भी क्यों, विचारधारा का भी तो सवाल था, सांप्रदायिक लोगों से मिलकर अपनी छवी को खराब करनी थी क्या? राजस्थान सरकार को सोचना चाहिये कि वह इसकी दुश्मन नम्बर एक है, पहले ही तस्लीमा को लेकर राजस्थान ने आग में घी का काम किया, उनका एक नुमांइदा जो समाज को किस तरह से नीचा करे की दौड़ में लगा है, जिसके चलते पहले ही बंगाली समाचार पत्रों ने मारवाड़ी को जी भरकर गाली दे डाली, पता नहीं किस मानसिकता का बना हुआ है, मारवाड़ी कौम! जिसे जो चाहे जितना गाली दे डाले कोई फर्क ही नहीं पड़ता। राजस्थान के मंत्री आने से आग कितनी बुझी यह तो वक्त ही बतायेगा, हां बामपंथियों के दिल में आग जरूर लग गय़ी। अब भला सच ही तो है, दमकल मंत्री क्या केवल यही इंतजार करता रहेगा कि कब और कहां आग लगे, और भी तो उनके पास बहुत सारे काम हैं, आपलोग खामांखा हो हल्ला करते रहिये। बड़ाबाजार में आग लग गयी तो क्या हुआ, तपसीया, या न्यूमार्केट में तो आग नहीं लगी है, जो बाममोर्चा के चिन्ता कारण बनती। बड़ाबाजार में तो यूँ ही रोजना आग लगती रह्ती है, कभी प्याज के दाम में , तो कभी अनाज के दाम में, दमकल मंत्री है, कोई खाद्यमंत्री तो है नहीं, जो बार-बार आप आग लगाते रहिये और ये आकर बुझाते रहे। मछली य चमड़ा बाजार होती तो फिर भी सोचने की बात थी, त्रिपाल पट्टी, कपड़ा बाजार था। आग तो लगना ही था। यह तो एहशान है कि वे आग बुझाने आ गये, वर्ना आप क्या कर लेते।
-शम्भु चौधरी, पता: एफ.डी:- 453, सल्टलेक सिटी,कोलकाता-700106

रविवार, 2 दिसंबर 2007

लक्ष्य


मेरे साथ चलो न चलो
मेरी बातों को मानो न मानो,
हम सबका लक्ष्य एक है;
उसकी तरफ बढ़ते रहो, हमेशा की तरह,
कल भी, आज भी, कल भी,
इसे कोई प्रण कह ले या चुनौती;
इसे ही स्वीकार करना होगा!
क्षमता हो या न हो,
लक्ष्य की तरफ बढ़ना ही होगा,
कल भी, आज भी, कल भी।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी़-453, साल्टलेक सिटी, कोलकाता-700106

एक दाने की तलाश!

नयी सदी का आना,
किरणों में एक सदी का गुजर जाना,
एक सदी के गर्भ में ही, एक सदी का जन्म
नई पौध, नया उत्साह, नई उर्जा, नया उमंग,
पर चिडि़यों की कोलाहल मैं, कुछ भी नया नहीं था।
वही धुन, वही राग, न वीणा न कोई तान,
बस था वही पुराना सा दर्द,
एक दाने की तलाश!
एक दाने की तलाश।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी़-453, साल्टलेक सिटी, कोलकाता-700106

सती

मैं तो भावावेश में जल रही थी,
तुने आवेश में जलाया,
पापा-पापा मैंने की,
ऎ पापी!
तुने सती बनाया।
-शम्भु चौधरी, एफ.डी़-453, साल्टलेक सिटी, कोलकाता-700106

मैं भी धन्य हो जाऊँ


जन्म मुझे दो एक बार माँ, ऎसा गौरव पाऊँ,
इस मिट्टी का तिलक लगा, मैं भी धन्य हो जाऊँ।
जिस धरती का सुहाग, अमर अमिट हो लहराता हो,
कच्चे धागे का बंधन भी, तोड़ न कोई पाता हो,
माँ की ममता, दूध पिलाने को, हो जाती आतुर;
गौरव से सर ऊँचा कर जब गाँव-गाँव मुसकाता हो,
ऎसी धरा पर जन्म लेने को, मन मेरा अकुलाता है।
जन्म मुझे दो एक बार माँ, ऎसा गौरव पाऊँ,
इस मिट्टी का तिलक लगा, मैं भी धन्य हो जाऊँ।

-शम्भु चौधरी, एफ.डी़-453, साल्टलेक सिटी, कोलकाता-700106

ये आँखें हैं!

आँखों की स्नेह भरी दुनिया में, बीज ऩफ़रत के मत बोना।
ममता भरी इन आँखों में, आंसू के मोती मत पोना।।
प्यार भरी इन आँखों में, कामुक्ता से मत धोना।
शर्म-ओ-हया इन आँखों की, इंसान के आगे मत खोना।।
आँखों को देने वाले से, आँखें न कभी मिलाना तुम।
नफ़रत के बीज बोने वाले, खेती आँखों में हलने वाले,
बारूद के बल चलने वाले, जह़र के शब्दों से सींचने वाले;
नासमझ को बहकाने वाले,
इंसानों को धमकाने वाले,
यह मत समझो, इन आँखों ने,
जो तुमने दिखलाया,वो ही देखा,
बस देखा है इन आँखों ने वो सब !
जो तुमने नहीं देखा।
देगी ये आँखें ही तेरे इन कारनामों का जबाब,
जब ये जलेगी, तो मांगेगी, एक-एक से जनाब!
आज न सही,
तुम हिटलर, लादेन बनो या सद्दाम!
ये आँखें हैं!
आयेगी जरूर लेने एक दिन, अपना हिसाब
आयेगी जरूर लेने एक दिन, अपना हिसाब -शम्भु चौधरी

शनिवार, 1 दिसंबर 2007

समझौता

गाँव से आया एक परिवार,
सड़क के किनारे,
घर बसा, खुदा से दुआ मांग रहा था।
कल तक गाँव में जो लड़की,
लगती थी आँखों को प्यारी,
शहर में आते ही लगी थी खटकने,
कल तक जो बच्ची लगती थी,
आज लगने लगी थी बड़ी,
पर लाचार हो चुपचाप था,
सुबह कब हुई, पता ही नहीं चला,
सामने लड़की चाय लिये खड़ी थी,
अब्बा ! चाय पी लो !
उसकी आँखों में शर्म,
और मेरी आँखों में लाचारी
दोनों ने एक दूसरे से समझौता कर लिया था।
उसने भी अपनी आँखें छुपा ली,
मैंने भी अपनी आँखें झूका ली
- शम्भु चौधरी

प्रेम

प्रेम तो बस्ती में बचा था,
पाँच-दस रूपये में नीलाम हो रहा था,
लोगों की लगी थी लम्बी कतारें,
घर के बच्चे सो गये थे ,
थके-हारे।
इस प्यार के इंतजार में ,
कुछ हमारे - कुछ तुम्हारे।

कारपेन्टर

एक नेता ने अपने एक साथी से कहा;
जल्दी से कोई ऎसा राज बताओ,
या फिर संसद से कोई मंत्री की -
कुर्शी ही गायब करवाओ,
मुझे मंत्री बनना है।
कोई चमत्कार दिखलाओ,
पास खड़े एक समर्थक ने कहा -
सर! मेरे पास वही ' कारपेन्टर ' है,
जिसने संसद की सारी कुर्सियाँ बनाई है,
कहें तो,
मन्त्री की क्या बात करते हैं, सर्!
सीधे प्रधानमंत्री की ही कुर्सी बनवा लाता हूँ।

भरोसा

खून की बोतल लिये, खड़ा एक मरीज,

मांग रहा था भीख।

दया करो! मांई-बाप!

आपके हाथों का स्वाद, कुछ अनोखा है,

न कोई कत्ल, न कोई धोखा है।

दिवालों पर लिखे नारों में,

इतना तो भरोसा है।

मानवाधिकारी से फरियाद



जेल में बन्द एक अपराधी, आयोग से गुहार लगाई।
हजूर!
मैं अपराधी नहीं हूँ, कत्ल के आरोप जो लगे हैं
अदालत में न कोई गवाह, न उनके कोई सबुत मिले हैं ;
और जो कत्ल हुए हैं उनके गुणाहगार सत्ता के मुलाजिम हैं।
मैने तो बस पेट के लिये उनका काम ही किया है,
हजूर!
ये लोग रोज मुझे मारते-पिटते और मुझ पे जुल्म ढाते हैं,
तड़पा-तड़पा के पानी पिलाते व दो दिन में एक बार ही खिलाते हैं
कड़कती सर्दी में रात को कम्बल छिनकर ले जाते हैं,
दवा के नाम पे ज़हर देने की बात दोहराते हैं।
हजूर!
ऎसा लगता है, आकावों के डर से मुझे डराते और धमकाते हैं,
भेद ना खुल जाये, इसलिये बार-बार आकर मुझे समझाते हैं
मुझे डर है कि ये लोग मुझ से भी बड़े अपराधी हैं
जो कानून की शरण में सारे गैर-कानूनी हथकण्डे अपनाते हैं।
हजूर!
मैं न सिर्फ निर्दोष, गरीब और बाल-बच्चेदार भी हूँ,
घर में मेरी पत्नी और बीमार माँ परेशान है,
मेरे सिवा उनको देखने वाला न कोई दूसरा इंसान है,
बच्चे सब छोटे-छोटे, करता मैं फरियाद हूँ।
हजूर!
ये लोग जान से मारने का सारा इंतजाम कर चुके हैं,
अदालत से कहिं ज्यादा इनका खौफ़ देख
करता मुझे हैरान है, कलतक मैं सोचा करता था,
शहर का सबसे बड़ा अपराधी मैं ही हूँ,
इनकी दुनिया देख तो लगता है मैं तो कुछ भी नहीं हूँ।
हजूर!
मै मानव हूँ, मुझे भी जीने का अधिकार है,
आप ही मेरे कृष्ण भगवान हैं, इस काल कोठरी में दिखती ;
एक मात्र आशा की किरण, जो आपके गलियारे से आती दिखाई देती है।
इस लिये है मानवाधिकारी!
हजूर!
आपके शरण में मैं खड़ा हूँ!
आपके शरण में मैं खड़ा हूँ!
-शम्भु चौधरी, एफ.डी.-453, साल्टलेक सिटी, कोलकाता-700106

बुधवार, 28 नवंबर 2007

मानवाधिकार

Tribal woman stripped naked in Guwahati

"हम" अपने को कहतें हैं 'मानव'
"वे" भी तो हैं 'मानव'!
परन्तु हम उसे मानव नहीं मानते;
उसे अपनावें, यही सत्य है।
ईश्वर भी यही है।
अज़ान या घन्टे की आवाज से ईश्वर नहीं मिलते;
ईश्वर न तो गिरजघरों में रहते हैं,
न ही गुरूद्वारा, मस्जीद, मंदिर में,
यह तो बस बसा है हमारे-अपके हृदय में,
कैद हो गया है हमारा हृदय,
जो चारदिवारी के बीच खोजता है ईश्वर को,
पूजा उसकी करो जो दीन है,
वे दीन नहीं,
भूखे, नंगे और लाचार हैं या अशक्षित हैं,
उनकी सेवा ऎसे करो, कि वे इनसे मुक्त हो सके,
अपने दान से उनके जीवन को बदलने का प्रयास करें।
वे दीन नहीं,
उनके हृदय में बसा "हृदय"
स्वच्छ व संतुष्ठ है।
भूखे-नंगे-अनपढ़ तो हम हैं;
न तो हम स्वच्छ हैं, न ही संतुष्ठ ;
मानव से मानव की दूरियों को बढ़ाते चले जा रहें हैं।
उनको देखो!
वे कैसे एकत्रित हो नाच-झूम-गा रहें,
परन्तु हम एक कमरे में सिमटते जा रहे हैं
हमारी दूरी तय नहीं,
और वे दूरी को पास आने नहीं देते।
देखो! उनको ध्यान से देखो, और कान खोल कर सुनो!
.....उनकी तरफ ध्यान दो!.........
'सूर्य की किरणें, बादलों का बरसना़......
हवा का बहना, खेतों का लहलहाना......
पक्षियों का चहकना, चांद का मुस्कराना......
मिट्टी की खुशबु, वन की लकड़ी, वंशी की धुन......
सब उनके लिये है, हमारे पास क्या है?
सिर्फ एक मिथ्या अधिकार कि हम 'मानव' हैं
तो वे क्या हैं? - जानवर? ......
नहीं! वे भी मानव हैं, पर ......
हम अनके साथ जानवर सा करते हैं सलुक;
कहीं धर्म के नाम पर, कहीं रंग के नाम पर,
कहीं वर्ण के नाम पर, कहीं कर्ण के नाम पर,
यह सब शोषण है, इसे समाप्त करना होगा;
इसके लिये हमें लड़ना होगा - शम्भु चौधरी

कोलकात्ता






1.

कोलकात्ता आज भी ढोता है,
जिन्दा लाशों को, कन्धों पे नहीं, शीनों पे,
श्मशान की बात मत करो;
ये तो फिर जग जाते हैं,
हम लावारिश लाशों की
गिनती में आ जाते हैं।
चढ़ कर देखो एक बार सिर्फ!
एहसास तुम्हें हो जायेगा
मानवता व आजादी का
नाम नहीं ले पायेगा।

2.
ये सड़कें, ये गलियाँ, फुटपाथ का रहना
अमीरों का घर है, गरिबों का गहना।
देखों शहर कलकत्ते का रैन वसेरा,
धुँआं देती गाड़ी, जलती ये राहें,
इंसानों की यहाँ चिता सज गई है,
ये वादे-इरादे, ये रिश्ते और नाते,
सभी कुछ है पर आधे-आधे।
अधिकारों का यह सब झूठा आडम्बर,
बँटता है खूनी रोजगार यहाँ पर;
देखो शहर कलकत्ते का रैन वसेरा,
अमीरों का घर है, गरिबों का गहना।
-शम्भु चौधरी