सोमवार, 6 जून 2011

सत्याग्रह की नई व्याख्या अन्ना हजारे लिखेगें - शम्भु चौधरी, कोलकाता


अपनी बातः कांग्रेसी चरित्र
कोलकाताः 7 जून 2011;
देश की आजादी से लेकर आज तक कांग्रसी लोगों का एक ही चरित्र सामने उभर कर आया है। पहले नेहरु जी, बापूजी को गुमराह किया करते थे आज सारे के सारे कांग्रसी देश को गुमराह करने के फिराक में लगे रहते हैं। इनके पास तीन प्रमुख हथियार है।
1. सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम,
2. लोकपाल बिल व भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र की कल्पना एवं
3. नई-नई व्याख्या करना।

1. सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम:
सोनियाजी या गांधी परिवार का नाम किसी दूसरे के मुंह से सुनना या उनके नाम पर की जाने वाली किसी भी टिप्पणियों पर तत्काल आपे से बहार आकर सबके सब यह दिखाने का अवसर तलाशते रहते हैं कि कैसे वे भी कांग्रेसी दरबार के विश्वास पात्र बन जाये। स्व. सीताराम केसरी, बापू जगजीवन राम और अब हमारे प्रियतम प्रधानमंत्री श्री श्री 420 मनमोहन सिंह जी की कड़ी बनने की ताक में सभी के सभी कतार लगाये खड़े हैं। कब किसका नम्बर आ जाये? बेचारे प्रणब दा इस फिराक में दो बार फिसल चुके हैं। एकबार तो इनको कांग्रेस तक छोड़ना पड़ा, बाद में कहीं दाल न गली तो वापस उसी कचरे के डब्बे में जाकर शामिल हो गये। अब तो उनको नम्बर2 से ही संतोष करना पड़ता है। चुंकि इस बीच कई दूसरे 1नम्बर में स्थान प्राप्त कर लिए। शरद पवार की गर्त आपके सामने है। यह तो रहा कांगे्रसी नेताओं की नौकरी का सवाल। अब देखिये इनके प्रांतीय नेताओं के हाल- बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बंगाल, उडीसा एवम् महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों की हालत। सारे के सारे प्रान्तीय नेताओं के पर कुतर-कुतर कर इन प्रान्तों को दूसरे राजनैतिक दल या खुद के दल से टूटे हुए नेताओं के सहारे किसी प्रकार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाये रखने में लगे हैं। अभी बंगाल में ही देखिये एक समय ममता दीदी को प्रणब दा एण्ड पार्टी ने कांग्रेस से बहार निकाल फेंक, बामपंथियों का हाथ थामे बंगाल का 35 साल तक बंटाधार करते रहने वाले श्रीमान् महोदय को ममता दीदी ने एक बार कह दिया सो कह दिया लेना हो तो लो नहीं तो जाओ। झक मरवाकर इनको ममता दीदी से समझौता करना पड़ा। ठीक ऐसी ही हालात कम व वैसी अन्य प्रान्तों की हो चुकी है। अब तो इस डूबती नैया को सहारा मात्र सांप्रदायिकता की आड़ में एक धर्म विशेष को बार-बार याद करना इनका मुख्य और एक मात्र एजेन्डा बचा गया है।
अब इनके दूसरे चरित्र को देखें-
2. लोकपाल बिल व भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र की कल्पनाः
श्री अन्ना हजारे एवं उनके सहयोगियों द्वारा बनाये जा रहे लोकपाल बिल को किसी तरह एक तरफा बिल बनाकर देश को थोपने की रणनीति के तहत कांग्रेसी शातिर दिमाग के धनी श्री कपिल सिब्बल साहेब ने पहले बाबा रामदेव को उकसाया, उन्हें सर पर बैठाया। फिर देखे कि यह बन्दर तो पेड़ से नीचे ही नहीं उतर रहा तो पेड़ को ही रातों रात काट डाला। यह एक सोची समझी साजिश का एक हिस्सा है। सरकार की मंशा कभी भी भ्रष्टाचारियों को सजा देना है ही नहीं, सरकार उनको बचाने के उपाय इस बिल के माध्यम से लाने का प्रयास कर रही है। कल की लोकपाल बिल विधयेक की बैठक में जब ‘समाज’ ने भाग न लेने का फैसला कर लिया तो सरकार ने एक तरफा बैठक कर अपने निर्णय सुना दिये। सरकार को पता है कि यह जो समिति के नाम का जो नाटक उसने रचा है उसके क्या परिणाम निकलने वाले हैं। इस बिल के एक हिस्से पर ‘समाज’ के सदस्यों के विरोध को देखते हुए ही शातिर दिमागी श्री सिब्बल जी ने बाबा रामदेव जी सामने खड़ा कर उनसे एक बयान दिलवाया था कि प्रधानमंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को लोकपाल बिल से अलग रखा जाए। इस बात को लेकर श्री अरविन्द केजरीवाल नाराज भी हुए एवं कहा कि हम बाबा रामदेव जी से बात करेगें। परन्तु तब बाबा रामदेव जी को राजनीति के शातिरों की चालाकी नहीं समझ में आ रही थी। खर! अब बाबा के साथ जो हुआ इसे हम किसी भी दृष्टि से जायज नहीं ठहरा सकते। लोकतंत्र में राजनीति चालें जब तक चली जाती है तब तक जनता लाचार होती है परन्तु जब प्रशासनिक हथियार जब सरकार उठा लेती है तो जनता उसका जबाब देकर रहती है। कांग्रेस अब इसे राजनैतिक रंग देने के लिए कहना शुरू कर दिया कि बाबा रामदेव के पीछे भाजपा एवं संघ के लोग हैं। यह बात कांग्रेस को पाँच दिन पहले नहीं दिखाई दे रही थी क्या? आज अचानक से उन्हें वोट बैंक की राजनीति शुरू करनी पड़ गई। कांग्रेस का यह दूसरा और सबसे खतरनाक कार्ड होता है मुसलमानों को डराना एवं उनके वोट को अपनी झौली में बनाये रखना। यही कारण है जब भी इनको अवसर मिलता है वे हर मुद्दे को सांप्रदायिकाता से जोड़ने का प्रयास करते हैं। अब जरा आप ही सोचिये यह जो विदेशों में कालाधन एवम् देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से सांप्रदायिकता या मकपा, भापका, भाजपा, धर्म-जाति से क्या लेना? हां है लेना-देना है। कांग्रेस की सत्ता इस एक बिल से भारत से समाप्त हो जायेगी। भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना मात्र से कांग्रेस का इस जमीन से सफाया हो जायेगा। भला आप भी कल्पना किजियेगा। हां! एक बात और कल माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को दिल्ली के रामलीला मैदान में आधी रात को सोते हुए सत्याग्रहियों पर लाठियों की बरसात एवं अंश्रू गैस छोड़े जाने की घटना पर संज्ञान लेते हुए नोटीस जारी की है। कांग्रेसीगण जरा यह बतायेगें कि यह सुप्रीम कोर्ट कौन सी पार्टी के सदस्य हैं?
इनका तीसरा चरित्र-
3. नई-नई व्याख्या करनाः
कांग्रेसियों ने अपने तरह से सत्याग्रह के नये तरिके से मापदण्ड तय करने का प्रयास किया जैसे कांग्रेसियों के अलावा किसी ने आन्दोलन किया ही नहीं हो। बल्कि कांग्रेसियों ने तो सिर्फ सत्याग्रह के नाम पर अपनी रोटी सैंकी है। सिर्फ भारत की ही बात करें तो गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन के बाद कोई भी कांगे्रसी ने कभी भी कोई सत्याग्रह किया ही नहीं। न तो आजादी के पहले का कोई इतिहास है ना ही आजादी के बाद का। जो भी आन्दोलन या सत्याग्रह हुए हैं वे सभी गांधीजी के समय के हैं। इसके बाद केवल लाश बेचने, सांप्रदायिकता भड़काने, मुसलमानों को डराने व उनको एकत्रित कर उनके वोट पर सत्ता प्राप्त कर उनका कभी भी विकास न करना और नेहरु परिवार के इर्दगिर्द चक्कर लगाते हुए अपनी राजनीति धरातल को बनाये रखना यही कांग्रसियों का कुल मिलाकर इतिहास रहा है। कांग्रेसियों की व्याख्या से अब भारत का निर्माण नहीं किया जायेगा। सत्याग्रह की नई व्याख्या अब अन्ना हजारे लिखेगें। जयहिन्द! वन्देमातरम्!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें