रविवार, 14 जुलाई 2013

कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई-शम्भु चौधरी

कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं?
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा एक समाचार एजेन्सी को दिए गये बयान ‘‘कुत्ते के बच्चे वाली टिप्पणी’’ पर देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने जो हंगामा खड़ा किया इससे ऐसा प्रतित होता है कि ये राजनैतिक दल अपने स्वार्थ व वोट बैंक के लिए देश में सांप्रदायिक सदभावनाओं के साथ हमेशा सौदाबाजी करती रही है या करने का कोई अवसर नहीं चुकना चाहती। जिस बयान से श्री नरेन्द्र मोदी गोधरा के प्रतिफल में हुए गुजरात दंगों के दर्द के मानवीय पक्ष को अहसास कराने के प्रयास कर रहे थे, उसी बयान को इन धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कुछ इस प्रकार प्रचारित कर देश के मुसलमानों को बहकाने का प्रयास शुरू कर दिया । इनकी सोच अभी भी उसी जमाने में चल रही है कि वे एक झूठ को सौ बार कहेगें तो सभी को वही सच नजर आयेगा। जबकी वे यह नहीं जानते कि अब मुसलमान समाज भी आधुनिक हो चुका है। वे भी इन्टरनेट के माध्यम से उनके बयान या टिप्पणी को पढ़ सकते हैं और उसका अर्थ निकाल सकते हैं। जिसका अर्थ तथाकथित सांप्रदायिक धर्मनिरपेक्ष दलों ने निकाल कर देश की जनता को समझाना कर प्रयास किया। जिसप्रकार इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों को बहकाने का प्रयास कर देश की सांप्रदायिक सदभावनाओं में जह़र घोलने का प्रयास किया है, इस बात को जगजाहिर करती है कि इनका उद्देश्य सीधे तौर पर मुसलमानों को बरगलाना है। कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं? दरअसल मुसलमानों का वोट बैंक नोचने-खसोटने में लगी तथाकथित राजनैतिक दल खुद ही कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ रहे हैं। हर दल यह साबित करने में लगा है कि वे ही मुसलमानों का भला कर सकते हैं। मुसलमानों के वोट बैंक को एकतरफा पाने के जिस सेक्लुरिजम की बात ये लोग करते हैं। उससे आजतक मुसलमानों का भला नहीं कर सके। खुद को धर्मनिरपेक्ष और दूसरे को सांप्रदयिक मानने वाले दलों की इस देश में बाढ़ आ गई है। अब तो हालात कुछ इस प्रकार हो चुके हैं कि एक दल दूसरे दल से आगे बढ़कर मुसलमानों का हमदर्द बनने इस कदर प्रयास करता है कि वह यह भी भूल जाता है कि उसे कब और कहाँ क्या कहना चाहिए, कहना चाहिए कि नहीं? यह भी भूल जाते हैं। मानों देश के अन्दर मुसलमानों के वोटों को पाने के लिए सेक्लुरिजम दलों की आपस में ही कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई चल रही हो। - शम्भु चौधरी

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