बुधवार, 15 दिसंबर 2010

आपां तो लड़की वाला ठहरा - शम्भु चौधरी


Shambhu Choudhary
     यह बात सही है कि मारवाड़ी समाज के एक वर्ग ने काफी धन अर्जित किया, संग्रहित किया, संचित भी किया, इसका उपयोग किया तो दुरुपयोग भी। सामाजिक कार्यों मेँ जी जान से खर्च किया तो शादी-ब्याहों में इसका आडम्बर करने से भी नहीं चुका। धार्मिक कार्यों या आयोजनों मेँ धन को समर्पित किया तो खुद को पूजवाने भी लगे। समाज सेवा की तो, सेवा को बदनाम कर समाज सेवक कहलाने की एक मुहिम भी चली। कोई खुद को चाँदी में तुलवाने को सही ठहराता है, तो कोई भागवत कथा के नाम पर लाखों का खर्च को। एक दूसरे को शिक्षा देने में किसी से कोई कम नहीं। एक लाखों का विज्ञापन छपवाकर समाज को शिक्षा दे रहा है, तो दूसरा इस तर्क से कि धन उनका है वे उसको कैसे भी लुटाये। वाह भाई! वाह! कमाल का यह समाज। इस समाज का कोई सानी नहीं। कौन किसकी परवाह करता है। सभी अपने मन के मालिक हैं भला हो भी क्यों नहीं धन जो कमा लिया है बेशुमार दौलत का मालिक जो बन गया है यह समाज। मानो लक्ष्मी से लक्ष्मी की हत्या का अधिकार मिल गया हो इस समाज को। मारवाड़ी समाज की एक सबसे बड़ीं ख़ासियत यह भी है कि इस समाज को किसी भी प्रान्त के साहित्य-संस्कृति-भाषा-कला या उनके रहन-सहन, खान-पान (यहाँ तक की राजस्थान से भी) आदि से कोई लगाव नहीं सिर्फ और सिर्फ अपनी जीभिया स्वाद और पैसे का अहंकार इनको नीमतल्ला घाट तक पीछा नहीं छोड़ता।


     परन्तु इस नालायकी के लिये सारा समाज न तो दोषी है ना ही हमें समझना ही चाहिये। समाज का समृद्ध परिवार आज भी धन के इस तरह के दुरुपयोग से कोशों दूर है, यह जो भी गंदगी और धन के नंगे प्रदर्शन मे लगे लोग हैं वे या तो नाजायज तरीके से अर्जित धन को खर्च कर अपनी मानसिक विकलांगता को समाज के सामने परोस रहें हैं या फिर गांव का धन है जिसे वे खुले हाथ लूटा रहें हैं। संपन्न वर्ग और समृद्ध परिवार कभी भी अपनी दरिद्रता का प्रदर्शन नहीं करेंगे, इस तरह धन की बर्बादी को जो लोग उचित ठहराते हैं वे न सिर्फ दरिद्र ही हैं ऐसे लोग विकलांग भी हैं। मानो संपन्नता की आड़ में खुद के साथ-साथ समाज की दरिद्रता का प्रदर्शन करता हो, जिससे समाज का हर वर्ग न सिर्फ दुखी है, लाचार भी हो चुका है। कुछ लोग तो आडम्बर को समाज की जरूरत मानते हैं। कहते हैं नहीं तो समाज उसे दिवालिया समझेगा, अब इस दिवालियापन का क्या इलाज?


     अपने अर्जित धन को खुद के बच्चों के ब्याह-शादियों में खर्च करने का समाज को पूरा अधिकार है, करना भी चाहिये, इसके लिये गली मत बनाई.. शान से खर्च कीजिए पर साथ-साथ कुछ नेक उदाहरण भी देते जाईये जिससे समाज को लगे कि आप सच में धनवान हो। धन से ही नहीं मन से भी धनवान हो। झूठी दलीलों की धरातल पर खुद के दिवालियेपन को समाज पर थोपकर, कोई लड़के वाले का नाम लेता है तो कोई लड़की वाले का। " भाई कै करां आपां तो लड़की वाला ठहरा या भाई लड़की वाला ने कोई दवाब कोनी देवां अब वे अपनी मर्जी से खर्च करे तो आंपा कै कर सकां हाँ!" ये दलीलें खुद की नपुंशकता को छुपाने वाली बात है।


     हमेशा से मैं इस बात का समर्थक रहा हूँ कि उत्सव के अवसर को उत्साह के साथ मनाये इसका यह अर्थ नहीं कि फ़िज़ूलखर्ची करें। जरूरत के अनुसार सजावट करें व परिवार-मित्रों के साथ उत्साह के साथ उत्सव मनायें भीड़ एकठी न करें। इन दिनों ब्याह-शादियों में लोग आडम्बर तो करते ही हैं साथ-साथ इस आडम्बर को दिखाने के लिये वेबजह हजारों लोगों को जमा कर लेते हैं। पता नहीं खाने के नाम पर लोग जमा भी कैसे हो जाते हैं- कहते हैं भाई "चेहरो तो दिखाणो ही पड़सी" जैसे किसी मातम में जाना जरूरी हो। पिछले सालों में इसका प्रचलन तेजी से हुआ है। शहरों में एक-एक आदमी ३-४ ब्याह के कार्ड हाथ में लिये शादीबाडी़ खोजते नजर आ जातें हैं। गाँव में आज भी ऐसी स्थिति नहीं हुई है। गाँवों में शादी-ब्याह के नियम-कायदे लोग मानते हैं। इनमें आज भी समाज का भय बना रहता है। परन्तु शहरों में खासकर महानगरों में कोई किसी की नहीं सुनने को तैयार।


     इसी प्रकार भागवत भी बंचवाईये, इसके लिये जरूरी धन की व्यवस्था भी करे परन्तु जो भागवत आप क्रूज जहाज़ में सुनने जा रहें हैं वो भागवत कथा को बदनाम ही करता है, जो महंत इस तरह धन के लालच में भागवत कथा को बेचने की दुकान खोल लिये हैं वे हिन्दू धर्म का विनाश करने में लगे हैं, मेरा उनसे आग्रह रहेगा कि धर्म को कभी भी किसी भी रूप में कैद करने वाले ऐसे तत्वों को पनाह न देवें। मारवाड़ी समाज यदि इसके लिये गुणाहगार है तो उसे सम्मानित न होने देवें और अपनी विद्या को धर्म के प्रति समर्पित करे न कि धन के प्रति।


नववर्ष आपका मंगलमय हो, इसी शुभकामनाओं के साथ।

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