शनिवार, 15 नवंबर 2008

डॉ.विजय बहादुर सिंह की कुछ कविताएँ:


डॉ. विजय बहादुर सिंह का परिचय:


प्रख्यात आलोचक और कवि डॉ.विजय बहादुर सिंह ने हाल में ही भारतीय भाषा परिषद में निदेशक के पद का कार्यभार सम्भाला है। 'नागार्जुना का रचना संसार', 'नागार्जुन संवाद', 'कविता और संवेदना', 'समकालीनों की नज़र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल', 'उपन्यास: समय और संवेदना, महादेवी के काव्य का नेपथ्य आदि आलोचना पुस्तकें तथा मौसम की चिट्ठी, पतझड़ की बांसुरी, पृथ्वी का प्रेमगीत, शब्द जिन्हें भूल गयी भाषा तथा 'भीम बेटका' काव्य कृतियां प्रकाशित। भवानी प्रसाद मिश्र, दुष्यंत कुमार और आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की ग्रंथावलियों का संपादन। आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की जीवनी 'अलोचक का स्वदेश' एवं शिक्षा और समाज सम्बंधी कृतियां ' आओ खोजें एक गुरु' और 'आजादी के बाद के लोग' प्रकाशित।


1. सच:


सच, सच की तरह था
झूठ भी था झूठ की तरह
फिर भी
मिलते जुलते थे दोनों के चेहरे
समझौता था परस्पर
थी गहरी समझदारी
राह निकाला करते थे
एक दूसरे की मिलकर
सच की भी अपनी दुकानदारियां थीं
मुनाफे थे झूठ के भी अपने
सच, सच की तरह था।


2. विश्वास


विश्वास
एक ऐसी खूंटी है
जिस पर टंगे हैं सबके कपड़े
उसके भी
जो विश्वासघाती है।


3. बरसों बाद


बरसों बाद बैठे हम इतने करीब
बरसों बाद फूटी आत्मा से
वही जानी-पहचानी सुवास
बरसों बाद हुए हम
धरती हवा आग पानी
आकाश...


4.क्षितिज


क्षितिज पर
छाई हुई है धूल
उदास धुन की तरह
बज रही है खामोशी...

सांस की तरह आ-जा रही है
वो मेरे फेफड़ों में
धड़क भी तो रहा हूं मैं
ठीक दिल की तरह...


5. अनकिया


अनकिया
गया नहीं किया
हूं
जितना कर गयीं तुम


6. पतझर


पतझर
लटका हुआ है पेड से
पेड़ की चुप्पी तो देखिये
देखिये उसका धीरज


7.इतनी खास हो तुम


करीब मेरे मगर खुद के आस-पास हो तुम
लहकती बुझाती हुई आग की उजास हो तुम
चहकते गाते परिन्दे की तुम खामोशी हो
खिली सुबह की तरह शाम सी उदासी हो तुम
हजार चुप से घिरी हलचलों के घेरे में
रूकी रूकी-सी हिचकती सी कोई सांस हो तुम
बने नहीं कि टूट जाय एक बुत जैसे
इतनी आम इतनी खास हो तुम।

1 टिप्पणी:

  1. करीब मेरे मगर खुद के आस-पास हो तुम
    लहकती बुझाती हुई आग की उजास हो तुम
    चहकते गाते परिन्दे की तुम खामोशी हो
    खिली सुबह की तरह शाम सी उदासी हो तुम
    हजार चुप से घिरी हलचलों के घेरे में
    रूकी रूकी-सी हिचकती सी कोई सांस हो तुम
    बने नहीं कि टूट जाय एक बुत जैसे
    इतनी आम इतनी खास हो तुम।
    " bhut acchee lgee ye poem.... very heart touching"
    regards

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