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मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सेकुलरिज्म बनाम देश की सुरक्षा - शम्भु चौधरी

देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। जो लोग ऐसा सोचते हैं कि इससे उनको चुनावों में फायदा हो सकता है से भी स्पष्ट हो जाता है कि देश में पकिस्तानियों की संख्या भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बनती जा रही है। अर्थात सेकुलरवादी राजनेता देश की सुरक्षा के सौदागर बन चुके हैं।

जबसे भारतीय संविधान में सेकुलर शब्द को अंकित किया गया है तब से देश के भीतर पाकिस्तानी समर्थकों का मनोबल इतना ऊँचा हो गया है कि देश की सुरक्षा को भी खतरा मंडराने लगा है। पाकिस्तानी समर्थकों से आप जो भी अर्थ लगायें वह आपकी सोच हो सकती है। जहां तक मेरा मानना है कि जो लोग भारतीयता को नहीं स्वीकारते, भारतीय संस्कृति को अपनाने में जिनको अड़चनें आती हों। भारतीय सैनिकों की बलि पर जो लोग संसद के भीतर और बहार देश को गुमराह करते हों, जो लोग पकिस्तानियों को दोष मुक्त करार देने में जरा भी संकोच नहीं करते, भारतीय क्षेत्र में रहकर भारत के विरूद्ध साजिश करने में सहयोग प्रदान करना, आतंकवादियों व उन से जुड़ी घटनाओं की वकालत करना व देश की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ कर उन्हें भारतीय राजनीति का हिस्सा बनाना या बनाने का प्रयास करना यह सभी कारनामे देशद्रोही की श्रेणी में आते हैं। और इसके लिए खुद को सेकुलरवादी बताने वाले लोग ही जिम्मेदार हैं । यही सेकुलरवादी ना सिर्फ आतंकी घटनाओं के लिए देश में जगह-जगह होने वाले दंगों के लिए भी जिम्मेदार हैं।

इन दिनों देश की संसद व विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं में कुछ ऐसे तत्वों की भरमार सी हो चुकी है जो सेकुलरिजम के बहाने देश की सुरक्षा के खिलाफ न सिर्फ सार्वजनिक बयान देते पाये जाते हैं इन लोगों ने देश के सैनिकों के मनोबल को भी कमजोर करने का प्रयास किया है। इन सबके बीच देश का लोकतंत्र तमाशबीन बनकर रह गया। इस बात को लेकर भी हम आश्चर्यचकित हैं कि आखिर में हमारे सेकुलरवादी विचारधारा के झंडावाज नेतागण देश को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। इनका जमीर इस कदर समाप्त हो चुका कि ये लोग सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की सुरक्षा तक को भी दाव में लगाने से बाज नहीं आते।

ऐसे नेताओं के विरूद्ध देशद्रोह का मामला बनाया जाना चाहिए जिससे इस तरह के बयानों से जिससे देश की सुरक्षा को खतरा बनता हो पर लगाम लगाया जा सके। देश के सैनिकों का अपमान या देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का नाम सेकुलर नहीं हो सकता। इससे उनको चुनावों में किसी विशेष समुदाय के वोटों का फायदा तो हो सकता है परन्तु कालान्तर में यही फायदा देश की संप्रभुता के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। जो लोग ऐसा सोचते हैं उनकी इन हरकतों से उनको या उनके दल का राजनीति फायदा होता है वे लोग देश के इतिहास को उठाकर देख लें कि इसके क्या परिणाम सामने हमें देखने को मिल रहें हैं। जैसे-जैसे सत्ता पर सांप्रदायिक ताकतों का पल्ला मजबूत होता जा रहा है देश में उतने ही तेजी से सांप्रदायिक तनाव फैलता जा रहा है। अब तो कई जगह खुले रूप में देश के विरूद्ध जहर तक उगलने लगे हैं।

यहाँ यह सवाल नहीं है कि किसी संप्रदाय या दल विशेष की बात हो या उनकी नीतियों को दोषी ठहराया जाए। सवाल है कि हम इन मुद्दों को लेकर देश को किस जगह ले जाने का प्रयास कर रहें हैं इससे किसको फायदा होने वाला है। जो लोग भारतीयता को स्वीकार नहीं कर पा रहे उनको हम भारतीय राजनीति में जगह देकर ना सिर्फ खुद को कमजोर करने का प्रयास कर रहें हैं अन्ततः इसका परिणाम सभी राजनैतिक दलों को झेलना पड़ सकता हैं । उस समय आज कि इस राजनीति के परिणाम कितने घातक होगें इसकी कल्पना मात्र से देश की रूह कांप जाऐगी। सभी राजनीति दलों को इस सेकुलरवादी विचारधारा के परिणामों पर ना सिर्फ पुनः सोचने की जरूरत है। भारतीय राजनीति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता को प्राप्त करना नहीं, भारतीय संस्कृति की रक्षा भी होना जरूरी है। ताकी सभी धर्म के लोग आपसी भाई-चारे के साथ रह कर अपने-अपने समाज का विकास कर सकें।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।

सोमवार, 12 अगस्त 2013

नपुंसक बनता जा रहा धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत- - शम्भु चौधरी

सत्ता को बचाये रखना या सत्ता प्राप्त करने के लिए हम इस तरह के सांप्रदायिक हमलों को कबतक सहते रहेगें? किश्तवाड़ में पाक प्रयोजित इस सांप्रदायिक हमले की हमें एकजुट होकर विरोध करने की जरूरत है ना कि हर बात में गुजरात दंगों या अन्य घटनाओं से जोड़कर उनके मनोबल को मजबूती प्रदान करने की। देश की संसद, देश के सांसदों , राजनेताओं को खुलकर इस घटना का विरोध करना चाहिय। जिसप्रकार ये लोग एकजुट होकर गुजरात पर हमला करते नहीं थकते, काश! यही राजनेताओं के मुंह किश्तवाड़ के सांप्रदायिक हमले की गुंज सुनाई देती तो हम कुछ हद तक उनको धर्मनिरपेक्ष मान लेते, पर इनको देश से ज्यादा बोट बैंक की चिन्ता नजर आती है। तब यह प्रश्न जरूर उठता है कि हिन्दुओं की सुरक्षा कौन करेगा और जो हिन्दुओं के सुरक्षा की बात करेगा या करना चाहेगा क्या वह सांप्रदायिक बन जायेगा?

किश्तवाड़ में पिछले तीन दिनों जिसप्रकार एक विशेष समुदाय के लोगों को मौत के घाट सुलाया गया। यह इस बात की तरफ हमें सोचने को विवश करता है कि धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनने वाले लोगों की चुप्पी, ऐसा लगता है कि किसी विशेष समुदाय के देशद्रोही व सांप्रदायिक हरकतों के विरूद्ध ना बोलना इनकी लाचारी सी बन गई है। पाकिस्तानी हमारी सीमाओं आकर हमारे सैनिकों को मौत के घाट सुला जाता हैं। और हमारे देश की तथाकथित राजनैतिक पार्टियां कुछ इसप्रकार का सफाई देती नजर आती है कि जैसे वे भारत के नहीं पाकिस्तान की तरफ से बयान दे रहें हों । हर जगह वोटबैंक एक तमाशा हो गया हैं। देश की सुरक्षा से भी अब ये लोग समझौता करने में नहीं हिचकचाते। किस बेशर्मी के साथ संसद में एक ही बयान को तीन-तीन बार देकर देश को गुमराह करने का प्रयास ये किस साजिश का हिस्सा है इनके पीछे कौन से लोग शामिल थे उनके नकाब को उतारना जरूरी हो गया है। मुझे तो इस बात का दर्द हो रहा है देश के पत्रकार व बुद्धिजीवी वर्ग भी अपनी कलम को इस अंधकार में धकेल चुके हैं। मानो देश की सुरक्षा धर्मनिरपेंक्षता के सामने नपुंसक सी बन चुकी है।

आतंकवादी हमारे देश की संसद पर हमला करते हैं हम उनका पक्ष लेते नहीं थकते। पाकिस्तान हमारे जवानों का सर काट ले जाते हैं हम चुपचाप सह लेते हैं। पाकिस्तानी सीमाओं पर रात के अंधरे में हमारे जवानों को भूनकर चले जाते हैं हमारा विदेश व गृह मंत्रालय संयुक्त रूप से पाकिस्तान को बचाने की हरकतें करता है। कुल मिलाकर हमें यह मान लेना होगा कि धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर पाकिस्तानी समर्थकों ने हमारे देश पर एक प्रकार से सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिज्ञ हमला सा कर दिया है। और हम एक दूसरे को नीचा दिखाने में या अपनी सत्ता पर बचाने में लगे हैं।

जब कुछ लोग देश के भीतर हिन्दू सांप्रदायिकता का सवाल उठाते हैं तो उनको मुस्लिम सांप्रदायिकता के विरूद्ध बोलने में किस बात का डर सताता है? सांप्रदायिकता तो दोनों ही है। पर हमारे धर्मनिरपेक्षता के विद्वानों को हिन्दू सांप्रदायिकता से देश के टूटने व सांप्रदायिक दंगों का तो खतरा नजर आता है पर वहीं जब को मुस्लिम सांप्रदायिकता की बात या देश के विरूद्ध उठती हुई आवाज के तब इन राजनेताओं को देश पर कोई खतरा नहीं मंडराता नजर आता।

इस बात पर एक बात तो माननी ही होगी कि देश का मुसलमान एक साथ है। चुकीं जब ओबामा को पत्र लिखने की बात सामने आती है तो उस पत्र पर देश के अधिकांशतः मुस्लिम सांसदों और विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किये थे। ये संकेत को देश भले ही आज ना भांप पा रहा हो। इसके परिणाम भविष्य में घातक सिद्ध होगें। किसी समुदाय के विरूद्ध हमें नहीं सोचना चाहिये यह बात सही है कि हर समुदाय में अच्छे-बुरे लोग होते हैं पर यहां तो उस जमात का एक बड़ा हिस्सा ही देश के विरूद्ध साजिश में लगा चुका है। पाक प्रायोजित षडयंत्र को हम अनदेखा करते हुए किसी विशेष समुदाय के बोट बैंक पाने या खुद को सत्ता में बनाये रखने के लिए उनका राजनैतिक प्रयोग करना एक प्रकार से देश के साथ गद्दारी देश के संविधान की आड़ में पाक प्रायोजित आतंकवाद को संरक्षण देना है।

सत्ता को बचाये रखना या सत्ता प्राप्त करने के लिए हम इस तरह के सांप्रदायिक हमलों को कबतक सहते रहेगें? किश्तवाड़ में पाक प्रयोजित इस सांप्रदायिक हमले की हमें एकजुट होकर विरोध करने की जरूरत है ना कि हर बात में गुजरात दंगों या अन्य घटनाओं से जोड़कर उनके मनोबल को मजबूती प्रदान करने की। देश की संसद, देश के सांसदों , राजनेताओं को खुलकर इस घटना का विरोध करना चाहिय। जिसप्रकार ये लोग एकजुट होकर गुजरात पर हमला करते नहीं थकते, काश! यही राजनेताओं के मुंह किश्तवाड़ के सांप्रदायिक हमले की गुंज सुनाई देती तो हम कुछ हद तक उनको धर्मनिरपेक्ष मान लेते, पर इनको देश से ज्यादा बोट बैंक की चिन्ता नजर आती है। तब यह प्रश्न जरूर उठता है कि हिन्दुओं की सुरक्षा कौन करेगा और जो हिन्दुओं के सुरक्षा की बात करेगा या करना चाहेगा क्या वह सांप्रदायिक बन जायेगा?

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

भारतीय धर्मनिरपेक्षता - शम्भु चौधरी

जबतक भारतीय संस्कृति इस देश में कायम रहेगी तभी तक धर्मनिरपेक्षता इस देश में जीवित रह सकेगी, यही अंतिम सत्य है। जो लोग वोट बैंक की राजनीति करते हैं वे वोट बैंक की राजनीति करें पर साथ ही वे इस बात का भी ध्यान रखें कि भारतीय संस्कृति को चोट पंहुचाने वाले तत्वों से सत्ता को कैसे दूर रखा जाए। जो लोग भारतीय संस्कृति को भी नूकसान पंहुचाकर अपनी राजनीति स्वार्थ की पूर्ति में लगे हैं वे लोग कहीं भूल से ही सही भारत की संप्रभूता के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे? यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो उनको सावधान होने की जरूरत है।

पिछले एक दशक से भारत में धर्मनिरपेक्षता को लेकर लोगों के मन में शंकाएं होने लगी है कि जिसप्रकार देश के विभिन्न राजनैतिक दलों में एक विशेष सांप्रदाय के वोट बैंक को लेकर राजनीति की जा रही है कहीं आगे चलकर यही राजनीति देश की संप्रभूता के लिए घातक ना साबित हो जाए। भारतीय संविधान में सभी धर्मावलंबी को समान अधिकार दिया गया है ताकि वे अपने धर्मानुसार अपने धर्म व संस्कृति की रक्षा करते हुए भारतीय भौगोलिक सीमा के अन्दर एक अच्छे नागरिक बनकर अपना जीवन यापन कर सकें। अर्थात जिन लोगों को भारतीय संविधान में विश्वास है उनको भारतीय संस्कृति में भी आस्था रखनी चाहिए चुंकि भारतीय संस्कृति ने जिस धर्मनिरपेक्षता की संरचना की है यदि हम उसकी भावना को ही समाप्त कर देगें तो इस संविधान की संरचना ही गलत हो जाएगी।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजनीति दल के एक प्रवक्ता ने इस बात की पूरजोर वकालत की कि भारत में ‘सेक्लुरिजम’ पर बहस हो जानी चाहिए। हाँ ! मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ कि इस बात पर देश में बहस होनी ही चाहिए ताकि आज की नई पीढ़ी को पता चल सके कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या है?’’ जिस प्रकार इन दिनों इसकी परिभाषा व्यक्त की जा रही है क्या वास्तव में यही धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप होना चाहिए हमें इस बात पर भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। इससे पहले की हम धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या हो पर चर्चा करें, हमें इसके उन पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए कि विश्वभर में भारतीय संस्कृति ही इस व्यवस्था की जनक मानी जाती है। जबकि अन्य धर्म या संस्कृति इस व्यवस्था को सिरे से नकारती रही है। भारत में जो मुसलमान धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर खुद को भारतीय समझते हैं वही मुसलमान कश्मीर में हिन्दुओं के प्रति ना सिर्फ भेदभाव उनको विस्थापित करते समय मौन धारन कर लेते हैं । जो लोग देश की एकता व अखंडता के प्रति अपना दोहरा मापदंड रखते हैं वैसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते नजर आते हैं। जो लोग भारतीय संस्कृति को मटियामेट करने में आमदा हैं वैसे ही लोग धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राजनीति का एक हथकंडा मानते हैं। इसके विपरीत जो लोग देश की एकता व अखंडता की रक्षा करना चाहते हैं वैसे लोग हमें सिर्फ इसलिए सांप्रदायिक नजर आतें हैं चुकि उसमें भारतीयता की खुशबू महकती है। जबकि धर्मनिरपेक्षता को जो लोग वोट बैंक का जरिया बना चुके हैं उनमें भारतीयता के प्रति संवेदना उस समय समाप्त नजर आती है जब उनको लगने लगता है कि उनके बयान से एक विशेष संप्रदायवर्ग नाराज हो सकता है। इसलिए वे गाहे-बगाहे हमेशा इस बात को ध्यान में रखते हैं कि उनके वोट बैंक को कोई क्षति न हो सके।

जब हम धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा पर विचार करते हैं तो हमें देश के विभाजन के पूर्व और बाद की स्थिति पर भी विचार करना होगा। जब देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ तो यह तय किया गया कि भारत में बचे हुए मुसलमान चुंकि वे अब देश में अल्पसंख्यक हो चुके हैं उनके जान-माल की सुरक्षा हमें देना हमारा फर्ज बनता है । जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कोई भी ऐसा प्रस्ताव ग्रहित नहीं किया गया। अर्थात इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति जहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास करती नजर आती है वहीं पकिस्तानी संस्कृति में अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। जिसके आंकड़े परिणाम सहित भी हमारे सामने है।

खैर! इस बहस को हम उस दिशा में नहीं ले जाना चाहते। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संस्कृति की देन है। और जबतक भारतीय संस्कृति इस देश में कायम रहेगी तभी तक धर्मनिरपेक्षता इस देश में जीवित रह सकेगी, यही अंतिम सत्य है। जो लोग वोट बैंक की राजनीति करते हैं वे वोट बैंक की राजनीति करें पर साथ ही वे इस बात का भी ध्यान रखें कि भारतीय संस्कृति को चोट पंहुचाने वाले तत्वों से सत्ता को कैसे दूर रखा जाए। जो लोग भारतीय संस्कृति को भी नुकसान पंहुचाकर अपनी राजनीति स्वार्थ की पूर्ति में लगे हैं वे लोग कहीं भूल से ही सही भारत की संप्रभूता के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे? यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो उनको सावधान होने की जरूरत है। भारतीय संस्कृति जबतक जीवित रहेगी तभीतक इस देश में सभी धर्म के लोग भाईचारे के साथ रह सकेगें। अर्थात धर्मनिरपेक्षता के मूल तत्व में भारतीय संस्कृति छिपी हुई है जो हिन्दूधर्म के विशाल हृदय का सूचक माना सकता है ना कि संकीर्ण मानसिकता का ।जो लोग धर्मनिरपेक्षता को वोटबैंक की राजनीति से जोड़कर देखने का प्रयास कर रहें हैं वे अंततः उस सांप्रदाय को भले ही अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए पक्ष में कर ले, इसके दूरगामी राजनीति परिणाम देश की संप्रभूता को क्षति करने की दिशा में एक कदम ही माना जाएगा।

-लेखक एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व चिंतक हैं। Date: 08/08/2013

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

सांप्रदायिकता की आग - शम्भु चौधरी

कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री श्री मनीष तिवारी ने ‘‘देश में सांप्रदायिकता का जबाब देने की भरपूर वकालत की। उन्हों ने ‘धर्मनिरपेक्षता के एजेंडा’’ को आगे बढ़ाने की जोरदार वकालत की। यह बात सभी को पता है कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं के पास अब इस एजेंडे के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं बचा है। कारण साफ है कि कांग्रेस पार्टी और इसके सहयोगी दलों ने मिलकर जिस प्रकार पिछले 9 सालों में देश को लूटा और देश को बर्वादी के कगार पर ला खड़ा किया हैं। देश की आर्थिक स्थिति को खास्ता हालात कर दिया हो। जिधर छूओ उधर ही लूट मची है। पुंजीपतिओं की पौ-बारह है गरीब मंहगाई की चपेट में बुरी तरह पीसता जा रहा है। जरूरी सभी खाद्य पदार्थों के दाम आकाश छूने लगे हैं। मंहगाई पर मनमोहन सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहा, नेता और पूंजीपति उद्योगिक घराने दोनों मिलकर देश को लूटने में लगे हैं। इस नाकामी को छूपाने के लिए देश में सांप्रदायिकता का माहौल खड़ा करना कांग्रेस पार्टी के लिए ना सिर्फ लाभकारी रहेगा और वह यह भी सोचती यह कि इससे मुसलमानों के वोटों का एकतरफा लाभ भी उसी की पार्टी को मिलेगा। जिससे यू.पी-बिहार-बंगाल जैसे कई राज्यों में जहां क्षेत्रिय दलों ने जैसे सपा, बसपा, जदयू, तृणमूल ने जिस प्रकार इनके सांप्रदायिक वोट बैंक में सैंध लगाई है कांग्रेस पार्टी का जनाधार लगभग इन राज्यों से समाप्त सा हो चुका है। इनको लगने लगा है कि स्नैह-स्नैह आने वाले दिनों में क्षेत्रिय दलों द्वारा इनके नाक में दम पैदा कर देगी।

मानो सत्ता देश की सेवा के लिए नहीं लूटने व बंदरबांट के लिए बना हो। जिसप्रकार राजनैतिक सांठगांठ क्षेत्रिय दलों के द्वारा सत्ता में बने रहने के लिए किये जातें हैं, असमाजिक तत्वों से समझौता किया जाता है। उच्चतम अदालत के निर्णय को भी दरकिनार कर सी.बी.आई जैसी संस्था का दुरूपयोग किया जाता है। अदालती हस्तक्षेप के उपरान्त अपराधियों को बचाने का भरसक प्रयास हमें इस बात की तरफ संकेत करता है कि देश में कानून व्यवस्था से भी ऊपर हो चुका है राजनीति दल या यूँ लिखा जाए राजनीति दल देश की कानून व्यवस्था से ऊपर है। इनको RTI Act के अधिन आने में खतरा नजर आता है। इनको देश बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती सबके सब इस बात को लेकर चिन्तित है कि किस प्रकार जेल से चुनाव लड़ा जा सके। अपराधियों के सहयोग से कैसे सत्ता पर बना रहा जा सके।
अब चुकीं देश की जनता कांग्रेस पार्टी की भ्रष्ट व्यवस्था और लोकपाल विल को लेकर देश की जनता को जिस प्रकार से गुमराह करने का काम किया। डा. मनमोहन सिंह की असफल आर्थिक व्यवस्था ने देश को अंधकार में डाल दिया। एक तरफ शिक्षा का व्यवसायिकरण तो दूसरी तरफ देश में बेरोजगारों की बढ़ती समस्या से देश ध्यान हटाने और देश में श्री नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के खतरे को भांपते हुए कांग्रेस पार्टी ने सांप्रदायिकता के कार्ड को खेलने का खतरा मोल ले लिया है। इससे देश को क्या लाभ या हानि होगी यह तो वक्त ही बता पायेगा। हाँ ! इतना जरूर तय हो जायेगा देश में 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही सांप्रदायिकता की आग इस कदर लगेगी कि पूरा देश एकबार फिर से आजादी की घटना को याद कर सकेगा।

अर्मत्य सेन की धर्मनिरपेक्षता - शम्भु चौधरी

इस देश में ‘‘भारत माता की जय’’ बोलना सांप्रदायिकता कहलाती है, अल्पसंख्यकों को नाराज करना जैसा है। संसद के भीतर जो सांसद ‘‘बंदे मातरम्’’ बोलने में हिचकिचाते हैं। भारत के गुणगान में जो गीत तक गुनागुनाने में जिनका धर्म खुद को अपमानित समझता हो। वे लोग कैसे देश के प्रति वफ़ादार हो सकते? इन सबके उपरान्त हमारा देश धर्मनिरपेक्षता को स्वीकारता है। हम इसका सम्मान भी करते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि हम खुद को उनके हवाले कर दें? हम कुछ भी कहें तो सांप्रदायिक और वे दंगा करें, आतंकियों को पनाह दें तो धर्मनिरपेक्ष? यह धर्मनिरपेक्षता का पैमाना नहीं हो सकता। यदि समय से हम नहीं चेते तो, आने वाली पौध हमें कभी नहीं माफ करेगी।
जिस प्रकार एक मांसाहारी इंसान (चंद अपवादों को छोड़ दें तो) निरामिस नहीं बन सकता चुकीं उसको खुन खाने की लत जो लग जाती है। उसी प्रकार एक भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक अपने को कभी भी सुरक्षित नहीं मानते, भले ही उनके चलते आप खुद को क्यों न असुरक्षित महसूस करने लग जाएं। आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर जिस प्रकार देश में एक व्यक्ति को लेकर आशंकओं का वातावरण पैदा किया जा रहा है इसमें देश के कुछ धर्मनिरपेक्षता की खाल में छिपे सांप्रदायिक चेहरे बेनकाब होते जा रहे हैं। जो यह सोचते हैं की देश में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा सिर्फ वे ही लोग कर सकते हैं। लेकिन जब पाकीस्थान या बंगलादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों के साथ जो सांप्रदायिक व्यवहार होता है तब इनकी धर्मनिरपेक्षता, इनकी यही सोच, इनका यही बयान, हिन्दू मां बहनों के साथ हो रहे अत्याचार के दर्द को यह वर्ग नहीं समझ पाता। पिछले दिनों नोबल पुरस्कार प्राप्त भारत के महान अर्थशास्त्री श्री अर्मत्य सेन जी जिसके सिद्धान्तों से विश्व के किसी भी देश के एक भी ग्रामीण या ग्राम का भला नहीं हो सका ने एक प्रश्न के जबाब में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘असुरक्षित महसूस करने के लिए मुझे अल्पसंख्यक समूदाय का सदस्य होना होगा।’’ धर्मनिरपेक्षता की नई व्याख्या करने वाले श्री सेन को एक सलाह है कि कुछ दिन पड़ोस के देश में रह लेते वहां पर जो अनुभव उनको होगा उसके लिए उनको धर्म बदलने की कोई जरूरत नहीं होगी। आप स्वतः ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे संभव हो तो अपने परिवार को भी साथ रख लिजिऐगा। भारत के 40 प्रतिशत गांवों की स्थिति पाकीस्तान जैसी बनती जा रही हैं हिन्दूओं के नाबालिक बच्चियों को यही अल्पसंख्यक समूदाय उठा-उठाकर ले जा रहा, 15-20 दिनों तक उसको किसी घर में बन्द रखता है फिर उसका धर्म परिवर्तन कर किसी मुसलमान से जबरन निकाह करा देता है। आतंक का यह वातावरण पूरे भारत में सनै-सनै तेजी से फैलता जा रहा है भारत का कानून मूकदर्शक बना देख रहा है। श्री अर्मत्य सेन को अल्पसंख्यक बनकर उनके दर्द का अहसास करने की जगह भारत के उन इलाकों के दर्दनाक दृश्य को भी देखने का प्रयास करना चाहिए जहां भारत के अंदर ही हिन्दुओं के सैकड़ों परिवार खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। मुसलमानें के काल के ग्रास बनते जा रहे हैं। श्री अर्मत्य सेन का खुद का मत किसको भारत का प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहतें हैं या किसको नहीं, यह उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है। परन्तु इस बात का देश की पौंगी धर्मनिरपेक्षता से कोई तालमेल नहीं बैठाया जा सकता। जिसप्रकार भारत में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा गढ़ी जा रही है उसमें भारत के उन बुद्धिजीवि वर्ग का प्रयोग किया जा रहा है जिसका विश्वव्यापि माहौल बनता या बिगड़ता ऐसे खतरनाक खेल को ना खेला जाए अन्यथा इसके परिणाम गुजरात से भी भयानक हो सकते हैं। इस देश में ‘‘भारत माता की जय’’ बोलना सांप्रदायिकता कहलाती है, अल्पसंख्यकों को नाराज करना जैसा है। संसद के भीतर जो सांसद ‘‘बंदे मातरम्’’ बोलने में हिचकिचाते हैं। भारत के गुणगान में जो गीत तक गुनागुनाने में जिनका धर्म खुद को अपमानित समझता हो। वे लोग कैसे देश के प्रति वफ़ादार हो सकते? इन सबके उपरान्त हमारा देश धर्मनिरपेक्षता को स्वीकारता है। हम इसका सम्मान भी करते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि हम खुद को उनके हवाले कर दें? हम कुछ भी कहें तो सांप्रदायिक और वे दंगा करें, आतंकियों को पनाह दें तो धर्मनिरपेक्ष? यह धर्मनिरपेक्षता का पैमाना नहीं हो सकता। यदि समय से हम नहीं चेते तो, आने वाली पौध हमें कभी नहीं माफ करेगी। Date: 23.07.2013/ amartya sen

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सांप्रदायिक सेक्लुरिजम - शम्भु चौधरी

कोई भी धर्म बुरा नहीं होता परन्तु कोई धर्म दूसरे धर्म के प्रति भेदभावपूर्ण, वेमनुष्यता व सांप्रदायिकतापूर्ण व्यवहार करता हो तो इसको किसी भी रूप में धर्मनिरपेक्षता के पलड़े पर सही नहीं आंका जा सकता। आज भारत में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण में जिसप्रकार की राजनीति की जा रही है अर्थात श्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ‘‘बुर्का की राजनीति’’ की जा रही है इसे ही हम सेक्लुरिजम सांप्रदायिकता भी कह सकते हैं जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को स्नेह..स्नेह अपने धर्म का ग्रास बनाकर निगल जाऐगी।
भारत में ज्यूँ-ज्यूँ 2014 का आम लोकसभा का चुनाव नजदीक आता जा रहा है सेक्लुरिजम की रोटी सैंकने वाले राजनैतिक दलों की एक ही भाषा होती जा रही है। हर बात में सेक्लुरिजम की दुहाई देने वाले दलों को राष्ट्रीयता की बात करने वाले व्यक्ति के हर शब्दों में सांप्रदायिकता की बू झलकती है। आईये इससे पहले कि हम भारतीय राजनीति की बात करें, भारत में चल रहे सेक्लुरिजम युद्ध की बात को समझ लेते हैं। पिछले कुछ दशकों से भारत में सेक्लुर दलों की बाढ़ सी आ गई है। इन दलों की सेक्लुरिजम की जो परिभाषा मानी जाती है वह है ऐन-केन-प्रकारेण मुस्लीम सांप्रदाय के वोटों को प्राप्त करने के लिए उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं जिससे मुसलमानों की आत्म संतुष्टी मिलती रहे। विशेषकर कट्टरवादी ईस्लामिक विचारधारा के पोषकों को, जिनको भारतीय धर्मनिरपेक्षता से न तो कोई मतलब है ना ही धर्मनिरपेक्षता के वे कभी पक्षधर माने जा सकतें हैं। ऐसे लोगों का एक ही सिद्धान्त रहता है कि किसी न किसी प्रकार भारतीय धर्मनिरपेक्षता के विचारधारा से अपने धर्म को फैलाते हुए भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक हमला करते हुए भारतीय विचारधारा को समाप्त कर इस्लामिक सत्ता को स्थापित करना इनका एक मात्र उद्देश्य माना जा सकता है। दूसरी तरफ देश के भीतर इस्लामिक आंतकवाद को पोषण देना उनको संरक्षित करते हुए उनको पनाह देना व उनका राजनैतिक बचाव करते रहना, इनका लक्ष्य है। भारतीय संस्कृति के विकास व विचारधाराओं में किसी भी प्रकार का ना तो इनके योगदानों को आंका जा सकता है ना ही इस भुखण्ड की धार्मिक सभ्यता के विकास के लिए सामाजिक रूप कभी भी कोई योगदान ही दिया हो ऐसा दिखाई नहीं देता। अब हम भारतीय धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो आज देश में जिस प्रकार विभिन्न राजनैतिक दलों में हौड़ सी लगी है इनको देखकर ऐसा प्रतित होता है कि भारत जैसे बहु भाषा-भाषी, बहुजातिय परंपरा, बहु संप्रदाय के लोगों का आपसी सोहार्द के ताने-बाने को खंड-खंड करते रहना धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेकर एक विशेष धर्म द्वारा प्रायोजित सांप्रदायिकता का पोषण मात्र इन राजनैतिक दलों का लक्ष्य रह गया है। कोई भी धर्म बुरा नहीं होता परन्तु कोई धर्म दूसरे धर्म के प्रति भेदभावपूर्ण, वेमनुष्यता व सांप्रदायिकतापूर्ण व्यवहार करता हो तो इसको किसी भी रूप में धर्मनिरपेक्षता के पलड़े पर सही नहीं आंका जा सकता। आज भारत में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण में जिसप्रकार की राजनीति की जा रही है अर्थात श्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ‘‘बुर्का की राजनीति’’ की जा रही है इसे ही हम सेक्लुरिजम सांप्रदायिकता भी कह सकते हैं जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को स्नेह..स्नेह अपने धर्म का ग्रास बनाकर निगल जाऐगी।

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

धर्मनिरपेक्षता का बुर्का

श्री नरेन्द्र मोदी के इस बयान पर कि जब कभी भी कांग्रेस पार्टी को राजनैतिक संकट का सामना करना पड़ता है तो वह धर्मनिरपेक्षता का बुर्का पहन लेती है। इनके कहने का तात्पर्य स्पष्ट था कि भ्रष्टाचार में पूरी तरह डूबी कांग्रेस पार्टी न तो मंहगाई पर काबू पा रही है, ना ही देश में विकास का कोई नया मॉडल प्रस्तुत करने में सफल रही है। इनको तो बस हर किसी के बयान में सांप्रदायिकता ही नजर आती है और खुद धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनकर सारे महत्वपूर्ण मुद्द को गायब कर सत्ता पर किसी तरह बने रहना चाहती है। इस बयान का पलटवार करते हुए कांग्रेस पार्टी के इन दो चेहरों ने स्वीकार किया कि उनको धर्मनिरपेक्षता का बुर्का (चोला) अच्छा लगता है।

रविवार, 14 जुलाई 2013

कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई-शम्भु चौधरी

कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं?
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा एक समाचार एजेन्सी को दिए गये बयान ‘‘कुत्ते के बच्चे वाली टिप्पणी’’ पर देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने जो हंगामा खड़ा किया इससे ऐसा प्रतित होता है कि ये राजनैतिक दल अपने स्वार्थ व वोट बैंक के लिए देश में सांप्रदायिक सदभावनाओं के साथ हमेशा सौदाबाजी करती रही है या करने का कोई अवसर नहीं चुकना चाहती। जिस बयान से श्री नरेन्द्र मोदी गोधरा के प्रतिफल में हुए गुजरात दंगों के दर्द के मानवीय पक्ष को अहसास कराने के प्रयास कर रहे थे, उसी बयान को इन धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कुछ इस प्रकार प्रचारित कर देश के मुसलमानों को बहकाने का प्रयास शुरू कर दिया । इनकी सोच अभी भी उसी जमाने में चल रही है कि वे एक झूठ को सौ बार कहेगें तो सभी को वही सच नजर आयेगा। जबकी वे यह नहीं जानते कि अब मुसलमान समाज भी आधुनिक हो चुका है। वे भी इन्टरनेट के माध्यम से उनके बयान या टिप्पणी को पढ़ सकते हैं और उसका अर्थ निकाल सकते हैं। जिसका अर्थ तथाकथित सांप्रदायिक धर्मनिरपेक्ष दलों ने निकाल कर देश की जनता को समझाना कर प्रयास किया। जिसप्रकार इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों को बहकाने का प्रयास कर देश की सांप्रदायिक सदभावनाओं में जह़र घोलने का प्रयास किया है, इस बात को जगजाहिर करती है कि इनका उद्देश्य सीधे तौर पर मुसलमानों को बरगलाना है। कांग्रेस पार्टी या अन्य खुद को सेक्लुरिजम मानने वाले लोग जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं वे क्या यह बताने का प्रयास करेगें कि देश के विभाजन के समय इनका सेक्लुरिजम कहां चला गया था? बन जाने देते मो. अलि जिन्ना साहेब को प्रधानमंत्री! कम से कम देश के दो हिस्से और लाखों लागों की जान तो नहीं जाती? आजादी के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने आज तक एक भी मुसलमान को ना तो पार्टी का अध्यक्ष बनने दिया ना ही किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाया। ये किस सेक्लुरिजम की दुहाई देते हैं? दरअसल मुसलमानों का वोट बैंक नोचने-खसोटने में लगी तथाकथित राजनैतिक दल खुद ही कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ रहे हैं। हर दल यह साबित करने में लगा है कि वे ही मुसलमानों का भला कर सकते हैं। मुसलमानों के वोट बैंक को एकतरफा पाने के जिस सेक्लुरिजम की बात ये लोग करते हैं। उससे आजतक मुसलमानों का भला नहीं कर सके। खुद को धर्मनिरपेक्ष और दूसरे को सांप्रदयिक मानने वाले दलों की इस देश में बाढ़ आ गई है। अब तो हालात कुछ इस प्रकार हो चुके हैं कि एक दल दूसरे दल से आगे बढ़कर मुसलमानों का हमदर्द बनने इस कदर प्रयास करता है कि वह यह भी भूल जाता है कि उसे कब और कहाँ क्या कहना चाहिए, कहना चाहिए कि नहीं? यह भी भूल जाते हैं। मानों देश के अन्दर मुसलमानों के वोटों को पाने के लिए सेक्लुरिजम दलों की आपस में ही कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई चल रही हो। - शम्भु चौधरी

रविवार, 16 जून 2013

यह कैसा सिद्धान्त नीतीश जी? -शम्भु चौधरी

माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को यह तो बताना ही होगा कि वह कौन सा सिद्धान्त है जिसको आधार बनाकर आपने बिहार की जनता के विश्वास के साथ धोखाबाजी की। जिसमें पिछले सप्ताह से बिहार की जनता को उनके बयानों से जो दिखाई दे रहा उसमें मात्र एक कारण श्री नरेन्द्र मादी के नाम को लेकर है। तो उनको यह बताना और जबाब भी देना होगा कि नरेन्द्र मादी न तो उनके दल के प्रचारक नेता बनाये गए ना ही एनडीए के प्रचारक बने तो उनको इस बात को लेकर इतना बबाला और भविष्य में क्या होगा इसकी अभी से ही चिन्ता क्यों सताने लगी? क्या वे खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मिदवार मानते थे?
आज भाजपा व जेडीयू का 17 साल पुराना गठबंधन कई लोगों के ना चाहते हुऐ भी बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के अहम का बली का बकरा बन गया। यह बात अलग है कि आने वाले चुनाव में इस अहंकारी व्यक्ति का हर्ष ठीक लालू यादव जैसी ही होनी तय है। आपने इस गठबंधन को भाजपा के नेताओं के लाख मनाने के वाबजूद व एनडीए अध्यक्ष श्री शरद यादव के ना चाहते हुए भी अहंकारी जिद ठान ली कि इसके लिए भला उनको कुछ भी करना पड़े वे एनडीए के गठबंधन में नहीं बने रह सकते। जिसका कारण नीतीशजी ने कहा कि ‘‘ हम किसी भी हालात में अपने सिद्धान्तों से समझौता नहीं करेगें’’ माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को यह तो बताना ही होगा कि वह कौन सा सिद्धान्त है जिसको आधार बनाकर आपने बिहार की जनता के विश्वास के साथ धोखाबाजी की। जिसमें पिछले सप्ताह से बिहार की जनता को उनके बयानों से जो दिखाई दे रहा उसमें मात्र एक कारण श्री नरेन्द्र मोदी के नाम को लेकर है। तो उनको यह बताना और जबाब भी देना होगा कि नरेन्द्र मोदी न तो उनके दल के प्रचारक नेता बनाये गए ना ही एनडीए के प्रचारक बने तो उनको इस बात को लेकर इतना बबाला और भविष्य में क्या होगा इसकी अभी से ही चिन्ता क्यों सताने लगी? क्या वे खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मिदवार मानते थे? यदि श्री नीतीश जी का यही सिद्धान्त है तो उनको नैतिकता के आधार पर बिहार में एनडीए को प्राप्त बहुमत की गद्दी भी छोड़ देनी चाहिए और बिहार की जनता के सामने जाकर कहना चाहिए कि वे सिद्धान्तों के साथ समझौता नहीं कर सकते। सिर्फ नरेन्द्र मोदी का विरोध करने से वे मुसलमनों के चेहते बन सकते हैं और सिर्फ मुसलमानों के चहते बनकर सत्ता प्राप्त किया जा सकता या प्रधानमंत्री का सपना पूरा किया जा सकता तो इसमें लालू यादव को अबतक मुसलमानों ने प्रधानमंत्री बना दिया होता। चुकिं हम सभी इस बात को जानते हैं कि श्री अडवानी जी की एतिहासिक सांप्रदायिक यात्रा को रोकने का साहस सिर्फ लालू जी ने ही दिखाया था उस समय आप श्री अडवाणी जी के साथ खड़े दिखाई देते रहे। धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त आपकी राजनीति चाल भले ही हो सकती है आपके इस सिद्धान्त से कोई सहमत दिखाई नहीं देता। आप इतने ही धर्मनिरपेक्ष थे तो भाजपा के साथ आपने गठबंधन ही क्यों किया था? आज जब आपकी दाल नहीं गली तो अंगूर खट्टे नजर आने लगे श्रीमान को।

मंगलवार, 11 जून 2013

आडवाणी जी का इस्तीफा नाटक

देश को दो बार संप्रदायिकता की आग में झौंकने वाले भाजपा के कदवार नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने आखिरकार मानमनुवल के पश्चात अपना इस्तीफा वापस ले ही लिया। इस इस्तीफा वापसी के पीछे भी इस अति महत्वकांक्षी व्यक्ति की सौदावाजी को नकारा नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार इन्होंने श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को बाध्य किया था कि वे लिखकर देंवे कि देश का अगला ‘‘पी.एम इन वेटिंग’’ आडवाणी जी ही होंगे। कई सालों तक वे अपने नाम के साथ इस तगमे को लगाये जनता के सामने फिरते रहे कि ‘‘अगला प्रधानमंत्री मैं ही हूँ’’। जब देश की जनता ने इनके इस कद को दो बार सिरे से नकार दिया और पूरी की पूरी गठबंधन दल मिलकर भी माननीय आडवाणी जी को प्रधानमंत्री के पद तक नहीं पंहुचा पाई। आज इस भाजपा के लिबरल चेहरे को लगता है कि उनका ‘‘पी.एम इन वेटिंग’’ का सपना अधुरा ही रह जाएगा। इस बीच जब भाजपा में नये चेहरे उभरकर खुद-व-खुद सामने आयें हैं तो आडवाणी जी को लग रहा कि उनके पी.एम. पद को कोई दूसरा व्यक्ति जो उनके कद से छोटा है हड़पने जा रहा है। जिसके लिये उन्होंने जिन्ना की मजार पर भी मन्नतें मांगी थी और उनको धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के सम्मान से नबाजा था। मानो एक सांप्रदायिक व्यक्ति दूसरे सांप्रदायिक व्यक्ति को प्रमाण पत्र दे रहा हो। वर्तमान में हुए इस्तीफा नाटक ‘‘खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे’’ मुहावरा को सत्य साबित कर देने में सक्षम हो गया। इस इस्तीफा प्रकरण से आडवाणी के कई इरादे को स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता है जैसा कि इन्होंने अपने पत्र में भाजपा पर यह आरोप लगाया कि ‘‘पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है। इसमें व्यक्ति विशेष का महत्व बढ़ता जा रहा है। लगता नहीं कि यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के आदर्शों पर चलने वाली पार्टी है।’’ इनका स्पष्ट संकेत है कि भाजपा में इनके कद को कोई भी व्यक्ति छोटा करने का प्रयास किया तो वे पार्टी लाईन से हटकर एक नई पार्टी तक बनाने की बात भी सोच सकते थे। श्री राजनाथ सिंह जी खैर मनायें कि उनका ( आडवाणी जी का ) तीसरा धमाका बीच में ही रूक गया अन्यथा भाजपा नेताओं को सत्ता के सपने देखने का अवसर भी नहीं देते अडवाणी जी। इस त्यागपत्र प्रकरण से किसे लाभ होगा किसे नहीं यह तो आने वाला 2014 का लोकसभा चुनाव ही बता पायेगा कि जनता ने इस प्रकरण को किस प्रकार लिया है। हाँ! एक बात जरूर है कि इससे श्री आडवाणी जी का कद बहुत छोटा हो गया। आज देशभर से आवज उठ रही है कि ‘‘नरेन्द्र मोदी को आगे लाया जाए - कांग्रेस को हटाया जाए’’ एनडीए के कुछ दलों का यह अहंकार कि यदि मोदीजी को भाजपा ने प्रजोक्ट किया तो वे दल को छोड़ देगें । वे होते कौन हैं मोदीजी को हटाने वाले? यदि देश की जनता मोदीजी को लाना चाहती है तो मोदी जी को कोई नहीं रोक सकता। गठबंधन जनता की आवाज के साथ रहना चाहे तो रहे। जाना चाहते हों तो कल क्यों आज ही छोड़कर जा सकतें हैं। धर्मनिरपेक्षता की कतार में खड़े होकर अपना दामन भी साफ कर लेवें। यही मौका है उनको धर्मनिपेक्षता का प्रमाणपत्र प्राप्त करने का। मुसलमानों के वोटों को बटोरने का।

रविवार, 7 अप्रैल 2013

Cartoon: Prime Minister of India


Prime Minister of India; [2008-2014] - By cartoon by Shambhu Choudhary, Kolkata
शायद इसीलिए कांग्रसियों को घोड़ा बार-बार याद आता है?

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता बनाम भगवा आतंकवाद -शम्भु चौधरी

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।

यह देश सूफी-संतों का देश रहा है। यहां राम भी है तो रहीम भी। दुनियाभर में भारत एक मात्र एकलौता देश है जहां दो धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ युगों-युगों से साथ रहते आयें हैं। देश की सत्ता विभाजन की दीवार ने कई जख्म दोनों सरहदों के इस पार हा या उस पार दिया है। इन जख्मों को भरने में दोनों सांप्रदाय के लोगों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। परन्तु सत्ता के दलाल इन जख्मों को हर पांच सालों में हरा-भरा कर देते हैं। उनका उद्देश कभी भी दोनों सांप्रदायों को मिलाना या उनमें भाईचारा हो ऐसा प्रयास करना नहीं रहा।
देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें इतनी विवेकशील हो चुकी है कि देश की देशभक्ति इनको सांप्रदायिक लगने लगी है। देशभक्ति की बात करने वाले, इस देश के हर नागरिक इनकी नजर में देश को सांप्रदायिकता की आग में झौंकने वाला माना जाने लगे हैं उनकी परिभाषा में सिर्फ वे लोग देशभक्त हैं जो देश को अंदर से खोखला करने में उनकी मदद कर रहें हैं। जो लोग देश की एकता और अखंडता की बात करते हैं उसको भगवा आंतकवाद का नाम दिया जा रहा है, इससे स्पष्ट परिलक्षित हो जाता कि देश में धर्मनिरपेक्ष आतंकवाद उनके सर चढ़कर बोल रहा है। यह सब बातें हमारी पौंगी धर्मनिरपेक्षता को खुली चुनौती है। जो इनके बचाव में गाहे-बगाहे कुछ दलील देश के सामने रखते हैं जो निम्न प्रकार है -

इस परिपेक्ष में जो दलीलें दी जाती है-

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना। 2. देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोकना। 3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना।

हमें देखना होगा कि इन दलीलों के पीछे किन स्वार्थी तत्वों का दिमाग कार्य कर रहा है? दरअसल देश में जिन-जिन स्थानों में दंगों के खतरे ज्यादा महसूस किये जाते रहे हैं वैसे अधिकतर स्थान मुस्लीम बाहुलता वाले होते हैं। दंगों की शुरुआत ऐसे ही तत्वों द्वारा होती है जो देश में खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानती रही है। इसका स्पष्ट संकेत है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष ताकतें मानने वाले तत्व देश की धर्मनिरपेक्षता को न सिर्फ खतरा साबित हो चुके हैं वे राजनीति स्वार्थपुर्ति के लिए बार-बार इस तरह का वातावरण भी सृजन करते रहें हैं।

1. अल्पसंख्यकों को भयभीत करना -   आजादी के पश्चात अबतक हम जिन्हें अल्पसंख्यक मानते रहें हैं वे अपने-अपने क्षेत्र में अब न सिर्फ बहुसंख्यक हो चुके हैं उन क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं के उनके साथ विवाह के भी कई मामले सामने आने लगे हैं। सही अर्थों मे कहा जाए तो अब इस कौम के अंदर भय नाम की कोई बात नहीं रह गई कारण कि इनको दोहरे कानून का समर्थन प्राप्त हो रहा है। पहला इस्लामिक कानून जो हिन्दुओं की लड़कियों को मुस्लीम बनाने की इज्जाजत देता है। दूसरा भारतीय संविधान जो वयस्कों धर्म-जाति के बंधन से परे रहकर शादी करने की इज्जाजत। जबकि इसके विपरित कोई अन्य प्रकार की घटना घटते ही सांप्रदायिकता व कानून व्यवस्था की दुहाई दी जाती हैं। आनन-फानन में ऐसे संबन्धों का जो भी हर्ष निकले पर यह बात तय है कि उस समय भारत का संविधान गौन हो जाता है। चुकीं मामला एक विशेष धर्म से जुड़ा होता है। जहां से सांप्रदायिक दंगे फैलने की प्रवल संभावनाएं बनी रहती है। यह इस बात की ओर संकेत देता है कि भयभीत होने वाली कोई बात इस कौम पर लागू नहीं होती।

2. सांप्रदायिक दंगों की आग -   प्रायः राजनैतिक दलों द्वारा इस बात की चेतावनी दी जाती है कि कोई भी बात जो उनको पसंद न हो न करें, अन्यथा दंगा होने की संभावना जताई जाती रही है। हर बात में इस खौफ को पैदा किया जाता रहा है। कोई भी व्यक्ति ऐसी बात न करें या ऐसा कार्यक्रम न करें जिससे सांप्रदायिक सदभावना का खतरा पैदा हो जाए। यह बात किसे कहा जाता है? क्या यही बात हमारे राजनैतिक दलों ने कभी मुसलमानों को भी कहा है? जो लोग सांप्रदायिकता की बात करतें हैं वे लोग ही खुद सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं चुंकि उनका उद्देश्य न सिर्फ राजनीति करना रहा है इसके माध्यम से वे कई बार सत्ता भी प्राप्त करने में सफल रहें हैं।

3. देश को पुनः विभाजन की तरफ ले जाना-   जो लोग बार-बार देश के टूकरे करने की बात कर देश की जनता को भयभीत करते रहते हैं उनके लिए एक बात याद आती है कि जो रोज-रोज शेर आया शेर आया करते रहते हैं ऐसे ही लोगों को एक दिन सच में शेर आकर खा जाता है। ऐसे ही लोग देश में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कट्टरपंथी ताकतों को मोहरा बनाकर अपनी सत्ता का दावा मजबूत करने में लगें हैं वे ही वास्तव में देश को पुनः विभाजन की कगार पर ले जाने का कार्य कर रहें हैं। जब एकबार धर्म के नाम पर देश के तीन बंटवारे हो चुके, तो प्रमाणित आंकड़े कहते हैं कि अब जो लोग देश को पुनः बांटने की धमकी देकर देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत कर एक विशेष संप्रदाय के वोट बैंक को अपने पक्ष में एकत्रित करने का काम कर रहें है। वे सही अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने में लगे हैं। ऐसी ताकतें जो खुद की राजनीति में लगा हो वह किसी भी सांप्रदाय का कभी भी भला नहीं सोच सकती।

आने वाले दिनों में जैसे-जैसे इन तत्वों की ताकतों में इजाफा होगा। देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ता चला जाएगा और इसके लिए एक मात्र वे ही लोग जिम्मेदार माने जाएंगें या धर्मनिरपेक्ष ताकतों का वह चेहरा ज्यादा जिम्मेदार माना जायेगा जो देश में धर्मनिरपेक्ष की आड़ में वोट की राजनीति करते रहें है।।

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक ताकतें -शम्भु चौधरी

आज देश की प्रायः सभी राजनैतिक दलों पर सत्ता प्राप्त करने का भूत सवार है, इसके लिए वे न सिर्फ वे चोर, लुटेरे, देश के गद्दारों ओर-तो-ओर आतंकवादियों से भी हाथ मिलाने में नहीं हिचकते। जिसे ये लोग धर्मनिरपेक्ष मानते हैं वह वास्तव में एक विशेष धर्म को प्रलोभन देकर इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने का हथकंडा मात्र है। चोर-लुटरे तो फिर भी देश के प्रति वफादार होते हैं, पर देश के गद्दारों और आतंकवादियों के ऊपर इनका भरोसा किस राजनीति का हिस्सा है? यह किसी भारतीय को नहीं समझ में आता।

आजादी के पश्चात एक सोची समझी साजिश के तहत छदम धर्मनिरपेक्षता का शिकार भारत बनता जा रहा। देश के अधिकांश राजनेता जो धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैं वे वास्तव में वे धर्मनिरपेक्षता की आढ़ में एक विशेष धर्म समुदाय की कट्टरपंथी विचारधाराओं के समर्थक हैं। जो राजनैतिक दल जितना कट्टरपंथी समर्थक है, वह दल खुद को उतना ही धर्मनिरपेक्ष मानती है, जबकि इसके विपरीत दूसरे वर्ग को सांप्रदायिक कहा जाता है जो देश की एकता व अखंडता हेतु कट्टरपंथियों से सतर्क होने के लिए हमेशा आवाज उठाता रहता है।। परन्तु धार्मिक कट्टरपंथिया का सहारा लेकर विशेष वर्ग के वोटों को प्राप्त करना एक प्रकार से धर्मनिपेक्षता की परिभाषा में आंकी जाने लगी है। चुनाव के समय खुद को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले दल कट्टरपंथी भारत विरोधी ताकतों से हाथ मिलाते इनको खुले आम देख जा सकता है। ऐसा सिर्फ एक सियासी पार्टी नहीं बल्की इस दौड़ में देश की सभी छोटी-बड़ी पार्टियाँ कार्य कर रही है। जो इस बात की तरफ संकेत दे रही है कि देश की धर्मनिरपेक्षता एक विशेष संप्रदाय की कठपुतली बनकर रह गई। कुछ कट्टरपंथी व असामाजिक ताकतें देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी लगी है जो न सिर्फ इस्लाम धर्म को बदनाम कर रही है। इस धर्म के अनुयाइयों के प्रति दुनिया में शक पैदा करने में भी सफल रही है। दुनियाभर में आज इस कौम को शक की निगाह से देखा जा रहा है इसमें भारतीय मुसलमानों का भी बहुत बड़ा योगदान है, गोधरा की घटना के प्रतिवाद में गुजरात में जो भी जन आक्रोश उभरा वह दुर्भाग्यजनक था। परन्तु इसके लिए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक बंधु जो खुद को धर्मनिरपेक्ष मानते वैसे लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं न कि नरेन्द्र मोदी। जो लोग देश को टूकरों में बंटना चाहते हों उनको हम न सिर्फ धर्मनिरपेक्षता की आड़ में पनाह दे रहे हैं। ऐसे लोगों को कानून के माध्यम से सुरक्षा भी देने का प्रयास किया जाता है। आज देश की प्रायः सभी राजनैतिक दलों पर सत्ता प्राप्त करने का भूत सवार है, इसके लिए वे न सिर्फ वे चोर, लुटेरे, देश के गद्दारों ओर-तो-ओर आतंकवादियों से भी हाथ मिलाने में नहीं हिचकते। जिसे ये लोग धर्मनिरपेक्ष मानते हैं वह वास्तव में एक विशेष धर्म को प्रलोभन देकर इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने का हथकंडा मात्र है। चोर-लुटरे तो फिर भी देश के प्रति वफादार होते हैं, पर देश के गद्दारों और आतंकवादियों के ऊपर इनका भरोसा किस राजनीति का हिस्सा है? यह किसी भारतीय को नहीं समझ में आता। कहने का अभिपार्य है कि सत्ता के लिए ये लोग इतना नीचे गिर चुकें हैं कि जहां से भारत में सही मायने धर्मनिरपेक्ष राजनीति को लौटना असंभव तो नहीं जान पड़ता पर राह बहुत कठिन बन चुका है।। कोई दाऊद के आईक्यू का सहारा लेता है तो कोई जिन्ना का। कोई इमामों का सहारा लेता है तो कोई भगवा आतंकवाद का। पता नहीं किस माँ की कोख ने भारत माँ के इन लाडलों को पैदा किया कि इनको सत्ता प्राप्त करने के लिए देश की सार्वभौमिकता से भी समझौता करना पड़े तो इन लोगों को जरा भी संकोच नहीं। मजे की बात है जो देश के गद्दार हैं उनका समर्थन प्राप्त करने को हम धर्मनिरपेक्ष मानते हैं।


सोमवार, 12 नवंबर 2012

भाजपा को कौन बचाएगा? - शम्भु चौधरी

भाजपा को कौन बचाएगा? - शम्भु चौधरी भाजपा अध्यक्ष श्री नितिन गडगरी जी दिसम्बर २००९ में भारतीय जनता पार्टी के नौंवें राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। पिछले दिनों जबसे श्री गडगरी जी का नाम जमीन हड़पने और उनकी कंपनियों पर आर्थिक मामले में जालसाज़ी का आरोप लगे हैं जिसकी सरकारी एजेंसियाँ जांच कर रही है। इसी बीच गडगरी जी को लगा कि उनका दूसरी बार भाजपा का अघ्यक्ष बनने का सपना अधूरा ही रह जाएगा। जिसके लिए उसने सालभर से ही कड़ी मशक्कत कर भाजपा के संविधान तक को भी पलटकर रख दिया। इसलिए उनको कारण-अकारण ही अचानक से दाऊद का नाम याद आ गया। इनका स्पष्ट उद्देश्य था कि भाजपा के नेताओं को जो उनका विरोध पार्टी में कर रहे हैं या संघ के उन कार्यकर्ताओं को जो उनका समर्थन नहीं कर रहें उनको अपने दाऊद से रिश्ते की बात याद दिला सके। इसलिए उन्होंने संघ को यह बताने की जरूरी समझा कि ‘‘स्वामी विवेकानंद और अंडरवर्ल्ड माफिया दाऊद इब्राहिम की आईक्यू यानी बौद्धिक क्षमता समान है।’’ ताकी संघ के नेताओं को यह जानकारी रहे कि उन्होंने जो धन पिछले कुछ सालों में खर्च किया है उसका पाई-पाई वे वसुलकर रहेगें। परिणाम स्वरूप रातों-रात एक मसीहा बन कर श्री गडगरी जी जांचकर लिया और उसने सुबह उठते ही यह बता दिया कि सबकुछ ठीक-ठाक है कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। भाजपा अध्यक्ष के इस दौगले चरित्र ने देश को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि आखिर में इस भ्रष्टाचार की लड़ाई में हम साथ लें तो किसे लें? सबके सब एक ही हमाम में नंगे होकर नहा रहे हैं। श्री नितिन गडगरी जी को तो भाजपा बचा ले जाएगी पर भाजपा को कौन बचाएगा? यह यक्ष प्रश्न जनता के सामने आ खड़ा हुआ है कि जिस प्रकार भाजपा ने पिछलें कुछ सालों में विपक्ष की भूमिका निभाई है इससे जनता को निराशा ही हाथ लगी है। इसका सबसे बड़ा कारण श्री गडगरी जी को माना जा रहा है। श्री मान ने, न सिर्फ संध को धोखा दिया है। भाजपा के नेताओं को भी धमकाने के लिए आपने सभी विकल्प खुले कर दिए है।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

धर्मनिरपेक्ष ताकतों का अर्थ क्या हो?

- शम्भु चौधरी

धर्म के आधार पर देश के विभाजन पश्चात व आजादी के बाद तेजी से एक शब्द ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ भारत की राजनीति में अपनी केन्द्रीय भूमिका निभाने लगी। इसके गहराई में जाकर देखा जाए तो हमें ज्ञात होता है कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ का अर्थ है एक विशेष धर्म के कट्टरवादी ताकतों को मजबूती प्रदान करना मात्र धर्मनिरपेक्षता का मुख्य लक्ष्य है देश की तमाम राजनैतिक चेहरे धर्मनिरपेक्षता को वोट बैंक की कुंजी मानते हैं और उन कट्टरवादी ताकतों द्वारा संकलित वोटों से खुद की राजनीति को मजबूत बनाये रखना, जो ऐसा करने में सफल रहे हैं वैसे लोग अपने आपको ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ मानते हैं। जबकि दूसरी तरफ हिन्दूवादी कट्टरवादी ताकतों को देश में सांप्रदायिक ताकत माना जाता है। व इसको केन्द्र कर आज देश की राजनीति दो हिस्सों मे स्पष्ट दिखाई देती है। आज सत्ता के बचाये रखने के लिए देश की एक बड़ी राजनीति दल ने इस हथियार का जम कर इस्तेमाल किया है। जब उस दल पर परिवारवाद का आरोप लगा और सत्ता से बहार आ गई तो उसने सांप्रदायिक शब्द का भरपूर प्रचार कर देश के बामदल सहित समाजवादियों तक को अपने पक्ष में ला खड़ा करने में सफलता पा ली। यह बात अलग है कि बामदल की सिद्धांतहीन दलदली राजनीति ने उसको जहाँ देश की राजनीति में हाशिये पर ला खड़ा किया है पर अभी भी इसके सर पर सांप्रदायिकता का भूत सवार है। जब भी संसद में कोई बहस होती है तो वो अपने को इस कदर बचाना चाहती है कि जैसे वो किसी महखाने से मुंह छिपाकर जाना चाहता हो। मानो सबका लक्ष्य एक है कि देश की मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों के एक वर्ग को कौन कितना लुभा सकता है इस बात कि हर तरफ हौड़ लगी है। असम की घटना के पश्चात पिछले दिनों देश में जो कुछ भी हमें देखने को मिला इसके साथ ही सरकारी व अन्य राजनीति दलों की टिप्पणियों पर नजर दौड़ाई जाए तो हमें यह बात ही नहीं समझ पा रहे हैं कि देश में बंगलादेशी मुसलमान इतने ताकतवर हो गए कि उनके कुप्रचार से देश की ही असमिया समाज को अपनी ही जमीं, अपने ही वतन में खुद को असुरक्षित महसूस करना पड़ा और बड़ी संख्या में देश के विभिन्न हिस्सों से उनके पलायन से हमें यह तो सोचना ही होगा कि देश में मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों ने भारतीय धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक स्वरूप को तार-तार कर दिया है। कुछ इस्लामिक संगठनों न सिर्फ मुम्बई में पाकिस्तान के झंडा ही नहीं फहराया, साथ ही उनके आकाओं ने यह भी ऐलान कर दिया कि अब जल्द ही समूचे भारत में इस्लाम का झंडा फहरा दिया जाएगा। इन मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों के सामने हमारी धर्मनिरपेक्षता पलक झपते ही ताश के पत्ते की तरह बिखर कर उनका तमाशा देखता रहा। सरकार की तरफ से कोई कार्यवाही न होकर हिन्दूवादी नेताओं पर अंकुश लगाया जाना इस बात को बल प्रदान करता है कि देश किस कदर एक धर्म विशेष के वोट बैंक की तरफ सिमटता जा रहा है। असम की घटना व असमियों और मणिपुरीयों को जिस प्रकार से भयभीत करने में देश की मुस्लिम कट्टरवादी ताकतों ने अपनी भूमिका निभाई, इससे इस बात में कतई संदेह नहीं रह गया कि अब धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सत्ता की राजनीति करने वाली ताकतों को यह बताना जरूरी हो गया है कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ वास्तव में वह नहीं कि वह सत्ता से चिपकने के लिए किसी दूसरे दल को सत्ता से अलग रखा जाए। ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ का अर्थ है कि देश में सभी धर्म में समभाव बना रहे, ना कि वह सत्ता को प्राप्त करने व सत्ता से किसी दल विशेष को दूर रखने के प्रयोग में लाया जाना चाहिए। हिन्दुत्वाद से देश मजबूत ही होगा जबकि मुस्लिम कट्टरवादी ताकातों को जितना बल दिया जाएगा देश की सार्वभैमिकता को उतना ही खतरा पैदा होता जा रहा है। मुस्लिम समुदायों के वोटों को लेकर सत्ता का सौदा न किया जाए। यदि इस सौदेबाजी पर तत्काल प्रभाव से रोक न लगाई तो हर प्रान्त भारत महासंध से अपनी सुरक्षा के लिए अलग होने के लिए मजबूर भी हो सकता है।

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

संसद की पवित्रता - शम्भु चौधरी

66वें स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या परः

66वें स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर देश के 13वें राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी ने देश के नाम अपने संदेश में कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार होने से देश में अव्यवस्था फैल जाएगी। आपने स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का आंदोलन जायज है। जहां एक तरफ आपने विधायिका के महत्व को समझाने का प्रयास किया वहीं दूसरी तरफ आपने जनता के आक्रोश को भी जायज ठहराते हुए संसद को ही नसीहत दे डाली कि कभी-कभी जनता अपना धैर्य खो देती है पर इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार का बहाना नहीं बनाया जा सकता। उपरोक्त संदेश कई तरह से उलझाव पैदा करने वाला है कि महामहिम जी किसे यह बताना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के लिए कौन जिम्मेदार है। संसद का कतरा-कतरा भ्रष्टाचार के बलि चढ़ चुका है। प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी एक हाथ में अपने खुद के ईमानदार होने का प्रमाण पत्र लिए, देश को गठबंधन धर्म की मजबूरी बताते नहीं थकते। मानो हमने यह स्वीकार कर लिया है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी लचर और लाचार हो चुकी है कि चोरों को चुनना ही लोकतंत्र का लक्ष्य रह जाता है। जो लोग इस लोकतंत्र के रक्षक बन अपनी आहुति दें वे चोर और जो चुनकर या पिछले दरवाजे से संसद में पंहुच जाए वे सभी ईमानदार और लोकतंत्र के रक्षक एवं विधायिका के निर्माता बन जाते हैं। संभवतः लोकतंत्र की इसी परिभाषा को अपने संदेश के माध्यम से चिन्हीत करना चाहते हैं हमारे राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी जी।

पिछले दिनों श्री अण्णा हजारे व उनकी टीम ने रामलीला मैदान में अपना दम तौड़ दिया। कल बाबा रामदेव व उनकी टीम भी दम तौड़ती नजर आई। प्रश्न यह नहीं है कि किसने बाजी मारी या किसने हारी। प्रश्न यह है कि संसद इतने संवेदनशील मामले पर चुप क्यों? संसद के अन्दर चुनकर गये और खुद को चुनावा कर गये नेताओं की लम्बी कतार देश को गुमराह क्यों कर रही है? आश्चर्य की बात है कि लोकतंत्र के प्रहरी संसद के अन्दर 543 सांसद जो जनता के सीधे प्रतिनिधि होते हैं और 245 सांसद जो पिछले दरवाजे से देश के कर्णधार बनकर संसद में पंहुचते है। इन सब ईमानदार और देशभक्तों को आखिर उस समय सांप क्यों सूंध जाता है जब भ्रष्टाचार और काले धन की बात सामने आती है? संसद की गरिमा और इसकी मर्यादा की रक्षा करने वाले ये चुने हुए सांसदों पर जब जनता द्वारा विचारों का हमला होता है तो वे संसद और संसदों की गरिमा की की दुहाई देते नहीं थकते। वहीं जब यही सांसद जनता पर तीखे व्यंग्य करते हैं तो जैसे ‘हम भी रोजा कर रहें हैं। या रामलीला तो हर साल हाती है।’’ जैसी अपमानजनक टिप्पणी करते नहीं थकते तो उस समय इनको अपनी ईमानदारी और संसद की मर्यादा का ख्याल क्यों नहीं आता। वहीं जब कुछ सांसदों पर कोई आक्षेप आता है या इनको चोर-बेईमान कहा जाता है तो इनको संसद की पवित्रता का आभास होने लगता है। संसद लोकतंत्र का पवित्र मंदिर जरूर है पर इसमें बैठे लोगों की मंशा ने इसकी पवित्रता को हर तरह से अपवित्र करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। पता नहीं इनकी देश भक्ति व इनका स्वाभिमान भी उस समय कहां चरने चला जाता है जब चंद लोगों के चलते पूरी संसद अपवित्र नजर आने लगती है?

शम्भु चौधरी
सचिव, राजनैतिक चेतना मंच

सोमवार, 19 मार्च 2012

बंगाल में राज्यसभा का चुनाव


शम्भु चौधरी
कोलकाता, 21 मार्च 2012: आगामी 30 मार्च 2012 को राज्यसभा के लिए पष्चिम बंगाल से पांच सदस्यों के लिए होने वाले चुनाव में बंगाल की तीनों प्रमुख पार्टियों ने अपने-अपने उम्मीदवारों घोषणा कर दी है। जिसमें राज्य की प्रमुख पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने वर्तमान में केंद्रीय रेलमंत्री मुकुल राय, बांग्ला दैनिक ‘संवाद प्रतिदिन’ के वरिष्ठ पत्रकार कुणाल घोष, उर्दू दैनिक ‘अकबर-ए-मसरिक’ के मोहम्मद नदीमूल हक और हिन्दी दैनिक संमार्ग के निदेशक विवेक गुप्ता, कांग्रेस पार्टी की तरफ से कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता अब्दुल मन्नान और माकपा की तरफ से सीटू के महासचिव तपन सेन ने नामांकन पत्र दाखिल किया है।
तृणमूल नेता व राज्य के उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने बताया कि मुकुल राय, कुणाल घोष और मोहम्मद नदीम उल हक पार्टी के पहले तीन उम्मीदवार होंगे जबकि गुप्ता चौथे उम्मीदवार के रूप में स्थान लेगें।
विधानसभा के सीटों के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस तीन उम्मीदवारों को राज्यसभा भेज सकती है जबकि चौथे उम्मीदवार के लिए उसे अन्य दलों के सहयोग की जरूरत पड़ेगी। विधानसभा में तृणमूल के 185 सदस्य जिसमें से एक सदस्य श्री अजित भुइयां का निधन हो चुका है। वाममोर्चा के 61 सदस्य और कांग्रेस के कुल 42 सदस्य हैं। इन आंकड़ों से यह साफ चिन्हीत होता है एक सीट के लिए सौदेबाजी निश्चित तौर पर किसी एक उम्मीदवार को करनी ही होगी। चुनाव में एक उम्मीदवार को जितने के लिए 49 मतों की जरूरत होगी। कांग्रेस पार्टी ने भी राज्य में ममता के साथ बिगड़ते रिश्ते को हवा देते हुए अपने 42 सदस्यों के बल पर अब्दुल मन्नान का नामांकन भरवा दिया है। निश्चित तौर पर तृणमूल पार्टी का समर्थन इस दल को नहीं मिलना तय है। इस स्थिति में कांग्रेस पार्टी को माकपा के सहयोगी दलों का समर्थन मिलना तय है। सूत्रों के हवाले से यह भी पता चला कि तृणमूल पार्टी के कुछ विधायक पार्टी लाइन से बहार जाकर भी अपना मतदान कर सकते हैं।
वर्तमान राजनीति परिदृश्य में 5 सीटों में से 3 पर तृणमूल व 1 सीट पर माकपा की जीत तय है। पांचवां उम्मीदवार कौन होगा? जिसमें तृणमूल के चौथे श्रेणी के हिन्दीभासी उम्मीदवार हिन्दी दैनिक संमार्ग के निदेशक विवेक गुप्ता उम्मीद लगाए हुए हैं। राज्य की मुख्यमंत्री व तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी कहती है कि उनके चारों प्रत्याशी जीत हासिल करेगें तो सवाल यह उठता है कि श्री विवेक गुप्ता को चौथे श्रेणी में क्यों रखा गया?
संख्या बल के अनुसार इस बार वाममोर्चा का एक ही उम्मीदवार पहुंचेगा। इसके बाद भी बाम दलों के पास 12 अतिरिक्त वोट बचेगें। जबकि कांग्रेस को 7 वोट की जरूरत होगी। ऐसे में गणित के आंकड़े किस करवट लेगा अभी कह पाना संभव नहीं हैं।
राज्य की मुख्यमंत्री व तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी हिन्दीभासियों का सम्मान करते हुए एक सीट पर हिन्दी दैनिक संमार्ग के निदेशक विवेक गुप्ता को मनोनीत किया गया है।
ताजा समाचारः
कांग्रेस पार्टी के प्रत्यासी वरिष्ठ नेता अब्दुल मन्नान ने अपना नामांकन वापिस ले लिया है। इस प्रकार शेष सभी पांचो उम्मीदवारों का चयन निर्विरोध हो गया। सभी को बधाई।

रविवार, 18 मार्च 2012

जमीन खोती जा रही कांग्रेस पार्टी


कोलकाता से शम्भु चौधरी


पिछले माह पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव व इनके परिणामों पर विभिन्न विद्वानों के विश्लेषण से इस बात के संकेत प्राप्त होते हैं कि कांग्रेस पार्टी में अब कार्यकर्ताओं की जगह नेताओं ने ले ली है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में जिस प्रकार चुनाव प्रचार किया गया। साम दाम दंड भेद का न सिर्फ प्रयोग किया गया कांग्रेस पार्टी ने चुनाव आते-आते वे सभी पत्ते खोल दिये जो इनके धर्मनिरपेक्षता पर भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। जातिगत राजनीति से लेकर धर्म आधारित राजनीति ने देश को यह भी सोचने को मजबूर कर दिया कि अब हर चुनाव राजनैतिज्ञ तुष्टिकरण से ही प्रारम्भ होकर धार्मिक तुष्टिकरण पर ही समाप्त होगा। धीरे-धीरे प्रायः सभी राज्यों में मुसलमानों का संगठित मतदान एक निर्णायक की भूमिका निभाने में सझम दिखाई देने लगा है। इसके साथ ही पिछले 50-60 सालों से कांग्रेस पार्टी जिसने इन वाटों पर केन्द्र की राजनीति की अब वह अपने खुद के बुने जाल में उलझती जा रही है। महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल कुछ ऐसे राज्यों की सूची में आ चुके हैं जहाँ कांग्रेस के केन्द्रीय या राज्य के चन्द चापलूस-पदलोलुप नेताओं ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को सामने रख संगठन को हमेशा से नुकसान पंहुचाते रहे हैं। महाराष्ट्र में जहाँ शरद पावर ने कांग्रेस से अलग होकर खुद को शक्तिशाली बना लिया तो बंगाल में ममता के कद को नीचा दिखाने व केन्द्र में रहने की मजबूरी ने इस पार्टी की जमीन ही बंगाल से हिला कर रख दी। तमिलनाडु में पिछले 45 सालों से, बिहार और उत्तरप्रदेश में में पिछले दो दशकों से, बंगाल में पिछले 35 सालों कांग्रेस पार्टी सत्ता से बहार हो चुकी है। पंजाब, कर्नाटक, राजस्थान, असम, हरियाणा व देश के कुछ छोटे राज्यों में कांग्रेस अपनी स्थिति को किसी प्रकार बचा पाती है इसका कारण यह नहीं कि वहां इस पार्टी कर जनाधार मजबूत है। इसका कारण है कि अभी वहाँ जनता को कोई अच्छा विकल्प नहीं मिल पाया है। जबकि केरल व त्रिपुरा में माकपा का जनाधार कुछ हद तक कांग्रेस को टक्कर देता रहा है। कांग्रेस पार्टी के जो नेतागण अपने ही राज्यों के मझले नेताओं के पर कुतरते रहे हैं वैसे ही लोग सत्ता को अपनी जागिर बनाये रखने के लिए गांधी परिवार के सामने अपने घुटने टैकने का कार्य करते रहें हैं।
आज जब उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम ने दो युवाओं की लड़ाई में अखिलेश यादव को जनता ने जो जनमत प्रदान किया वहीं गांधी परिवार की कमाई खाने वाले कांग्रेसियों को करारा झटका भी दिया है। मजे कि बात यह है कि इस पार्टी में इनके खुद के राज्य को मजबूत बनाने की जगह हवा में महल बनाने के लिए नींव बनाई जाती रही है। दिल्ली के गलियारे तक सिमटती कांग्रेस पार्टी आज धीरे-धीरे राज्यों में अपनी जमीन खोती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस पार्टी जनमत पर विश्वास न कर गांधी परिवार तक सिमटती नजर आती है। इससे देश के अन्दर छोटी-छोटी ताकतें अपना सर उठाने में सफल रही है। देश का राजनैतिज्ञ परिदृश्य भी तेजी से बदलता जा रहा है। इसका विश्लेषन कांग्रेस पार्टी को अंततः करना ही होगा। कि वह किस दिशा में जा रही है? राज्य के नेताओं के पर कुतरने के बजाय यदि कांग्रेस पार्टी उनके कद को एक अनुशासन के अन्दर महत्व प्रदान करे और सत्ता प्राप्त करने की जल्दबाजी न कर अपने संगठन को महत्व दे तो संभवतः यह दल भारतीय राजनीति में अपनी पहचान बचा पाएगी अन्यथा इसका हर्ष दिल्ली तक सिमटता चला जाऐगा।

गुरुवार, 15 मार्च 2012

Carton : Railway Budget 2012

Mamta Reaction On Railway Budget 2012

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

कार्टून: चल 'संसद" में छुप जाएं!

Cartoon on Indian Parliament

मतदाताओं को जागृत करने के अभियान के दौरान अण्णा टीम के प्रमुख सदस्य श्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि संसद में हत्यारे और बलात्कारी सहित सभी प्रकार के बुरे तत्वों की भरमार हो चुकी है। मौजूदा संसद में 163 सदस्यों पर अपराधिक मामलें चल रहे हैं। इस साफ सुथरे बयान से कुछ राजनैतिक दलों के नेताओं श्री केजरीवाल को पागल तक कहा डाला और इनपर देशद्रोह का मामला चलाने व संसद की गरिमा का हनन करार देते हुए इन पर संसद का अपमान बताया है।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

संसद में लोकपाल पर बहस का प्रतिफल

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

दरवान प्रधानमंत्री को हटाना जरूरी



राजनीति में सांप्रदायिका की कोई परिभाषा निश्चित करना कभी संभव नहीं हो सकता। यदि ऐसा संभव होता तो पाकीस्तान के दो हिस्से कदापी नहीं होते। हिन्दुस्तान आजादी के बाद नहीं टूटता। संभव है कि राजनेताओं का स्वार्थ पूरा ना हुआ हो, परन्तु देश को तौड़कर भी तो वे उसे आजतक नहीं प्राप्त कर पाये। राजनैतिक दलों को अपने सिद्धांत की कभी कोई परवाह रही ही नही। जब सत्ता आती नजर आती है सभी सिद्धांतों का ताक पर रख दिया जातें रहें हैं। अभी हाल ही नेपाल भी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।


आज देश में हर तरफ से अफरा-तफरी मची हुई है एक तरफ सरकारी पक्ष अदालतों में अपना कमजोर पक्ष रखकर अपराधियों को बचाने में जूटी है तो दूसरी तरफ गढ़े मुर्दे उखाड़ कर अन्ना टीम के सदस्यों व बाबा रामदेव को अपराधी बनाने का शर्मनाक खेल खेलती जा रही है। गाहे-बगाहे हिन्दू-मुस्लमानों को बंटने के प्रयास को भी बल देती रही है। अन्ना के आंदोलन में मुस्लमानों की तरफ से फतवा तक जारी करवा कर देश के इस सदी के सबसे बड़े आंदोन के इतिहास से एक बार मुस्लमानों के माथे कलंक का टीका लगा डाला कि वे देश के विकास से कोई ताल्लूक नहीं रखना चाहते।
आज देश में राजनैतिक दलों को भी इसी आधार पर कांग्रेस ने बांट रखा है। एक समय कांग्रेस पार्टी ताश के पत्ते की तरह लड़खड़ाने लगी थी जब देश में गांधी परिवार के विरूध आंदोलन चलाकर स्व॰ जयप्रकाश नारायणजी ने देश को एक सूत्र में पिरो दिया था। परन्तु जिस एकता में बामदल, समाजवादी, दक्षिणपंथी व गांधीवादी विचारधारा एक साथ आये वह ज्यादा समय तक नहीं चल सका। कारण सबके अपने-अपने स्वार्थ निहित थे। विचारधारा राजनीति में तबतक नहीं देखी जाती जबतक इन दलों के नेताओं का स्वार्थ सिद्धी होता रहता है। जैसे ही सत्ता के स्वाद व स्वार्थ का सवाल आता है विचारधारा की गली कमरे में बंद कर यही लोग अपने सिद्धान्तों की बातों सामने ला खड़ा करते हैं। पता नहीं कब कौन सी बात पर इनका कौन सा सिद्धांत लागू होगा यह इनको भी नहीं पता रहता। अचानक से कमरे के भीतर से वेसूरी बांसूरी बजने लगती है और सब के सब इनके सिद्धांत व विचारधाराएं नकारखाने की तूती बनकर रह जाती है।
कालाधन का मुद्दा रहा हो या भ्रष्टाचार का, मंहगाई चरम सीमा पर पहुंचती जा रही है। कमरतौड़ मंहगाई ने देश की जनता का जीना हराम कर रखा है परन्तु देश को लूटने का दौर बदसूरत जारी रहना चाहिए। जब-जब सरकार के खिलाफ आवाजें उठी, दबकर रह गई। हर जगह राजनैतिक दलों को लगता है कि देश में सांप्रदायिक ताकतों को जगह मिल जाऐगी।
पिछले दिनों माकपा व भाकपा ने कांग्रेस पार्टी से मंहगाई के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई पर जब इनका स्वार्थ टकराने लगा तो अचानक से एक ऐसे मुद्दे पर अपने सिद्धान्त की बात करने लगे जिसमें देश का हित था। कारण साफ था लोकसभा के चुनाव सामने आ गए थे तब। जिसमें उनको अपने चरित्र व सिद्धान्तों की बात जनता के सामने रखनी थी। परिणाम क्या मिला हम सब जानते हैं। चन्द सीटों पर सिमट कर रह गया इनका सिद्धांत।
आज पुनः कांग्रेसियों ने देश को भ्रमित करने व भ्रष्टाचार के मुद्दे से हटाकर देश में सोची समझी राजनीति की तहत "खूदरा व्यापार में विदेशी भागीदारी" के विवाद को सामने लाकर संसद के अन्दर और बहार अच्छी बहस छेड़ दी। परिणाम वही ढाक के तीन पात होने हैं चुंकि ना तो भाजपा के पास विपक्ष की भूमिका निभाने की क्षमता है न ही अन्य राजनैतिक दल सरकार को गिराना चाहेगें। कारण वही रोना होगा कि देश में सांप्रदायिक ताकतों का मजबूत करने में ये दल वाले। भला ऐसे में सिद्धांत का क्या काम? माकपा जब अपने सिद्धांतों की बात करती है तो वह किसी धर्म विशेष को नहीं मानती परन्तु जब राजनीति करनी है तो खुद ही अपने वोट बैंक पर कुलाड़ी कैसे चलायेगी।
कम व बेस प्रायः सभी राजनैतिक चरित्र इस बीमारी के शिकार हो चुके हैं। भाकपा, माकपा, समाजवादी बिचारधारा और गांधीवादी विचारधारा को बाद कर दिया जाए तो देश में बची बाकी सभी ताकतें सांप्रदायिक ताकते मानी जाऐगी। परन्तु भाकपा, माकपा, समाजवादी बिचारधारा और गांधीवादी विचारधारा सभी मुस्लमानों के वोट बैंक की बातें करतें या ईमामों द्वारा फतवा जारी करवातें रहें हैं। यह किस श्रेणी में आता है वह तो इनका सिद्धान्त ही बाता पायेगा।
राजनीति में सांप्रदायिका की कोई परिभाषा निश्चित करना कभी संभव नहीं हो सकता। यदि ऐसा संभव होता तो पाकीस्तान के दो हिस्से कदापी नहीं होते। हिन्दुस्तान आजादी के बाद नहीं टूटता। संभव है कि राजनेताओं का स्वार्थ पूरा ना हुआ हो, परन्तु देश को तौड़कर भी तो वे उसे आजतक नहीं प्राप्त कर पाये। राजनैतिक दलों को अपने सिद्धांत की कभी कोई परवाह रही ही नही। जब सत्ता आती नजर आती है सभी सिद्धांतों का ताक पर रख दिया जातें रहें हैं। अभी हाल ही नेपाल भी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
आज देश के राजनेताओं को सोचना होगा कि देश हित किसमें है। राष्ट्रहित में यदि सभी दलों को एक होकर कांग्रेस की इस दरबानों व चौकीदारों की सरकार को गिराने का कोई भी अवसर मिले तो चूक नहीं करनी चाहिए। गैर कांग्रेसी दलों को मिलकर राष्ट्र के नव निर्माण में भागीदारी लेनी चाहिए न कि कांग्रेसी चाल का हिस्सा बनकर परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उनका उनका साथ देवें। सांप्रदायिकाता का तमाशा बन्द करें ये सिद्धांतों के रखवाले। देश की रक्षा में आगे आएं। -शंभु चौधरी

सोमवार, 7 नवंबर 2011

बंगला साहित्य में राजस्थान - प्रो. शिवकुमार

चारण कवि रंगलाल की कविता पर आधारित
बंगाला साहित्य ‘राजस्थान के इतिहास’ से पटा पड़ा है। आज हम इसी संदर्भ में बंगला साहित्य के कुछ पन्नों को पलटते है।
रानी पद्मिनी के रूप-सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर उसे प्राप्त करने के लिए सम्राट अलाउद्दीन चित्तौड़ पर आक्रमण करता है। युद्ध में असफलता होने के पश्चात वह राजा भीम सिंह के पास एक प्रस्ताव भेजता है- ‘‘कि यदि एक बार उसे रानी पद्मिनी का दर्शन हो जाय तो वह दिल्ली लौट जायेगा।’’
बंगला साहित्य में इस घटना का वर्णन देखें -

एई रूप कत दिन होइलो समर।
दिवा विभावरी रणे नाहि अवसर।।
तथापिउ यवनेर ना होइलो जय।
अभेद्य दुर्गम दुर्ग, कार साध्य लय?

एकबार देखा चाई से रूप ताहार।।
आसार आशाय फल लाभ होले बांचि।
इहार अधिक मिछे मने मने आंचि।।
नाहि चाहि रत्नभार, चित्तौरे देश।

देखिबो से मोहिनीरे, एई धार्य शेष।।
एतो भावि पत्र लिखि दूत पाठाइलो।
संधिर पताका शुभ्र, शून्ये उडाइलो।।

(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.147)

सम्राट अलाउद्दीन चित्तौड़ पर जय नहीं होने के बाद जब इस तरह का अपमान जनक सन्धि प्रस्ताव पा कर राजा राणा भीम सिहं क्रूद हो उठता है परन्तु तब तक वह युद्ध के कारण काफी कमजोर हो चुका था। तब रानी पद्मिनी ने सूझाव दिया कि आप उसे दर्पण छाया देखने का प्रस्ताव दे कर कुल को नष्ट होने से वचाव करें। अगर वह सिर्फ मेरी छाया देख कर दिल्ली लौट जाता है तो इससे हमारे वीरों की प्राण रक्षा हो सकेगी।

दुर्जन दलन, सुजन पालन,
एई तो राजार नीति।

निरखि आभाय, शत्रु यदि जाय,
सब दिक रक्षा पाय।
तबे हे आमारे, देखाउ ताहारे,
निरुपाये सदुपाये।।
साक्षत् आभाय, यदि देखे राय
होबे तबे कुले कालि।
देखुक अर्पाणे, छाया दरशने
वंशेते ना रबे गालि।।

(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.149)
पद्मिनी महारानी ने राजा को जनता के प्रति अपना धर्म याद दिला कर संन्धि प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने को कहा। इस बीच में बंगाला कवि देश की जनता को याद दिलाता है कि अंग्रेजों से भी हमें हार नहीं माननी चाहिए। धीरे धीरे कवि रानी के जौहर की तरफ बढ़ता चला जाता है।
अंत मे कवि हुंकार भर उठता है-

ओई शनु ! ओई शुनो !
भेरहर आवाज हे, भेरीर आवाज।
साज साज साज बोले, साज साज साज हे,
साज साज साज।।
चलो चलो चलो सबे, समर-समाज हे,
समर समाज।
राखोहो पैतृक धर्म, क्षत्रियेर काज हे,
क्षत्रियेर काज।
आमादेर मातृभूमि राजपूतानानार हे
राजपूतानार।

जौहर की कथा का गुनगान करते हुए कवि देशवसियों को हुंकार भरता है कि- कि वे भी उठो जगो और अंग्रेजों से लोहा लेने की कसम खा लो।

भारतेर भाग्य जोर, दुःख विभावरी भेर
घूम-घोर थाकिवे कि आर?
इंगराजेर कृपाबले, मानस उदयाचले
ज्ञानभनु प्रभाय प्रचार।।

(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.172)

रविवार, 6 नवंबर 2011

व्यंग्य: लोकतंत्र’रा स्तम्भ


बेईमान व्यक्ति के हाथ में कलम हो या तलवार उसकी बेईमानी छुपती नहीं है। इन दिनों देश में पत्रकारिता में भी बेईमानी झलकने लगी है। देश के कई पत्रों के संपादक करोड़ों में बिकने लगे। ईनाम की रकम इतनी मंहगी हो चुकि है कि एक लाख का ईनाम लेने के लिए हर शख्स अपना ईमान बेचने में लगा है। कल तक देश में नेता लोग व्यापारियों को जी भर के गालियां देते रहे। पत्रकार भी जम कर उनको लताड़ते थे। जनता उसके मजे ले-ले पेट भरती रही। आज देश में इन नेताओं की जब बारी आई तो पत्रकारों की एक जमात बगलें झांकती नजर आती है। इस संदर्भ में व्यंग्य को देखें -

एक पत्रकार दूसरे पत्रकार से
मित्र- सोहनजी थारी तलवार निचे पड़गी !
ना’रे आ तो म्हारी कलम है !
मित्र- नेता’रे गलै तो आई रोजना फिरै !
अब कठै काल ही म्हारे बॉस ने ‘वो’ खरिद लियो !
मित्र- अब तू कै लिखसी ?
आ अब उलटी चालसी
मित्र- कियां?
अब देश’री जनता को सर कलम करसी।
मित्र- पर या तो गद्दारी होसी?
मेरो पेट कुण भरसी तू कि या जनता?
मित्र- पर फैर भी आपां देश का चौथा लोकतंत्र’रा स्तम्भ हां।
जद तीनों पाया लड़खड़ायरा है तो चौथे खड़ो रह भी कै कर लेसी?


व्यंग्यकार: शंभु चौधरी, कोलकाता

शनिवार, 5 नवंबर 2011

भुपेन हजारिका को हमारी श्रद्धांजलि

भुपेन हजारिका
(8 सितंबर, 1926 - ५ नवम्बर २०११)
Bhupen Hazarika
जाने-माने गायक और संगीतकार इस सदी के महा नायक श्री भूपेन हजारिका जी का शनिवार को मूम्बई के एक अस्पताल में निधन हो गया। श्री हजारिका जी के कई अंगों ने काम करने बंद कर दिये थे। उनकी उम्र 86 वर्ष की थी। कल देर शाम लगभग साढ़े चार बजे उनका निधन हो गया। हजारिका जी का इस अस्पताल में 29 जून से इलाज चल रहा था। अक्तूबर के अंत में निमोनिया होने के बाद से उनकी सेहत और खराब हो गई। हजारिका ने अपना अंतिम गीत फिल्म गांधी टू हिटलर के लिए गाया, जिसमें उन्होंने बापू के पसंदीदा भजन वैष्णव जन गाया था। इनके दो गीतों ने ‘‘दिल हूम-हूम करे’’ और ‘‘ओ गंगा बहती हो क्यूं’’ ने देश भर के हिन्दूस्तानियों पर राज किया।
भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम से एक बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार थे। हजारिका का जन्म असम के सादिया में हुआ था। बचपन में ही उन्होंने अपना प्रथम गीत लिखा और दस वर्ष की आयु में उसे गाया। साथ ही उन्होंने असमिया चलचित्र की दूसरी फिल्म इंद्रमालती के लिए १९३९ में बारह वर्ष की आयु मॆं काम भी किया। ई-हिन्दी साहित्य सभा की तरफ से आपको भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित।


ओ गंगा बहती हो क्यूं?
© - डॉ.भूपेन हजारिका -




[मूल असमिया भाषा से हिन्दी में रूपान्तर]
विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार
निःशब्द सदा, ओ गंगा तुम
ओ गंगा बहती हो क्यों ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुआ
निर्लज्य भाव से बहती हो क्यों ?
अनपढ़ जन खाध्य विहीन,
नेत्र विहीन देख मौन हो क्यों ?
इतिहास की पुकार, करें हँकार
ओ गंगा की धार, निर्वल जन को सकल संग्रामी
समग्रगामी बनाती नहीं हो क्यों ?
व्यक्ति रहे व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज व्यक्तित्व रहित
निष्प्राण समाज नहीं तोड़ती हो क्यों ?
स्त्रोतस्विनी तुम न रही, तुम निश्चय चेतना नहीं
प्राणों से प्रेरणा बनती न क्यों ?



[मूल असमिया भाषा से राजस्थानी में रूपान्तर]
लांबी है अथाग, प्रजा दोन्यू पार
करे त्राय-त्राय, अणबोली सदा ओ गंगा तू
ओ गंगा बैवे है क्यूं ?
नेकपाणो नष्ट हुयो, मिनख पणो भ्रष्ट हुयो,
निरलज्जा बण बैवे है क्यूं
अणभणिया आखरहीन, अणगिण जन रोटी स्यूं त्रीण
नैत्रहीन लख चुप है क्यूं
इतिहास की पुकार, करें हुंकार-
हे गंगा की धार निवले मानव ने जुद्ध वणी,
सब ठौरजयी वणावै नहीं है क्यूं ?
मिनक रहवै मिनखांचारी, सगळा समाज निभ्हे स्वैच्छाचारी
प्राणहीन समाज नै तोड़े नहीं हैं क्यूं ?
सुरसरी तू ना रै वै, तू निश्चय चेतना हीन
प्राणों में प्रेरणा बणै नहीं है क्यूं ?
ओ गंगा बैवे है क्यूं

Translated In Rajsthani by : Raju Khemka, Assam